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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 649 में से

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पृष्ठ 61

भूमिका । ५६
अर्थात् निर्गुणोपासन में असमर्थ सगुणोपासन करें, चित्त के
निश्चल होने पर वही निर्गुण (निरुपाधि-ब्रह्म) प्रकट होगा।
उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में
प्रधानतः अग्नि, इन्द्र और देवता; उनकी भक्ति अर्थात् लोक,
सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, कर्म; तथा भक्तिविशेष
(अवान्तर भेद) और उन्हींको संस्तावक देवता; तथा ८ वसु,
११ रुद्र, १२ आदित्य, १ इन्द्र और १ प्रजापति का यजन
व्यष्टिरूप से कहा है । वैसा इस उपासनाकाण्ड में भी प्रधानतः
विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य इन पांच देवताओं का
यजन कहा है । इन सब के अवान्तर भेद अपरिच्छिन्न
हैं। जैसे चतुर्दश विद्या-प्रस्थान, वा अष्टादश विद्या-प्रस्थान का
संक्षेप (बीज) प्रणव (ओ ३ म् ) है; अर्थात् वाङ्मयमात्र
का बीज प्रणव (अक्षर) है। वैसाही सब देवताओं का मूल
ईश्वर (अक्षर) है। अर्थात् देवतामात्र ईश्वर से अभिन्न है।
और देवताओं की विभूति के विषय में यह श्रुति है-
'त्रीणि शता त्रीणि सहस्रायग्निं
त्रिंशच्चदेवा नवं चासपर्यन् ।' य. ३३ । ७ ।
'त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्रीं च सहस्रेति' बृ. ।
१-४ 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष. ईश्वरः १ । २४' अविद्या
आदि क्लेश, शुभाशुभ कर्मों के फल और वासना से निर्लेप पुरुष विशेष (पुरुषो-
त्तम) ईश्वर है। 'तस्य वाचकः प्रणवः १ । २७' उस ईश्वर का वाचक (बोधक)
प्रणव है। अर्थात् ईश्वर वाच्य और प्रणव वाचक है। ये सब उपासना के विषय
योगदर्शन में स्पष्ट हैं । प्रणव की महिमा माण्डूक्य में कही है । प्रणव वह
'अक्षर' है जो शब्दतः भी ईश्वर से अलग नहीं है । व्याससूत्र में लिखा है
कि 'अक्षरमम्बरान्तधृतेः १ । ३ । १०' इससे अर्थावगति के अभाव में भी मन्त्र जप
से ईश्वर का प्रसन्न होना निर्विवाद है । उपास्य ईश्वर, उपासक (योगी) से
परमार्थ में पृथक् नहीं है। उपनिषद में कहा है कि 'तत् त्वम् असि' इत्यादि ।