मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ मनुस्मृति ।
ऽप्यव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मान् प्रतिजानीत, ततश्च
व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद् धर्मोत्कर्षवशा-
चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते ।' इति ।
अवतार। जब उक्त श्रुति स्मृति पुराण इतिहास से देवता
जडरूप भौतिकमात्र नहीं हैं; किंतु योगियों के समान ऐश्वर्य-
वान् चेतन हैं; एकही काल में नानाविधरूप धारण करने को
समर्थ हैं; जगत् के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप कर्मों के अनुसार
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र हैं; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ
नाम से विभक्त कर्मेन्द्रिय के अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु और
प्रजापति नाम से विख्यात अधिष्ठाता हैं; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसन और घ्राण नाम से विभक्त ज्ञानेन्द्रिय के दिक्, वात,
अर्क, वरुण और अश्वी नाम से प्रसिद्ध अधिष्ठाता हैं; मन,
बुद्धि, चित्त और अहंकार नाम से विभक्त अन्तःकरण के
चन्द्र, चतुर्मुख, शंकर और अच्युत नाम से प्रसिद्ध स्वामी हैं;
तथा वे पिण्डाण्ड में ब्रह्माण्ड के दैवत भावनानुसार नाना-
नामधारी हैं; और इस जगद् की सारी व्यवस्था (प्राकृतिक
नियम) एकस्वामिक के समान व्यवस्थित देखने में आती
है; न कि 'मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती' के
न्याय से जैसे अनेक अधिकारियों से एक अधिकार अव्यव-
स्थित होता है, वैसी जगत् की कोई व्यवस्था अव्यवस्थित
नज़र आती है; तब अगत्त्या गुणकर्मानुसारी नानाविध नाम-
रूप का उपसंहार करके जगत् का एकस्वामी 'परमेश्वर'
अङ्गीकार करना पड़ता है । ऐसी दशा में जगत् के कल्या-
णार्थ गुणकर्मानुसारी नामरूपधारी अवतार अङ्गीकार करने
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; यदि कहाजाय कि व्याप-