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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

नवाँ अध्याय । ३२१

नवाँ अध्याय । ३२१
स्त्रियां रक्षित होनेपर भी अपने पति से विमन रहती हैं । ब्रह्मा
के रचे, ऐसे स्त्रियों के स्वभाव जानकर उनकी रक्षा का खूब उ-
द्योग करे । सोना, बैठे रहना, गहनेपर प्रेम, काम, क्रोध, अङ्कृतपना,
दूसरों से द्रोह और दुराचार ये स्त्रियों में स्वभाव से पैदा हैं—ऐसा
मनु ने कहा है । स्त्रियों के जातकमीदि संस्कार मन्त्रों से नहीं होते
इसलिए वे धर्मरहित होती हैं। असत्य के समान हैं—यह धर्म-
शास्त्र की मर्यादा है ॥ १५-१८ ॥
तथा च श्रुतयो बह्व्यो निगीता निगमेष्वपि ।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तासां शृणुत निष्कृतीः ॥ १६ ॥
यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता ।
तन्मे रेतः पिता वृङ्क्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २० ॥
ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।
तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ २१ ॥
यादृग्गुणेन भर्त्रा स्त्री संयुज्येत यथाविधि ।
तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगा ॥ २२ ॥
व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वभाव की परीक्षार्थ वेदों में बहुत
श्रुतियां पठित हैं । उनमें जो व्यभिचार के प्रायश्चित्तभूत हैं उन
को सुनो । कोई पुत्र माता का मानस व्यभिचार जानकर कहता है-
जो मेरी माता अपतिव्रता हुई परपुरुष को चाहनेवाली थी, उस
दुष्टा का मेरा पिता शुद्ध वीर्यसे शोधन करे-यह एक नमूना है ।
स्त्री अपने मनमें पतिके लिए जो अशुभ चिन्तन करती है (मान-
सिक व्यभिचार ) उसका प्रायश्चित्तरूप मन्त्र पुत्रको शुद्ध करने
वाला है, माता को नहीं। जिस गुणवाले पति के साथ स्त्री विवाह
करके रहे वैसेही गुणवाली वह होजाती है, जैसे समुद्र के साथ
नदी खारी होजाती है ॥ १६-२२ ॥
अक्षमाला वशिष्ठेन संयुक्ताऽधमयौनिजा ।
४१

३२२ मनुस्मृति ।
शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥ २३ ॥
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥ २४ ॥
एषोदिता लोकयात्रा नित्यं स्त्रीपुंसयोः शुभा ।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान् प्रजाधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥
अक्षमाला-अधम जाति की स्त्री वशिष्ठ को विवाहित होने से
पूज्य हुई। शारंगी पक्षीजाति की मन्दपाल को विवाहित होने से
पूज्य हुई। ये और दूसरी भी स्त्रियां इस लोक में अपने पतियों के
गुणों के कारण उन्नति को पहुँची हैं। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का
उत्तम लौकिक आचार कहा गया है। अब लोक, परलोक में सुख
देनेवाले सन्तानधर्म को सुनो ॥ २३-२५ ॥
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ २६ ॥
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ २७ ॥
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह ॥ २८ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ २९ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
ये स्त्रियां पुत्र उत्पन्न करने के लिए बड़ी भाग्यवंती, सत्कार
योग्य और घर की शोभा हैं। स्त्रियों में और लक्ष्मी में कोई भेद