मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय । २२३
सातवां अध्याय । २२३
पीछे भगता है और शत्रु उसको मार डालते हैं, वह अपने राजा
का सब पाप पाता है ॥ ९३-९४ ॥
यच्चास्य सुकृतं किंचिदमुत्रार्थमुपार्जितम् ।
भर्त्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु ॥ ९५ ॥
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून् स्त्रियः ।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥ ९६ ॥
राज्ञश्च दद्युरुद्धारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम् ॥ ९७ ॥
एषोऽनुपस्कृतः प्रोक्तो योधधर्मः सनातनः ।
अस्माद्धर्मान्न च्यवेत क्षत्रियो घ्नन् रणे रिपून् ॥ ९८ ॥
जो लड़ाई से भगा हुआ मारा जाता है, उसके पुण्य का भाग
सब स्वामी को मिलता है । युद्ध में रथ, घोड़ा, हाथी, छत्र, धन,
धान्य, पशु, स्त्री और सब भांति के पदार्थ जो जिसको जीते, वह
उसका है । जीते पदार्थों में सोना, चांदी आदि उत्तम पदार्थ राजा
को अर्पण करे-ऐसी वेद की श्रुति है । और साथ में जीती वस्तु,
हिस्सा माफ़िक, राजा सब योद्धाओं को बांट देवे । यह सनातन,
अनिन्दित, शुद्ध योद्धाओं का धर्म कहा गया है । संग्राम में क्षत्रिय
को इन धर्मों से च्युत न होना चाहिए ॥ ९५-९८ ॥
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ९९ ॥
एतच्चतुर्विधं विद्यात्पुरुषार्थप्रयोजनम् ।
अस्य नित्यमनुष्ठानं सम्यक्कुर्यादतन्द्रितः ॥ १०० ॥
अलब्धमिच्छेदण्डेन लब्धं रक्षेद्दवेक्षया ।
२२४ · मनुस्मृति ।
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ १०१ ॥
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसार्थरेः ॥ १०२ ॥
जो पदार्थ नहीं मिला है उसके लेने की इच्छा, मिले हुए की रक्षा
करे। जो रक्षित है, उसको बढ़ावे और बढ़े पदार्थ सुपात्रों को देवे ।
यह चार प्रकार का पुरुषार्थ है । आलस्य छोड़ कर, नित्य भली
भांति इसका अनुष्ठान किया करे । जो नहीं प्राप्त है, उसको दण्ड-
सेना से जीतने की इच्छा करे, प्राप्त वस्तु की देख भाल से रक्षा
करे, रक्षित का व्यापार-उद्यम से वृद्धि करे और बढ़ी वस्तु शास्त्रा-
नुसार, सुपात्र को देवे । राजा अपराधियों के लिए दण्ड उद्यत
रक्खे, पुरुषार्थ को ठीक रक्खे, अपने अर्थों को गुप्त रक्खे और शत्रु
के छिद्रों को देखा करे ॥ ६६-१०२ ॥
नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ १०३ ॥
अमाययैव वर्तेत न कथंचन मायया ।
बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ १०४ ॥
नास्यच्छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु ।
गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥
बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् ।
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥ १०६ ॥
सदा उद्यत दण्डवाले राजा से, सारा जगत् डरता है । इसलिए
दण्ड ही से सब प्राणियों को स्वाधीन रक्खे। छल से कोई व्यवहार
न करे । अपनी रक्षा करता रहे और शत्रु के छलों को जानता रहे ।
ऐसा उपाय करे जिसमें अपना छिद्र-दोष शत्रु न जाने । परन्तु शत्रु
के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछुवे के समान राजकीय अङ्गों
को छिपा रक्खे, जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे। बगला की
भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे। सिंह के समान
शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौक़ा पाकर शत्रुक्षय
करे। और खरगोश के समान, आपत्तियों से भग जावे ॥ १०३-१०६॥
एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तानानयेद्वशं सर्वान्सामदिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥
यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैनिभिः ।
दण्डेनैव प्रसह्यैतांञ्छनकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥
सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥
यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ॥ ११० ॥
इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हों उनको साम-
दाम-भेद से अपने वश में करे। यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वश
में न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे। विचार-
वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपायों में, राज्यवृद्धि
के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं। जैसे खेत निराने
वाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर,
लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करे ॥ १०७-११० ॥
मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया ।
सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः॥१११॥
शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा ।
तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥११२॥
२६
२२६ । मनुस्मृति ।
राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् ।
सुसंगहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ ११३ ॥
जो राजा, अज्ञानवश बिना विचार, अपने राज्य को दुःख देता
है वह शीघ्र ही राज्य, जीवन और बान्धवों से भ्रष्ट होजाता है।
जैसे शरीर के शोषण से प्राणियों के प्राण घटते हैं, वैसे, राष्ट्र को
दुःख देने से, राजाओं के भी प्राण घटते हैं। राजा देश की रक्षा
के लिए, ऊपर कहे उपायों को करे क्योंकि-राज्यरक्षा से राजा
की सुखवृद्धि होती है ॥ १११-११३ ॥
द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् ।
तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ॥ ११४ ॥
ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा ।
विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च ॥ ११५ ॥
ग्रामदोषान् समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम् ।
शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने ॥ ११६ ॥
विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् ।
शंसेद्ग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम् ॥ ११७॥
यानि राजप्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः ।
अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुयात् ॥ ११८॥
दो, तीन, पांच या सौ ग्रामों के बीच में, रक्षा करनेवाले पुरुषों
का एक महकमा क़ायम करे। एक गाँव का, दश का, बीस का, सौ का
और हज़ार गांव का एक-एक अधिपति नियत करे। गाँव का मालिक
गाँव के बखेड़ों को धीरे से जानकर उसका फ़ैसला करदे, या दश
गाँव के मालिक को सूचित करदे, या वह बीस गाँव के मालिक
को इत्तला करदे इत्यादि। जो अन्न, ईंधन वगैरह राजा को देनेवाले