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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २५५

आठवां अध्याय । २५५
से साबित कर दे तो राजा उसको धन दिलावे और ऋणी के
ऊपर शक्ति के अनुसार दण्ड भी करे ॥ ४७-५१ ॥
अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि ।
अभियोक्ता दिशेद्देश्यं करणं वान्यदुद्दिशेत् ॥ ५२ ॥
अदेश्यं यश्च दिशति निर्दिश्यापह्नुते च यः ।
यश्चाधरोत्तरानर्थान् विगीतान्नावबुध्यते ॥ ५३ ॥
अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति ।
सम्यक् प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति ॥ ५४ ॥
राजसभा में ऋणी से कहा जाय-महाजन का क़र्ज़ा अदा
कर दो, तो भी वह इन्कार करे तो राजा साक्षी, दस्तावेज़ वगैरह
पेश करने की आज्ञा दे । जो झूठे गवाह या काग़ज़ पत्र पेश करे,
जो पेश करके इन्कार करे और जो पूर्वापर की कही बातों का
ध्यान न रक्खे । या जो बात को उलटता है, क़बूल करके भी
पूँछने पर इन्कार करता है ॥ ५२-५४ ॥
असंभाष्ये साक्षिभिश्च देशे संभाषते मिथः ।
निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत् ॥ ५५ ॥
ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत् ।
न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात् स हीयते ॥ ५६ ॥
साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन्न यः ।
धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ॥ ५७ ॥
अभियोक्ता न चेद्ब्रूयाद्वध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः ।
न चेत् त्रिपक्षात्प्रब्रूयाद्धर्मं प्रति पराजितः ॥ ५८ ॥
यो यावन्निह्नुवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत् ।

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२५६ : मनुस्मृति ।

[Main Text]
तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्द्विगुणं दमम् ॥ ५६ ॥
पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा ।
त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ ६० ॥
और जो एकान्त में गवाहों के साथ बातचीत करे, जाने हुए
प्रश्न का उत्तर न दें, पूंछने पर कुछ न कहें और जो कहें सो दृढ़ता
से न कहें जो पूर्वापर बातों को न जानें। ऐसे पुरुष अपने अर्थ-
धन से हार जाते हैं। मेरे साक्षी हाज़िर हैं, ऐसा कह कर जो
मांगने पर हाज़िर न कर सके, न्यायाधीश उसको भी हरा देय।
वादी अपने दावा को सिद्ध न कर सके तो वह धर्मानुसार शिक्षा
और दण्ड दोनों का पात्र होता है और जो प्रतिवादी-मुद्दआलेह
डेढ़ महीना के भीतर झूठे दावे से हुई हानि की नालिश न कर
सकें तो वह भी हारा समझा जाय। प्रतिवादी जितने धन के
लिए झूठ बोले और वादी जितने धन का झूठा दावा करे, राजा
उन दोनों अधर्मियों को उसका दूना दण्ड करे। अगर राजा
और ब्राह्मण के सामने पूंछने पर ऋणी इन्कार करजाय तो तीन
गवाह देकर ऋण सत्य करावें ॥ ५५-६० ॥
यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः ।
तादृशान् संप्रवक्ष्यामि यथा वाच्यमृतं च तैः ॥ ६१ ॥
गृहिणः पुत्रिणो मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ।
अर्थ्युक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ॥ ६२ ॥
अब धनियों को और दूसरों को भी कैसे गवाह देने चाहिएं
और वे कैसें सच्ची गवाही दें, यह सब कहा जाता है।
साक्षी-गवाह।
कुटुम्बी, पुत्रवान्, उसी देश का वासी, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये लोग
जब वादी बुलावें तो गवाही दे सकते हैं, सब कोई नहीं ॥ ६१-६२॥