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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 649 में से

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पृष्ठ 58

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५६ मनुस्मृति ।

[Main Text]
किसी किसी निषिद्ध का विधान भी किया है । और वैदिक
' पशुसंज्ञपन ' पिष्टपशु साध्य है, यह भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि ' न वा उ एतन्म्रियसे-' इस उक्त श्रुति का विरोध
होता है, तथा ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि '
इत्यादि श्रुतियों का पैष्टिक पशु में अत्यन्त बाध है तथा
पिष्टपशु करने का विधिवाक्य भी नहीं है जो ' श्रूयते हि पुरा
कल्पे नृणां व्रीहिमियः पशुः ' इत्यादि वाक्यों से विधि की कल्पना
की जाती है वह ' पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते '
इसके समान उपेक्षणीय है । और जिस लक्ष्य से पिष्टपशु का
विधित्व माना जाता है उससे भी छूटना असंभव है क्योंकि-
' व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो
मा वा धावतये ध्रुवं हिंसा ॥ ' तो अशास्त्रीयकर्म में अहंभाव से
पड़कर क्या फल है ? धन, नहीं निधन....इत्यादि ।
अग्निपुराण की शिक्षा है कि-
' अग्निष्टोमादिकर्माणि सापायानि कलौयुगे ।
गङ्गास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम् ॥ '
संस्कार-व्यय । जातीय संस्कार ( द्विजत्वघटक-संस्कार )
में अल्पव्यय है । यदि ऐसा न होता तो धनिक ही जातिमान्
बन सकते; यह बात गृह्यस्मृतियों के देखने से साफ जाहिर है ।
पारस्कर गृह्यस्मृति के प्रधान व्याख्याता कर्काचार्य आव-
सथ्याधान के ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' इस अन्तिम सूत्र की
व्याख्या में सिद्धान्त करते हैं कि एक ब्राह्मण भोजन कराना ।
आशय यह है कि जहां प्रकृत के समान संख्या का ज्ञान न
हो वहां एक ब्राह्मण लेना और जहां ' ब्राह्मणान् भोजयित्वा'

[Footnote]
१ बृहन्नार में ।