वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ८५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ८५
न्यायकन्दली
मित्युच्यते । पितुः शुक्लं मातुः शोणितं तयोः सन्निपातानन्तरं जठरानलसम्बन्धा-
च्छुक्रशोणितारम्भकेषु परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सति समानगुणान्तरोत्पत्तौ द्व्यणुकादि-
प्रक्रमेण कललशरीरोत्पत्तिस्तत्रान्तःकरणप्रवेशो न तु शुक्रशोणितावस्थायाम्, शरीरा-
श्रयत्वान्मनसः । तत्र मातुराहाररसो मात्रया संक्रामति, अदृष्टवशात् । तत्र पुनर्जठरानल-
सम्बन्धात् कललारम्भकपरमाणुषु क्रियाविभागादिन्यायेन कललशरीरे नष्टे समुत्पन्नपाकजैः
कललारम्भकपरमाणुभिरदृष्टवशादुपजातक्रियैराहारपरमाणुभिः सह सम्भूय शरीरान्तर-
मारभ्यत इत्येषा कल्पना शरीरे प्रत्यहं द्रष्टव्या। शरीरभेदे किं प्रमाणम् ? परिमाणभेदः,
स्वल्पपरिमाणावच्छिन्ने आश्रये महत्परिमाणस्य परिसमाप्त्यभावात् । अवस्थान्तरमापन्नं
शरीरं तदाश्रयो भवतीति चेत् ? अवस्थान्तरमाहारावयवसहकारिणः शरीरा-
पिता का शुक्र एवं माता का शोणित इन दोनों के मेल के बाद माता के उदर
सम्बन्धी तेज से शुक्र के और शोणित के आरम्भक परमाणुओं के पहले के रूपादि
का नाश एवं दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । परिवर्तित रूपादि से युक्त इस
शुक्र और शोणित के परमाणुओं से 'कलल' नाम के शरीर की उत्पत्ति होती है ।
इस शरीर में ही मन का सम्बन्ध होता है, शुक्रशोणितावस्था में नहीं; क्योंकि मन
शरीर में ही रह सकता है । उस शरीर में माता से खायी हुई वस्तुओं के रस का
कुछ अंश सम्बद्ध होता है । अदृष्टवश उस 'कलल' नामक शरीर के आरम्भक
परमाणुओं में क्रिया होती है, फिर विभाग होता है । इस प्रकार द्रव्य नाश के
कथित क्रम से उस कलल शरीर का नाश हो जाता है । इस नाश के बाद कलल
के आरम्भक परमाणुओं के पहले रूपादि का उसी तेज के संयोग से नाश होता है
और दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । पाकज रूपादि से युक्त कलल के
आरम्भक ये परमाणु, अदृष्ट से उत्पन्न क्रिया से युक्त (माता के) आहार के
परमाणुओं से मिलकर दूसरे शरीर को उत्पन्न करते हैं । शरीर के नाश और
शरीरान्तर की उत्पत्ति की यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती है । अभिप्राय यह है कि
अवस्था की वृद्धि के साथ हाथ-पैर प्रभृति अङ्गों की लम्बाई-चौड़ाई कुछ हद तक
बढ़ती है, या शरीर ही कुछ दुबला-पतला होता ही रहता है । यह ह्रास
और वृद्धि पहले शरीर के नाश के बाद अभिनव शरीर की उत्पत्ति मानने
पर ही सम्भव है । इसी विषय को प्रश्नोत्तर रूप से समझाते हैं । (प्र.) एक ही
व्यक्ति के भिन्न-भिन्न शरीर मानने में क्या प्रमाण है ? (उ.) परिमाण का भेद (ही
प्रमाण है) । अल्प परिमाण के द्रव्य में उससे बड़े परिमाण का समावेश नहीं हो
सकता । (प्र.) वही शरीर दूसरी अवस्था पाकर उस बड़े परिमाण का आश्रय
होगा । (उ.) इस दूसरी अवस्था का उत्पादक कौन है ? आहार के अवयवों
२०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ते च न शरीरेन्द्रियगुणाः, कस्मादहङ्कारेणैकवाक्यताभावात् प्रदेशवृत्तित्-
शरीर और इन्द्रिय के गुण नहीं हैं; क्योंकि (१) अहङ्कार के साथ उनकी प्रतीति
नहीं होती है। (२) वे अपने आश्रय के किसी प्रदेश में रहते हैं ।
न्यायकन्दली
सिद्धे बाल्यावस्थानुभूतस्य वृद्धावस्थायामस्मरणप्रसङ्गात् ।
न केवलं पूर्वोक्तैर्हेतुभिः, सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभिश्च गुणैर्गुण्यनुमीयते । अहङ्कारेणाहमिति-
प्रत्ययेनैकवाक्यत्वमेकाधिकरणत्वं सुखादीनाम् 'अहं सुखी, अहं दुःखी' इत्यहङ्कारप्रत्यय-
विषयस्य सुखाद्यवच्छेदस्य प्रतीतेः । अहंप्रत्ययश्च न शरीरालम्बनः, परशरीरेऽभावात् ।
स्वशरीर एवायं भवतीति चेत्, न, अविशेषात् । शरीरालम्बनोऽहंप्रत्ययः स्वशरीरवत्
परशरीर- मपि चेत् प्रत्यक्षं तत्र यथा स्थूलादिप्रत्ययः स्वशरीरे परशरीरेऽपि भवति,
एवमहमिति प्रत्ययोऽपि स्यात्, स्वरूपस्योभयत्राविशेषात् । स्वसम्बन्धिताकृते तु विशेषे
तत्कृत एवायं प्रत्ययो न शरीरालम्बनः, तदालम्बनत्वे चान्तर्मुखतयापि न भवेत् । अत
एवायं नेन्द्रियालम्बनः, इन्द्रियाणामतीन्द्रियत्वात्, अस्य च लिङ्गशब्दानपेक्षस्य
मान लेने पर) बाल्यावस्था में अनुभूत विषय का स्मरण वृद्धावस्था में अनुपपन्न हो
जायगा ।
केवल पहले कहे हुए हेतुओं से ही नहीं; किन्तु सुख, दुःख, इच्छा, द्वेषादि
गुणों से भी गुणी आत्मा का अनुमान होता है । 'अहङ्कार से', 'अहम्' इस प्रकार
की प्रतीति से एवं सुखादि के एकवाक्यत्व अर्थात् एकाधिकरणत्व से भी (आत्मा
का अनुमान होता है); क्योंकि 'अहं सुखी, अहं दुःखी' इत्यादि प्रतीतियों में
'अहम्' शब्द के अर्थ का सुखादियुक्त रूप से ही भान होता है, 'अहम्' इस
आकार की प्रतीति का विषय शरीर नहीं हो सकता है; क्योंकि दूसरे के शरीर में
'अहम्' इस आकार की प्रतीति नहीं होती है । केवल अपने ही शरीर में 'अहम्'
शब्द की प्रतीति होती है । (प्र.) (यतः) अपने ही शरीर में 'अहम्' इस
आकार की प्रतीति होती है (अतः वही अहंप्रत्यय का विषय हो) । (उ.)
इस कथन में कोई विशेष नहीं है; क्योंकि 'अहम्' यह प्रतीति यदि शरीरविषयक
है, तो फिर स्वशरीरविषयक और परशरीरविषयक दोनों होगी, जैसे कि स्थूलत्व
का प्रत्यक्ष होता है, वह स्वशरीर में भी होता है एवं परशरीर में भी होता है ।
इसी प्रकार 'अहम्' प्रतीति भी दोनों में समान होगी; क्योंकि स्वशरीर और
परशरीर के स्वरूपों में कोई अन्तर नहीं है । यदि अपना सम्बन्ध ही अपने शरीर
में विशेष मानें ? तो फिर वह प्रतीति उस सम्बन्धविषयक ही होगी (आत्मविषयक
नहीं) । एवं 'अहम्' प्रतीति अगर शरीरविषयक हो तो फिर अन्तर्मुखतया
उसकी उत्पत्ति नहीं होगी । अतएव 'अहम्' प्रतीति इन्द्रियविषयक भी नहीं है;
क्योंकि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय हैं एवं 'अहम्' प्रतीति प्रत्यक्षरूप है; क्योंकि इस