वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५३
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५३
न्यायकन्दली
शब्देन संयुज्यते ? यदि तावदर्थे शब्दं संयोजयति ? तत्रापि किं शब्दात्मकमर्थं करोति ?
किं वा शब्दाकारोपरक्तं गृह्णाति ? आहोस्वित्छब्देन व्यपदिशति ?
न तावत्प्रतीतिरर्थं शब्दात्मकं करोति, अर्थस्य निर्विकल्पकगृहीतेनैव स्वरूपेण
विकल्पज्ञानेऽपि प्रतिभासनात्, अर्थक्रियाकरणाच्च । अन्यथा व्युत्पन्नाव्युत्पन्नयोर्युगपदे-
कार्थव्यवसायायोगात् ।
अथ शब्दाकारोपरक्तमर्थं गृह्णाति ? तदप्ययुक्तम्, अप्रतीतेः । निर्विकल्पकज्ञाने-
नार्थे गृहीते प्रागनुभूतस्तद्वाचकः शब्दः, स्मर्यते, प्रतियोगिदर्शनात् । स्मृत्या रूढश्चासौ
तदर्थे एवार्थं परिच्छिनत्ति, न तु स्फटिक इव नीलोपरक्तः शब्दाकारोपरक्तोऽर्थो गृह्यते,
शब्दस्याचाक्षुषत्वात्, केवलस्यैवार्थस्येदन्तया निर्विकल्पकवत् प्रतिभासनाच्च । न च वाचके
स्मर्यमाणे वाच्यस्य काचित् स्वरूपक्षतिरस्ति, येनायं सत्यपीन्द्रियसंयोगे प्रत्यक्षतां न
लभते । यथोक्तम्-
(१) शब्द संयोजनात्मिका प्रतीति ही 'कल्पना' है, इस पक्ष के प्रसङ्ग में यह
पूछना है कि यह प्रतीति क्या अर्थ के साथ शब्द को सम्बद्ध करती है या वह
स्वयं ही शब्द के साथ सम्बद्ध होती है ?
यदि यह कहें कि 'अर्थ में ही शब्द को सम्बद्ध करती है' तो फिर इस पक्ष में
पूछना है कि वह प्रतीति शब्दस्वरूप अर्थ को ग्रहण करती है (अर्थात् अर्थ में
शब्द को अभेद सम्बन्ध से सम्बद्ध करती है) अथवा शब्दाकार से अर्थ को ग्रहण
करती है ? अथवा शब्द के द्वारा अर्थ का व्यवहार करती है (इन तीनों पक्षों में
से पहिले पक्ष के अनुसार यह कहना अयुक्त है कि उक्त कल्पना रूप प्रतीति) अर्थ
को शब्द से अभिन्न रूप में ग्रहण करती है, क्योंकि जिस रूप से अर्थ निर्विकल्पक
ज्ञान में भासित होता है, उसी रूप से सविकल्पक ज्ञान से भी गृहीत होता है ।
एवं (सविकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात) अर्थ ही 'अर्थक्रियाकारी' अर्थात् कार्योत्पादक
भी है (क्योंकि अर्थ में शब्द का अभेद समारोपित ही है, स्वाभाविक नहीं,
समारोपि अर्थ से किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है) । अन्यथा (यदि सविकल्पक
प्रत्यक्ष शब्द विशिष्ट अर्थ विषयक ही हो तो फिर) व्युत्पन्न (शब्द अर्थ के वाच्य-
वाचकभाव सम्बन्ध से अभिज्ञ) पुरुष एवं 'अव्युत्पन्न (उक्त सम्बन्ध से अनभिज्ञ)
पुरुष दोनों को एक ही समय एक ही विषयक सविकल्पक ज्ञान नहीं होंगे ।
शब्द से उपरक्त अर्थ को ही 'सविकल्पक ज्ञान ग्रहण करता है' यह पक्ष भी अनुभव
से विरुद्ध होने के कारण अयुक्त है, क्योंकि अर्थ (शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का)
प्रतियोगी है, उसी के निर्विकल्पक ज्ञान रूप दर्शन' से पूर्वानुभूत उस अर्थ के वाचक शब्द
का स्मरण होता है । उस स्मृति का विषय होकर ही वाचक शब्द उस अर्थ के साथ
४५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते ।
संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥ इति ।
प्रतीतिः शब्देन संसृष्टार्थं व्यपदिशतीत्यपि न सुप्रतीतम्। आत्मा हि चेतनः प्रतिसन्धानादि-
सामर्थ्यात् सङ्केतकालानुभूतं वाचकशब्दं स्मृत्वा तेनार्थं व्यपदिशति । घटोऽयमिति न
प्रतीतिः, तस्याः प्रतिसन्धानादिसामर्थ्याभावात् । एवं तावत्प्रतीतिर्न शब्दं संयोजयति ।
नापि स्वयं शब्देन संयुज्यते, ज्ञानस्य तद्व्यतिरिक्तस्य चाकारस्य
सम्बद्ध होकर निश्चित होता है । जिस प्रकार नीलवर्ण के द्रव्य के साथ सम्बद्ध
होने पर वह स्फटिक नीलवर्ण से युक्त-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार शब्द से
युक्त होकर अर्थ की प्रतीति नहीं होती है, क्योंकि (घटादि अर्थ चक्षु से गृहीत
होते हैं किन्तु) शब्द का चक्षु से ग्रहण नहीं होता । दूसरी यह भी बात है कि (यह
नियम नहीं है कि सभी सविकल्पक ज्ञान शब्द से युक्त अर्थ को ही ग्रहण करें)
केवल अपने इदन्त्वादि असाधारण रूप से भी वह निर्विकल्पक ज्ञान की तरह अर्थ
को ग्रहण करता है (अर्थात् जिस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान में अर्थ इदन्त्वादि अपने
असाधारण रूपों से भासित होता है, उसी प्रकार कुछ सविकल्पक ज्ञानों में भी
होता है, अन्तर केवल इतना होता है कि निर्विकल्पक ज्ञान में विशेष्य और
विशेषण दोनों ही विश्लिष्ट ही भासित होते हैं; किन्तु सविकल्पक ज्ञान में दोनों
संश्लिष्ट ही भासित होते हैं) वाचक शब्द की स्मृति हो जाने से वाच्य अर्थ के
स्वरूप में ऐसी कोई विच्युति नहीं आती कि इन्द्रियसंप्रयोग के रहने पर भी
(इदन्त्वादि असाधारण रूप से) उसका प्रत्यक्ष न हो सके । जैसा कहा गया है कि-
संज्ञा की स्मृति होने पर भी वह अपने वाच्य अर्थ के प्रत्यक्ष में कोई बाधा नहीं
ला सकती, क्योंकि अपने अर्थ के प्रसङ्ग में उदासीन होने के कारण उसके अर्थ में
प्रत्यक्ष होने की जो योग्यता है-उसे तिरोहित करने का सामर्थ्य उसमें नहीं है ।
यह पक्ष भी ठीक नहीं जँचता कि 'प्रतीति (सविकल्पक प्रत्यक्ष ) शब्द से सम्बद्ध
अर्थ का व्यवहार करती है' क्योंकि प्रतीति अचेतन है, उसमें स्मरण करने का सामर्थ्य
नहीं है; चेतन आत्मा में ही स्मरणादि का ऐसा सामर्थ्य है कि शब्दार्थ सङ्केत के
समय अनुभूत वाचक शब्द को स्मरण कर उससे 'घटोऽयम्' इत्यादि व्यवहार का
सम्पादन कर सकती है । इस प्रकार 'प्रतीति शब्द को अर्थ के साथ सम्बद्ध करती
है' यह पक्ष (अपने सभी विकल्पों के अनुपपन्न होने के कारण) अयुक्त है ।
(सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप प्रतीति स्वयं शब्द के साथ सम्बद्ध होती है) यह पक्ष भी
अयुक्त है, क्योंकि ज्ञान एवं उसके आकार दोनों ही 'क्षणिक' होने के कारण असाधारण
हैं (अर्थात् एक ज्ञान और उसका आकार एक ही पुरुष के द्वारा ज्ञात होता है)