मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । २६
दूसरा अध्याय । २६
शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् ।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रैष्यसंयुतम् ॥ ३२ ॥
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् ।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मण का नाम मङ्गलवाचक शब्द, क्षत्रिय का बलवाचक,
वैश्य का धनयुक्त और शूद्र का दासयुक्त नाम होना चाहिये ।
ब्राह्मणों के नाम में शर्मा, क्षत्रियों के वर्मा, वैश्यों के भूति और शूद्रों
के दास लगाना चाहिए । जैसे शिवशर्मा, रामवर्मा आदि । स्त्रियों
के नाम सुख से उच्चारण योग्य, क्रूर न हो, वह साफ़, सुन्दर
मङ्गलवाची, अन्त में दीर्घाक्षरवाला और आशीर्वाद-शब्द से
मिला हो, जैसा सरला, विमला, यशोदा इत्यादि ॥ ३१-३३ ॥
चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ ३४ ॥
चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ॥ ३५ ॥
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥ ३६ ॥
बालक को चौथे महीने घर से बाहर निकाले । छठे महीने में
उसको अन्न खिलावे, या जैसी रीति अपने कुल में हो वैसा करे ।
चूडाकर्म, पहले या तीसरे वर्ष* करे, यह वेद की आज्ञा है ।
ब्राह्मण बालक का गर्भवर्ष से आठवें वर्ष यज्ञोपवीत करे, क्षत्रिय का
ग्यारहवें वर्ष और वैश्य का बारहवें वर्ष करना चाहिये † ॥३४-३६॥
- आश्वलायनगृह्यसूत्र में लिखा है-' तृतीये वर्षे चूडाकरणं यथा कुलधर्मं
वा।' प्रत्येक संस्कारों का विवरण, गृह्यसूत्रों में किया गया है । अपने अपने गृह्यसूत्रों
के अनुसार, संस्कार करना चाहिए ।
† 'अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेद् गर्भाष्टमे वैकादशे क्षत्रियं द्वादशे वैश्यम् । '
आश्वलायनगृह्यसूत्र १ । २० ।
३० मनुस्मृति ।
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे ।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ३७ ॥
आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते ।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥ ३८ ॥
अत ऊर्ध्वं त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ ३६ ॥
नैतैःपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् ।
ब्राह्मान्यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद्ब्राह्मणः सह ॥ ४० ॥
वेदाध्ययन और उसके अर्थज्ञान से बढ़ा तेज ब्रह्मवर्चस है।
उसकी इच्छावाले ब्राह्मण का पांचवें वर्ष, बलार्थी क्षत्रिय का छठे
वर्ष, धनी होना चाहनेवाले वैश्य का आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार
करे। सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की सावित्री नहीं जाती। क्षत्रिय
की बाइस वर्ष तक और वैश्य की चौबीस वर्ष तक नहीं जाती*।
अर्थात् यह उपनयन समय की परमावधि है। इस काल के बाद,
ये तीनों, समय में संस्कार न होने से, सावित्रीपतित 'व्रात्य'
नामक होजाते हैं और शिष्टों से निन्दित होते हैं। इन अशुद्ध
व्रात्यों के साथ आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण को, विद्या वा विवाह
का सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ३७-४० ॥
कार्ष्णीरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः ।
वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ ४१ ॥
मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला ।
क्षत्रियस्य तु मौर्वीज्या वैश्यस्य शणतान्तवी ॥ ४२ ॥
मुञ्जालाभे तु कर्तव्यः कुशश्मान्तकबल्वजैः ।
त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ ४३ ॥
- 'आषोडशाद्ब्राह्मणस्यानतीतः काल आद्वाविंशात् क्षत्रियस्य आचतुर्विंशा-
द्वैश्यस्य । यत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ।' आश्वलायन-गृह्यसूत्र १ । २० ।