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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ७५

तीसरा अध्याय। ७५
कन्या का, वर का दिया हुआ धन पिता आदि न लें, कन्या को ही
दे देवें, वह भी विक्रय नहीं है। क्योंकि वह कन्याका पूजन-सत्कार
मात्र है ॥ ५१-५४ ॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥ ५५ ॥
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ५६ ॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥ ५७ ॥
स्त्रियों का आदर ।
पिता, भाई, पति और देवर को स्त्रियों का सत्कार
और आभूषण आदि से उनको भूषित करना चाहिए। इससे
बड़ा शुभ फल होता है। जिस कुल में स्त्रियों का सत्कार किया
जाता है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं। जहां नहीं वहां सब
धर्म, कर्म निष्फल होते हैं। जिस कुल में स्त्रियां शोक में रहती हैं,
वह कुल शीघ्र ही बिगड़ जाता है और जहां प्रसन्न रहती हैं, वह
सदा बढ़ता जाता है ॥ ५५-५७ ॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ ॥
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ॥ ५६ ॥
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ६० ॥
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥

१६ मनुस्मृति ।
जिस कुल में स्त्रियों का सत्कार नहीं है वह उनके शाप से नष्ट
होजाता है जैसे मारण करने से होजाता है। इस कारण सत्कार
के मौके पर और उत्सवों पर सदा गहना, वस्त्र और भोजन से
स्त्रियों को सन्तुष्ट करना चाहिए। जिस कुल में स्त्री अपने पति से
और पति स्त्री से सन्तुष्ट रहते हैं, उस कुल में अवश्य कल्याण
होता है। यदि स्त्री शोभित न हो तो पति को प्रसन्न नहीं कर
सकती और बिना खुशी, सन्तान नहीं हो सकती ॥ ५८-६१॥
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम् ।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ६२ ॥
कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ ६३ ॥
शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः ।
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥ ६४ ॥
स्त्री भूषित हों तो सारे कुल की शोभा है, नहीं तो परिवार की
शोभा नहीं होती। दूषित विवाहों से, कर्म के लोप से, वेद के न
पढ़ने से और ब्राह्मणों का अपमान करने से उत्तम कुल भी अधम हो
जाता है। शिल्प-भांति भांति की कारीगरी करने से, लेन देन
करने से, सिर्फ शूद्रा स्त्री में सन्तान पैदा करने से, गौ, घोड़ा,
सवारी आदि के खरीद-बिक्री करने से, खेती और राजा की
चाकरी करने से उत्तम कुल बिगड़ जाता है ॥ ६२-६४ ॥
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् ।
कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः॥ ६५ ॥
मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि ।
कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥ ६६ ॥
वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधि ।
पञ्चयज्ञविधानं च पंक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ६७ ॥