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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ८१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
त्रिविधं चास्याः कार्यम् । शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ।
इसके कार्य १. शरीर, २. इन्द्रिय और ३. विषय भेद से तीन प्रकार के
हैं ।
न्यायकन्दली
सा चानित्या कारणविभागस्याश्रयविनाशस्य च हेतोः सम्भवात् । कार्यलक्षणायाः
पृथिव्या अनित्यत्वेन सह धर्मान्तरं समुच्चिन्वन्नाह - सा चेति । स्थैर्य्यं निविडत्वम् ।
आदिशब्दात् प्रशिथिलत्वादिसङ्ग्रहः । अवयवानां सन्निवेशोऽवयवसंयोगविभागविशेषः ।
स्थैर्य्यादयश्चावयवसन्निवेशाश्च तैर्विशिष्टा अपरजातिबहुत्वोपेता गोत्वादिजातिबहुत्वस्य-
युक्त्यर्थः । परमाण्वादिष्वपरजात्यभावेऽप्यदृष्टवशात्तथा तथा तेषां व्यूहो यथा यथा
तदारब्धेष्वपरजातयो व्यज्यन्ते । नन्वदृष्टकारिता सर्वभावानां सृष्टिः, कार्यलक्षणा पृथिवी
कामर्थक्रियां पुरुषस्य जनयति, येनेयमदृष्टेन क्रियत इत्यत आह-शयनासनेति ।
शयनासनादयोऽनेक उपकारास्तत्कारिणी कार्यलक्षणेति ।
तारतम्य भी बढ़ता जाएगा, किन्तु इससे द्वयणुक में साक्षात् घट की उत्पादकता
सिद्ध नहीं होती है, क्योंकि घट के नष्ट होने पर अन्य छोटे-बड़े अवयव दीख
पड़ते हैं । उसी के अनुसार द्वयणुक से उत्पन्न होनेवाले कार्य की कल्पना करते
हैं । तस्मात् परमाणुओं से द्वयणुकादि क्रम से कार्यरूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है ।
यह कार्यरूप पृथिवी अनित्य है, क्योंकि आश्रयविनाश एवं अवयवों के
विभाग, कार्यविनाश के ये दोनों ही हेतु सम्भावित हैं । कार्यरूप पृथिवी में
अनित्यत्व के साथ और धर्मों का समावेश कहते हुए 'सा च' इत्यादि वाक्य
लिखते हैं । 'स्थैर्य्य' शब्द का अर्थ है निविड़त्व, कठोरता । 'आदि' पद से
प्रशिथिलत्व, कोमलत्व प्रभृति का संग्रह अभीष्ट है । 'अवयवसन्निवेश' शब्द का
अर्थ है अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग । ('स्थैर्य्याद्यवयवसन्निवेशविशिष्टा')
इस वाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि 'स्थैर्य्यादयश्च अवयवसन्निवेशाश्च
स्थैर्य्याद्यवयवसन्निवेशाः', 'तैः विशिष्टा स्थैर्य्याद्यवयवसन्निवेशविशिष्टा ।' 'अपर-
जातिबहुत्वोपेता' अर्थात् गोत्वादि अनेक प्रकार की अपर जातियाँ उसमें रहती हैं ।
यद्यपि कार्यरूप पृथिवी के मूल कारण परमाणुओं में ये अपर जातियाँ नहीं हैं,
किन्तु अदृष्टवश उनसे इस प्रकार से कार्यों की उत्पत्ति होती है कि उनमें ये
गोत्वादि अपर जातियाँ अभिव्यक्त होती हैं । अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति
अदृष्ट से ही होती है तो फिर यह कार्यरूपा पृथिवी जीवों के किन प्रयोजनों का
सम्पादन करती है कि उन्हें अदृष्ट से उत्पन्न मानें ? इसी प्रश्न का समाधान
'शयनासन' इत्यादि से देते हैं । अर्थात् शयन और आसन प्रभृति जीवों के अनेक
उपकरण कार्यरूपा पृथिवी के द्वारा सम्पादित होते हैं ।

८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-
प्रशस्तपादभाष्यम्
शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिनञ्च । तत्रायोनिजमनपेक्ष्य शुक्रशोणितं
देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते। क्षुद्रजन्तूनां यातनाशरीराण्य-
धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते । शुक्रशोणितसन्निपातजं योनिजम् । तद्
द्विविधम् जरायुजमण्डजञ्च । मानुषपशुमृगाणां जरायुजम् । पक्षिसरीसृपाणा-
मण्डजम् ।
इनमें शरीर १.योनिज और २. अयोनिज भेद से दो प्रकार का है ।
इनमें एक प्रकार के अयोनिज शरीर देवताओं और ऋषियों के हैं, जो शुक्र
और शोणित की अपेक्षा न रखकर विशेश प्रकार के धर्म और परमाणुओं
से ही उत्पन्न होते हैं । (दूसरे प्रकार के) अयोनिज शरीर (मशकादि) क्षुद्र
जीवों के हैं जो (शुक-शोणित की अपेक्षा न रखकर) अधर्म एवं
परमाणुओं से उत्पन्न होते हैं । शुक्र और शोणित के संयोग से उत्पन्न
शरीर को ही 'योनिज शरीर' कहते हैं । योनिज शरीर भी १. जरायुज
और २. अण्डज भेद से दो प्रकार का है । मनुष्य, पशु एवं मृगादि के
शरीर 'जरायुज' हैं एवं चिड़ियों और साँप प्रभृति जीवों के शरीर
'अण्डज' हैं ।
न्यायकन्दली
कार्यान्तरं त्वस्याः समुच्चिनोति-त्रिविधमिति । कार्यत्रैविध्यमेव दर्शयति-
शरीरेत्यादि । शरीरमिन्द्रियं विषय इति संज्ञा यस्य कार्यस्य तत्तथा । भोक्तुर्भोगायतनं
शरीरम्, मृतशरीरे तद्योग्यत्वात् तद्व्यपदेशः । शरीराश्रयं ज्ञातुरपरोक्षप्रतीतिसाधनं
द्रव्यमिन्द्रियम् । शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तमात्मनोभोगसाधनं द्रव्यं विषयः । शरीरभेदं
कथयति-योनिजमयोनिनञ्चेति । शुक्रशोणितसन्निपातो योनिः, तस्माज्जातं योनिजम्,
तद्विपरीतमयोनिजम् । तदेव दर्शयति-तत्रायोनिजमिति । तयोर्योनिजायोनिजयो-
पृथिवी के और कार्यों का सङ्कलन 'शरीर' इत्यादि से करते हैं । अर्थात्
शरीर, इन्द्रिय और विषय ये तीन नाम जिनके हैं वे ही 'शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञक'
हैं । भोग करनेवाला (जीव) जिस आश्रय में भोग करे वही 'शरीर' है । मृत शरीर में
भोग की योग्यता न होने के कारण शरीरत्व का व्यवहार नहीं होता है । शरीर में
रहनेवाला एवं जीव के अपरोक्ष ज्ञान का सम्पादक द्रव्य ही इन्द्रिय है । शरीर और
इन्द्रिय को छोड़कर जीवों के भोग के सम्पादक जितने द्रव्य हैं वे सभी 'विषय' हैं ।
'योनिजमयोनिजञ्च' इत्यादि से शरीर का भेद दिखलाते हैं । प्रकृत में 'योनि' शब्द का
अर्थ है शुक्र और शोणित का मेल । उससे उत्पन्न होनेवाले 'योनिज' कहलाते हैं, एवं
इसके विपरीत जो कार्य शुक्र और शोणित के मेल के बिना ही उत्पन्न होता है, उसे
'अयोनिज' कहते हैं । इस अर्थ को 'तत्रायोनिजम्' इत्यादि वाक्य से समझाते हैं ।