मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय । ३३३
नवां अध्याय । ३३३
समय मना करने पर भी जो स्त्री मद्यपान करे, गान आदि
में शरीक हो, उस पर छः कृष्णल दण्ड राजा करे । कोई
द्विज अपनी या दूसरी जाति की स्त्री से विवाह करे तो उस
की जाति मर्यादा के अनुसार आदर, आभूषण, घर का
प्रबन्ध करे ॥ ७८-८५ ॥
भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्यं च नैत्यकम् ।
स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नास्वजातिः कथञ्चन ॥ ८६ ॥
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयान्यया ।
यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ८७ ॥
उन स्त्रियों में जो अपनी जाति की हों वे पतिसेवा और धर्मकर्म
करें; दूसरे जाति की कभी न करें । पर जो मूर्खता से अपनी
जाति की स्त्री रहते दूसरी से कर्म कराता है उसको चाण्डाल
समान जाने--यह ऋषियों ने कहा है ॥ ८६-८७ ॥
उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च ।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधि ॥ ८८ ॥
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ ८९ ॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती ।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ ९० ॥
अदीयमानां भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् ।
नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ ९१ ॥
अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा ।
मातृकं भ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ ९२ ॥
३३४ मनुस्मृति ।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन् ।
स हि स्वाम्यादतिक्रामेदृतूनां प्रतिरोधनात् ॥ ९३ ॥
कन्या-विवाह ।
कुलीन, सुंदर और समान जाति का वर मिले तो पिता विवाह-
योग्य अवस्था न होने पर भी शास्त्ररीति से कन्यादान कर दे।
कन्या को ऋतुमती होने पर भी मरणपर्यन्त बैठी रक्खे पर
गुणहीन वर को कभी दान न करे । यदि पिता गुणी वर मिलने
पर विवाह न करे और कन्या ऋतुमती होती हो तो वह तीनवर्ष
तक प्रतीक्षा करके अपनी इच्छानुसार पति से विवाह कर ले ।
जिस कन्या का विवाह पिता न करता हो वह यदि स्वयं विवाह
कर ले तो कन्या पुरुष को कोई दोष नहीं लगता । स्वयं वर को
स्वीकार करनेवाली कन्या पिता-माता या भाई का दिया आभूषण
न ले; अगर ले तो चोर है । ऋतुमती कन्या का विवाह करनेवाला
उसके पिता को धन न दे । क्योंकि ऋतुकाल में सन्तान का रोक
पिता के कारण होनेसे उसका हक्क जाता रहा ॥ ८८-९३ ॥
त्रिंशद्वर्षो वहेत्कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् ।
त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ ९४ ॥
देवदत्तां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छयात्मनः ।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन् ॥ ९५ ॥
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः ॥ ९६ ॥
कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ९७ ॥
तीस वर्ष का पुरुष बारह वर्ष की सुन्दरी कन्या से विवाह करे।
या चौबीस वर्ष का आठवर्ष की कन्या से करे। और अग्निहोत्रादि