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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 649 में से

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पृष्ठ 52

५० मनुस्मृति ।
मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ॥ २२७ ॥ ” “ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु
नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ॥ ६५ ॥ ” इत्यादि वाक्यों से पुन-
र्विवाह का निषेध किया है। और शास्त्रीय युक्ति भी है कि
जब एक बार कन्याद्रव्य का दान वरको करदिया गया, तब
दाता का पुनः कन्याद्रव्य में अधिकार न रहा, और अधिकारी
वर मृत हो गया तथा अन्यद्रव्य के समान अधिकारी के संवं-
धियों का अधिकार नहीं प्राप्त होता, उस दशा में ‘विधवा’
को देनेलेनेवाला चोर के सिवाय और कौन हो सकता है ?
और-
‘नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतितेऽपतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥' (४अ. ३०श्लो.)
इस पराशरस्मृति वचन से जो पुनर्विवाह की सिद्धि
करते हैं उनकी बड़ी भूल है; क्योंकि प्रथम तो वैवाहिक श्रुति
(मन्त्र) के साथ उक्त स्मृति का विरोध होता है, जिस के बारे
में भगवान् मनु ने लिखा है कि 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्या-
स्वेव प्रतिष्ठिताः' (८ अ. २२६ श्लो. )। दूसरे, गृह्यस्मृतियों
में पुनर्विवाह विधिके न होने से उक्त स्मृति का गृह्यस्मृतियों के
साथ विरोध स्पष्ट है। तीसरे, पतिके पतित होने पर ‘आशुद्धेः
संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः' (आ. ७७ श्लो. ) इस
याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार पत्यन्तर की प्राप्ति नहीं होती,
किंतु प्रायश्चित्त करने बाद वही पति व्यवहार्य होता है। अत-
एव यह कहा जा सकता है कि उक्त, स्मृति-वाक्य स्वतन्त्ररूप
१ पति स्त्रीका दाता किसी अवस्था में होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र...।
२ 'अर्यमणं तु देवं कन्या अग्निमयक्षत' इत्यादि मन्त्र और प्रस्तुतविचार विद्यासुधाकर में स्पष्ट है।