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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय । ८६

तीसरा अध्याय । ८६
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतॄंश्च कुरुते फलभागिनः।
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह 'पैशाची द-
क्षिणा' कहलाती है । यह दक्षिणा—जैसे भोजन आदि अंधी गौ
एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।
परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज बो-
कर, बोनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही-मूर्ख-वेदहीन ब्राह्मण
को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से
भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोक में
फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भििरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।
१२

६० मनुस्मृति ।
दौहित्रं विट् पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्॥१४८॥
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् ।
पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ १४६ ॥
ये स्तेनपतितक्कीबा ये च नास्तिकवृत्तयः ।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननर्हान् मनुरब्रवीत् ॥ १५०॥
यदि योग्य, ब्राह्मण न मिलें तो श्राद्ध में मित्र कोही खिलादे ।
पर शत्रु विद्वान् को भी न भोजन करावे—वह निष्फल होता है।
वेदपारगामी ऋग्वेदी ब्राह्मण को, यजुर्वेदी को, समाप्ति तक
सामवेद जाननेवाले को, श्राद्ध में अच्छीभांति भोजन कराना
चाहिए । इन में से कोई भी ब्राह्मण जिसके श्राद्ध में आदर से
भोजन पाता है, उसके सात पीढ़ी तक के पितर तृप्त होते हैं ।
यह हव्य और कव्य की प्रथम विधि है और सत्पुरुषों से आच-
रित गौण विधि इस प्रकार है-यदि ऊपर कहे ब्राह्मण न मिलें तो
नाना, मामा, भानजा, ससुर, गुरु, जामाता, मौसेरा भाई,
ऋत्विज और यज्ञ करानेवालों को भोजन देना । देवकर्म में
ब्राह्मण की परीक्षा न करे ओर पितृकर्म में यत्न से परीक्षा करनी
चाहिए । जो चोर पतित वा नपुंसक हों, नास्तिकभाव से
जीविका करता हो उन ब्राह्मणों को मनुजी ने देवकर्म और
पितृकर्म में अयोग्य कहा है॥ १४४-१५० ॥
जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा ।
याजयन्ति च ये पूगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत्॥ १५१॥
चिकित्सकान् देवलकान् मांसविक्रयिणस्तथा ।
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ॥ १५२॥
प्रेष्यो ग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः ।
प्रतिरोद्धा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वार्धुषिस्तथा ॥ १५३ ॥