मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पहला अध्याय। १६
पहला अध्याय। १६
ब्रह्मा ने अपने मुख से देव और पितृकार्य संपादनार्थ और लोक
की भलाई के लिए, ब्राह्मण को उत्पन्न किया है। जिस के मुखद्वारा
देवगण हव्य और पितृगण कव्य ( श्राद्धादि में ) को ग्रहण करते
हैं उससे श्रेष्ठ कौन है ? भूतों ( स्थावर, जङ्गम ) में प्राणी
( कीटादि ) श्रेष्ठ हैं। इन में भी बुद्धिजीवी ( पशु आदि ) इनसे भी
मनुष्य श्रेष्ठ है उन में ब्राह्मण अधिक है। और ब्राह्मणों में विद्वान्,
विद्वानों में कर्म जाननेवाले, उन में कर्म करनेवाले और उन से भी
ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ होता है। ब्राह्मण का शरीर ही धर्म की अविनाशी
मूर्ति है। क्योंकि, वह धर्मद्वारा मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ६४-६८ ॥
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ६६ ॥
सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किञ्चिज्जगतीगतम् ।
श्रैष्ठ्येनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोर्हति ॥ १०० ॥
ब्राह्मण का उत्पन्न होना पृथिवी में सब से उत्तम है। क्योंकि
सब जीवों के धर्मरूपी ख़ज़ाने की रक्षार्थ वह समर्थ है। जो कुछ
जगत् के पदार्थ हैं वे सब ब्राह्मणों के हैं। ब्रह्ममुख से उत्पत्ति होने
से ब्राह्मण, सब ग्रहण करने योग्य है ॥ ६६-१०० ॥
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च ।
आनृशंस्याद्ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः ॥ १०१ ॥
तस्य कर्मविवेकार्थं शेषाणामनुपूर्वशः ।
स्वायम्भुवो मनुर्द्धीमानिदं शास्त्रमकल्पयत् ॥ १०२ ॥
विदुषा ब्राह्मणेनेदमध्येतव्यं प्रयत्नतः ।
शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यग् नान्येन केनचित् ॥ १०३ ॥
इदं शास्त्रमधीयानो ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
मनोवाग्देहजैर्नित्यं कर्मदोषैर्न लिप्यते ॥ १०४ ॥
२० मनुस्मृति।
पुनाति पङ्क्तिं वंश्यांश्च सप्त सप्त परावरान् ।
पृथिवीमपि चैवेमां कृत्स्नामेकोपि सोर्हति ॥ १०५ ॥
ब्राह्मण, यदि दूसरे का दिया अन्न भोजन करे, या वस्त्र पहने,
या दान देवे, तौभी वह सब ब्राह्मण का अपना ही है। और लोग
तो ब्राह्मणों की कृपा से भोजन पाते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रियों के
कर्म विवेक के लिये स्वायम्भुव मनु ने यह धर्मशास्त्र बनाया। वि-
द्वान् ब्राह्मण को यह धर्मशास्त्र पढ़ना और शिष्यों को पढ़ाना
चाहियें। और किसी को उपदेश न करना चाहिये । नियमनिष्ठ
ब्राह्मण जो इस शास्त्र का अध्ययन करता है वह मन, वाणी, देह
के पापों से लिप्त नहीं होता । धर्मशास्त्रविशारद, अपवित्र पंक्ति
को पवित्र कर देता है और अपने वंशके सात पिता, पितामह आदि
और पुत्र, पौत्र आदि को पवित्र करदेता है । और सारी पृथिवी
को भी वह लेने योग्य है ॥ १०१-१०५ ॥
इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिदं बुद्धिविवर्धनम् ।
इदं यशस्यमायुष्यमिदं निःश्रेयसं परम् ॥ १०६ ॥
अस्मिन् धर्मोखिलेनोक्तो गुणदोषौ च कर्मणाम् ।
चतुर्णामपि वर्णानामाचारश्चैव शाश्वतः ॥ १०७ ॥
आचारः परमोधर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त्त एव च ।
तस्मादस्मिन्सदायुक्तोनित्यंस्यादात्मवान्द्विजः॥१०८॥
यह शास्त्र, कल्याणदायक, बुद्धिवर्धक, यशदायक, आयुवर्धक
और मोक्ष का सहायक है। इस स्मृति में सारे धर्म कर्म कहे हैं।
कर्मों के गुण दोष भी कहे हैं । और चारों वर्णों का परंपरा
से प्राप्त आचार कथन किया गया है। श्रुति और स्मृति में कहा
आचार परमधर्म है, इस लिए इस में ब्राह्मणों को सदा तत्पर
रहना चाहिए ॥ १०६-१०८ ॥
आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते ।
आचारेण तु संयुक्तः संपूर्णफलभाग्भवेत् ॥ १०६ ॥