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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ५७

तीसरा अध्याय। ५७
पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते।
निमन्त्रयेतऽयवरान्सम्यग्विप्रान्यथोदितान्॥१८७॥
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥१८८॥
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथा सीनानुपासते ॥ १८६ ॥
वेदार्थ का ज्ञाता, उसका अध्यापक, ब्रह्मचारी, हज़ार गोदान
करनेवाला और सौ वर्षका ये पंक्तिपावन होते हैं । श्राद्ध के
पहले दिन वा उसी दिन उक्त गुणवाले ब्राह्मणों को आदर से
तीन वा कम को निमन्त्रण देवे । श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण
उस दिन नियम से रहे और वेदाध्ययन न करे । और यही
नियम श्राद्ध करानेवाले को भी पालन करना चाहिए । पितर
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के पास आते हैं और वायु के समान पीछे
चलते और बैठते हैं ॥ १८६-१८६ ॥
केतितस्तु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः ।
कथंचिदप्यतिक्रामन् पापः शूकरतां व्रजेत् ॥ १६० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते ।
दातुर्यद्दुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ १६१ ॥
अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महाभागाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ १६२ ॥
हव्य और कव्य में नेवता पाकर किसी कारण भोजन न करने
से उस ब्राह्मण को दूसरे जन्म में शूकर होना पड़ता है । निम-
न्त्रण पाकर कामुक स्त्री से जो भोग करता है, वह दाता के पाप
का भागी होता है । क्रोधरहित, पवित्र-रागद्वेषरहित, सदा
ब्रह्मचारी, युद्धत्यागी, महाभाग-दया, शील आदि युक्त, देवता
रूप पितर हैं। इसलिए भोजन करनेवालों को आचार, विचार से

६८ मनुस्मृति ।
यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः ।
ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ॥ १९३ ॥
मनोर्हैरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः ।
तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥१९४॥
विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः ।
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः॥ १९५॥
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽद्विजाः ॥ १९६ ॥
इन सब पितरों की जिससे उत्पत्ति हुई है और जो पितर जिन
नियमों से जिसके पूज्य हैं वह सुनो । हिरण्यगर्भ के पुत्र मनु के
जो मरीचि आदि पुत्र हैं, उनके पुत्र सोमपा आदि पितृगण हैं।
विराट् के पुत्र सोमसद्‌नामक साध्यों के पितर हैं और मरीचि
के पुत्र अग्निष्वात्त देवताओं के पितर कहे जाते हैं । दैत्य,
दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, पक्षी और किन्नरों के बर्हिषद्‌नामक
पितर हैं ॥ १९३–१९६ ॥
सोमपानाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः ।
वैश्यानामाज्यपानाम शूद्राणां तु सुकालिनः ॥१९७॥
सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः ।
पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १९८॥
अग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्र्वाहिषदस्तथा ।
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत्॥१९६॥
य एते तु गणा मुख्याः पितॄणां परिकीर्त्तिताः ।
तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ २०० ॥
सोमपा ब्राह्मणों के, हविर्भुज क्षत्रियों के, आज्यपा वैश्यों के
और सुकालिन‌नामक शूद्रों के पितर हैं । सोमपा भृगु के पुत्र,