मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
और यथाप्रसङ्ग आगे ज्ञानकाण्ड में आवेंगे ।
१०२ मनुस्मृति ।
काको हंसति हंस एति बकतां वर्णोऽन्यवर्णायते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥ १६६ ॥'
उक्त विषय के सहायक प्रमाण-वाक्य पहिले आचुके हैं
और यथाप्रसङ्ग आगे ज्ञानकाण्ड में आवेंगे ।
मन्त्र और उसका अर्थ देवता, इन दोनों का जैसे श्रुति-
स्मृति में प्रतिपादन है वैसाही उनका तन्त्र ( आगम ) में भी
पूर्ण प्रतिपादन है । पहिले विष्णु-शिव की एकता लिखी जा
चुकी है अब देखिये ब्रह्मा, विष्णु, शिव नवार्णमन्त्र-प्रतिपाद्य
शक्ति के ऋषि कहे हैं; तथा अन्यान्य तन्त्रों में राम-कृष्ण की
उपास्य अन्यान्य शक्ति लिखी हैं, तथा मन्त्रशास्त्रीय-बीज
( वर्णविशेष ) राम-कृष्ण के मन्त्र में पड़े हैं, पढ़िये रामतापनी-
गोपालतापनी उपनिषत् । तथा ओडचाणपाठस्थायी श्री
जगन्नाथजी के प्रसादभक्षण की व्यवस्था को देखकर कति-
पय लोग उसे वामाचरण ठहराते हैं, इसीके आस पास श्री
बदरीनारायण में अटके की हाल है । इधर प्रायः सब संप्र-
दायी वैष्णवलोग अपने अपने संप्रदायानुसार दीक्षितलोगों
में वर्णभेद का आदर नहीं रखते इत्यादि ।
३ ज्ञानकाण्ड। उपासनाकाण्ड में सविशेष-ब्रह्म (साकार)
का विस्तारपूर्वक निरूपण होचुका है । अब निर्विशेष-ब्रह्म
(निराकार) का निरूपण किया जाता है। यद्यपि वर्तमान-
काल में ज्ञानमार्ग के अधिकारी देखने में नहीं आते, जो
दीखते हैं वे कर्मभीरु वा कर्म के अनधिकारी होने के कारण
ज्ञान का शरण ले रहे हैं तो भी ' कालोह्ययं निरवधिर्विपुला
च पृथ्वी ' की न्याय से कोई ज्ञानमार्ग के भी अधिकारी
होंगे इस दृष्टि से उसके मन्तव्य विषय में कुछ सिद्धान्त लिखते
भूमिका । १०३
हैं। परमेश्वर के निर्विशेषरूप का निरूपण ( अशब्दमस्पर्श-
मरूपमव्ययं-' इस श्रुति में किया है और इसी अभिप्राय की
ये श्रुतियां हैं-
‘ अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमपदेश्यमैकात्म्यप्र-
त्ययसारम्प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स
आत्मा स विज्ञेयः। ' माण्डूक्य.
‘यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं
विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति
धीराः।' मुण्डक.
‘ यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति-’ इत्यादि।
बृहदारण्यक.
इन सिद्धान्त श्रुतियों से निर्विशेष ब्रह्म ( निराकार )
अर्थात् नाम-रूप आदि समस्त उपाधि से रहित केवल सच्चिदा-
नन्द ज्ञात होता है । इसी कारण वह श्रुति-स्मृतिरूप नेत्रही
से कथमपि देखने योग्य है अन्य नेत्रद्वारा नहीं देखा जा
सकता। यही बात इन श्रुति-स्मृतियों से स्पष्ट है-
‘ पराञ्चिखानि व्यतृणत् स्वयंभूः
तस्मात् पराङ् नान्तरात्मम् ।
कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैच्छ-
दावृत्ते चक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ '
कठ.
'भावार्थ-परमेश्वर ने इन्द्रियों को आत्मा के ग्रहण करने '
में समर्थ नहीं बनाया इस कारण वे स्थूल पदार्थ ही का ग्रहण
कर सकती हैं उस आत्मा के प्रत्यक्षकरने में असमर्थ हैं ।
१०४ मनुस्मृति ।
कोई सा जितेन्द्रिय महापुरुष मोक्ष की वासना से शास्त्रद्वारा
आत्मा का प्रत्यक्ष करता है ।
‘चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व-
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥’
मुण्डक.
‘यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः ।
ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥’
स्मृति.
और यही आशय ‘अपि संराधने प्रत्यक्षाऽनुमानाभ्याम्’
(वे०द० ३।२।२४) इस सूत्र का है तथा इस कल्पतरु
के श्लोक का है—
‘अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थध्यानजाप्रमा ।
शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः परः ॥’
इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि उस निर्विशेष (निराकार)
परात्मा का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता वह केवल ज्ञानगम्य है।
और जो कहीं इसका प्रत्यक्ष होना लिखा है वह सब मायासृष्टि
है, इसीलिये ‘माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद’
यह कहा है। और यही अभिप्राय भगवद्गीता में अर्जुन ने
भगवान् के दिव्यरूप को जो देखा है उसका है। कृष्ण-भगवान्
के साधारण अवतारस्वरूप को तो उस समय के सबलोग
देखते ही रहे। यही बात रामावतार में भी जाननी चाहिये ।
सविशेष और निर्विशेष इन दो विशेषणों से ब्रह्म दो
प्रकार का जाना जाता है उनमें सविशेष अर्थात् नाम-रूप की