सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५
न्यायकन्दली
यद्यपि रूपं त्रयाणाम्, तथाप्यवान्तरभेदापेक्षया तदपि पृथिव्या एव वैधर्म्यमाह-
रूपमनेकप्रकारकमिति । अत्रापि क्षितावेवेत्यनुसन्धानीयं । शुक्लपीताद्यनेकविधं रूपं
क्षितावेव नान्यत्रेत्यर्थः । एकस्यां पृथिवीत्वजातौ नानारूपाणि व्यक्तिभेदेन समवयन्ति ।
क्वचिदेकस्यामपि व्यक्तावनेकप्रकाररूपसमावेशः, यत्र नानाविधरूपसम्बन्धिभिरवयवैर-
वयव्यारभ्यते । कथमेतदिति चेत् ? उच्यते, यथावयवैरवयव्यारब्धस्तथावयवरूपैर-
वयविनि रूपमारब्धव्यम्, अवयवेषु च न शुक्लमेव रूपमस्ति, नापि श्याममेव, किन्तु
श्यामशुक्लहरितादीनि । न च तेषामेकं रूपमेवारभते नापराणीत्यस्ति नियमः, प्रत्येक-
मन्यत्र सर्वेषामपि सामर्थ्यदर्शनात् । न च परस्परं विरोधेन सर्वाण्यपि नारभन्त एवेति
युक्तम् । चित्ररूपस्यावयविनः प्रतीतेरूपस्य द्रव्यस्य प्रत्यक्षत्वाभावाच्च । न चावयव-
रूपाणि समुच्चितान्यत्र चित्रधिया प्रतीयन्ते, तेनैवावयवी प्रत्यक्ष इति कल्पनायामन्यत्रापि
तथाभावप्रसङ्गेनावयविरूपोच्छेदप्रसङ्गः, तस्मात् सम्भूय तैरारभ्यते । तच्चारभ्यमाणं
यद्यपि रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीनों द्रव्यों में है, किन्तु अगर विशेष रूप
से देखा जाय तो अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं, इस प्रकार रूप भी
पृथिवी का असाधारण धर्म हो सकता है । इसी अभिप्राय से "रूपमनेक-
प्रकारकम्" यह वाक्य लिखा है । इस वाक्य में भी 'क्षितावेव' इतना इस
अभिप्राय से जोड़ देना चाहिए कि शुक्ल-पीतादि अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में
ही हैं और द्रव्यों में नहीं । एक ही पृथिवीत्व जाति के द्रव्यों में व्यक्तिभेद से
अनेक प्रकार के रूप देखे जाते हैं । कहीं एक ही व्यक्ति में नाना प्रकार के रूपों
का समावेश देखा जाता है, जहाँ कि नाना रूप के अवयवों से एक अवयवी की
उत्पत्ति होती है । (प्र.) यह कैसे होता है ? (उ.) जिस तरह अवयवों से अवयवी
की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार अवयवों के रूपों से अवयवी में रूप की उत्पत्ति
होती है । (कथित पट के) अवयवों में न केवल शुक्ल रूप ही है, न केवल नील
रूप ही, किन्तु श्याम, शुक्ल, हरित प्रभृति अनेक रूप हैं । इसका कोई नियामक
नहीं है कि उनमें से कोई एक ही रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न करता है और
रूप नहीं, क्योंकि उनमें से प्रत्येक रूप और जगह अवयवी में रूप को उत्पन्न
करते हुए दीख पड़ते हैं । यह भी ठीक नहीं है कि यहाँ परस्पर विरोध के
कारण कोई भी रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि चित्र रूप से
युक्त अवयवी का प्रत्यक्ष होता है एवं बिना रूप के द्रव्य का चाक्षुषप्रत्यक्ष हो भी
नहीं सकता । यह भी सम्भव नहीं है कि अवयवों के ही रूप अवयवी में
सम्मिलित होकर चित्रबुद्धि से प्रतीत होते हैं, एवं उसी चित्र रूप से अवयवी का
भी प्रत्यक्ष होता है; क्योंकि इस प्रकार की कल्पना से तो सभी अवयवी की यही
दशा होगी, फलतः अवयवियों से रूप की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् अवयवों

७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [द्रव्ये पृथिवी-
न्याय्कन्दली
विविधकारणस्वभावानुगमाच्छ्यामशुक्लहरितात्मकमेव स्यात्, चित्रमिति च व्यपदिश्यते ।
विरोधादेकमनेकस्वभावमयुक्तमिति चेत् ? तथा च प्रावादुकप्रवादः - "एकञ्च चित्रञ्चे-
त्येतत्तच्च चित्रतरं ततः" इति । को विरोधो नीलादीनाम्, न तावदितरेतराभावात्मकः,
भावस्वभावानुगमादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च । स्वरूपान्यत्वं विरोध इति चेत् ? सत्यमस्त्येव ।
तथापि चित्रात्मनो रूपस्य नायुक्तता, विचित्रकारणसामर्थ्यभाविनस्तस्य सर्वलोकप्रसिद्धेन
प्रत्यक्षेणैवोपपादितत्वात् । अचित्रे पार्श्वे पटस्यैव तदाश्रयस्य चित्ररूपस्य ग्रहणप्रसङ्ग-
स्तस्यैकत्वादिति चेत्, न, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां समाधिगतसामर्थ्यस्यावयवनानारूपदर्शन-
स्यापि चित्ररूपग्रहणहेतुत्वात्, तस्य च पार्श्वान्तरेऽभावात् । नन्वेवं तर्हि नानारूपैर्द्व्यणु-
कैरारब्धे द्रव्ये न चित्ररूपग्रहणम्, तदवयवरूपग्रहणाभावात् ? को नामाह न तथेति, न
हि परमसूक्ष्मस्य वस्तुनो रूपं विविच्य गृह्यते यस्य तु विविच्य गृह्यते तस्यावयवरूपाण्यपि
गृह्यन्ते । यस्यव्यापकानि बहूनि चित्ररूपाणीति मन्यते, तस्य नीलपीताभ्यामारब्धे
के सभी रूप मिलकर ही उस अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं । इस
अवयवी में उत्पन्न होनेवाला वह एक रूप कारणों के अनेक स्वभाव से श्याम,
शुक्ल और हरित स्वरूप ही होगा जो 'चित्र' शब्द से व्यवहृत होता है । (प्र.)
विरोध के कारण एक वस्तु को अनेक स्वभाव का मानना ठीक नहीं है । (उ.)
लोक में यह प्रसिद्ध है कि 'चित्र' रूप एक है और यह उस चित्र रूप से 'चित्रतर'
है । फिर नीलादि रूपों में परस्पर विरोध ही क्या है ? क्योंकि वे परस्पर
अभावस्वरूप नहीं हैं; क्योंकि उनमें से प्रत्येक में भावत्व की प्रतीति होती
है । एवं परस्पराभाव रूप मानने में अन्योन्याश्रय दोष भी होगा । (प्र.) एक में
दूसरे की स्वरूपभिन्नता ही दोनों में विरोध है ? (उ.) यह विरोध ठीक है,
किन्तु इससे चित्र रूप की अत्युक्तता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि विलक्षण कारणों
से उत्पन्न चित्र रूप सार्वजनीन प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है । (प्र.) जिस पट
के कुछ अंश बिलकुल सफेद हैं और कुछ अंश चित्र रूप के हैं, उसमें शुक्ल
रूप के ग्रहण से जैसे पट का ग्रहण होता है वैसे ही चित्र रूप का भी ग्रहण
होना चाहिए; क्योंकि प्रकृत में शुक्लरूपाश्रय पट और चित्ररूपाश्रय पट दोनों
एक ही हैं ? (उ.) कारणता अन्वय और व्यतिरेक इन दोनों के अधीन है, ये
दोनों जिसे जिसका कारण सिद्ध करेंगे वही उसका कारण होगा । तदनुसार
चित्र रूप के प्रत्यक्ष में उसके आश्रय के अवयवों का प्रत्यक्ष भी कारण है ।
वह सफेदवाले अंश में नहीं है (इसी से वहाँ चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होता
है) । (प्र.) तो फिर नाना रूप के द्व्यणुकों से बने हुए द्रव्य में चित्र रूप
का प्रत्यक्ष नहीं होगा ? क्योंकि उत्पन्न होनेवाले द्रव्य के द्व्यणुक रूप अवयव
अतीन्द्रिय हैं, अतः उनके रूपों का ज्ञान सम्भव नहीं है । (उ) कौन कहता है कि

प्रकरणम् ] भाषाअनुवादसहितम् ७७
न्यायकन्दली
द्वितन्तुके रूपानुत्पत्तिरैकैकस्यायवरूपस्यानारम्भकत्वात् । अथ मतम्-तत्रोभाभ्यामेकं
चित्रं रूपमारभ्यते, तदन्यत्रापि तथा स्यादविशेषात् । विवादाध्यासितं चित्रद्रव्यमेक-
रूपद्रव्यसम्बन्धि द्रव्यत्वादितरद्रव्यवत्, तद्गतं रूपमेकमवयविरूपत्वाद् इतरावयवि-
द्रव्यरूपवत् ।
रसः षड्विध इत्यत्रापि पूर्ववद् व्याख्यानम् । यद् गन्धस्य भेदनिरूपणं तत्
पारम्पर्येण पृथिव्या अपि स्वरूपकथनमित्यभिप्रायेणाह-गन्धो द्विविध इति । तदेव द्वैविध्यं
दर्शयति-सुरभिरसुरभिश्चेति । असुरभिरिति सुरभिगन्धविरुद्धं प्रतिद्रव्यादिसमवेतं
प्रतिकूलसंवेदनीयं गन्धान्तरम्, न तु तदभावमात्रम्, विधिरूपेण सातिशयताया च
संवेदनात् । उपेक्षणीयस्तु गन्धोऽनुद्भूतसुरभ्यसुरभिप्रभेद एवेति पृथङ् नोच्यते । अथवा
सोऽप्यसुरभिरेव, सुरभिगन्धादन्योऽसुरभिरिति व्युत्पादनात् ।
ऐसा नहीं होता है । परम सूक्ष्म वस्तु के रूप नहीं देखे जाते । जिसका रूप अच्छी
तरह देखा जाता है उसके अवयवों के रूप भी देखे ही जाते हैं । जो कोई 'एक
ही अवयवी में रहनेवाले अव्याप्यवृत्ति अनेक रूप ही चित्र रूप हैं' ऐसा मानते हैं,
उनके मत में नील और पीत रूप के दो तन्तुवों से आरब्ध पट में रूप की उत्पत्ति
नहीं होगी; क्योंकि अवयव का एक रूप तो कारण नहीं है, (प्र.) वहाँ दोनों रूप
मिलकर एक चित्र रूप का उत्पादन करते हैं । (उ.) तो फिर और स्थानों में भी
वही होगा; क्योंकि स्थिति में कोई अन्तर नहीं है । (१) विवाद का विषय यह
चित्र द्रव्य एक रूप के द्रव्य का सम्बन्धी है, क्योंकि वह द्रव्य है । (२) उसमें
रहनेवाला रूप एक ही है, क्योंकि वह अवयवी का रूप है । जैसे कि और
अवयवी द्रव्यों का रूप ।
'रसः षड्विधः' इस वाक्य की व्याख्या भी 'रूपमनेकप्रकारकम्' इस पहले
वाक्य की तरह है । गन्ध के भेद का निरूपण परम्परा से पृथिवी के ही स्वरूप
का निरूपण है, इसी अभिप्राय से 'गन्धो द्विविधः' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । यही
दोनों प्रकार 'सुरभिरसुरभिश्च' इस वाक्य से लिखते हैं । 'असुरभि' शब्द का
अर्थ सुगन्ध के विरोधी किसी विशेष द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला,
अनभीष्ट रूप से ज्ञात होनेवाला दूसरा गन्ध है, केवल सुरभि का अभाव नहीं,
क्योंकि भावरूप रूप से और न्यूनाधिक भाव से उसका भान होता है । उपेक्षणीय
गन्ध अनुद्भूत सुरभि और अनुद्भूत असुरभि का ही प्रभेद है, अतः उसे अलग
से नहीं कहा गया । अथवा उपेक्षणीय गन्ध 'असुरभि' शब्द का ही अर्थ है,
क्योंकि 'असुरभि' शब्द का ऐसा अर्थ है कि 'सुरभिगन्धादन्यो गन्धः' अर्थात्
सुरभि गन्ध से भिन्न गन्ध ही 'असुरभि' शब्द का अर्थ है ।

७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सा च द्विविधा-नित्या चानित्या च । परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा
त्वनित्या । सा च स्थैर्याद्यवयवसंनिवेशविशिष्टाऽपरजातिबहुत्वोपेता शयना-
सनाद्यनेकोपकारकरी च ।
१. परमाणुरूपा नित्य पृथिवी एवं २. कार्यरूपा अनित्य पृथिवी, इस
भेद से पृथिवी के दो भेद हैं । इनमें कार्यरूपा पृथिवी स्थैर्यादि (घनत्व,
शिथिलत्वादि) अवयवों के विलक्षण संयोग से युक्त है और उसमें
अनेक अपर जातियाँ रहती हैं । वह बिछावन और आसनादि द्वारा
अनेक उपकारों का कारण है ।
न्यायकन्दली
यथाभूतः स्पर्शोऽस्या वैधर्म्यं तथा दर्शयति-स्पर्शोऽस्या इति । पाकजः स्पर्शः
पृथिव्या वैधर्म्यं तस्य स्वरूपकथनमनुष्णाशीत इति । यद्यपि स्पर्शवत्पाकजौ
रूपरसावप्यस्याः वैधर्म्यम्, तथापि रूपरसयोः पाकजत्वानभिधानम्, अन्यथापि
तयोर्वैधर्म्यस्य सम्भवात्, वैधर्म्यमात्रप्रतिपादनस्यैव विवक्षितत्वात् । अप्रतीयमानपाकजेषु
स्तम्भादिषु स्पर्शस्य पाकजत्वमनुमानात् । स्तम्भादिषु स्पर्शः पाकजः, पार्थिवस्पर्शत्वात्,
घटादिस्पर्शवत् । घटादिस्पर्शस्यापि पाकजत्वमेकेन्द्रियग्राह्यत्वे सति तद्गुणत्वात्
तद्गतरूपवत् ।
अवान्तरभेदनिरूपणार्थमाह-नित्या चानित्या चेति । प्रकारान्तरा-
भावसंसूचनार्थौ चशब्दौ । का नित्या का चानित्येत्याह-परमाणुलक्षणा नित्या,
कार्यलक्षणा त्वनित्येति । उभयत्रापि लक्षणशब्दः स्वभावार्थः । परमाणु-
'किस प्रकार का स्पर्श पृथिवी का असाधारण धर्म है' यह 'स्पर्शोऽस्याः'
इत्यादि से दिखलाते हैं । पाकज स्पर्श ही पृथिवी का असाधारण धर्म है,
'अनुष्णाशीतः' यह अंश उसी के स्वरूप का कथन है । यद्यपि स्पर्श की तरह
पाकज रूप एवं पाकज रस भी पृथिवी के असाधारण धर्म हो सकते हैं, फिर भी
असाधारण धर्म के लिए कथित रूप और रस में पाकजत्व इसलिए नहीं कहा कि
वे और तरह से भी पृथिवी के वैधर्म्य हो सकते हैं । यहाँ केवल वैधर्म्य प्रतिपादन
ही इष्ट है । स्तम्भादि जिन पार्थिव द्रव्यों के स्पर्श में पाकजत्व का प्रत्यक्ष नहीं
होता है, उन स्पर्शों में भी पाकजत्व का अनुमान करेंगे कि स्तम्भादि के स्पर्श
पाकज हैं, क्योंकि वे पृथिवी के स्पर्श हैं, जैसे घटादि के स्पर्श । घट के स्पर्श में
पाकजत्व का अनुमान इस प्रकार करेंगे कि वह पार्थिव होने के साथ-साथ एक
मात्र इन्द्रिय से गृहीत होता है, जैसे कि उसका रूप (अतः वह भी पाकज है) ।
'नित्या चानित्या च' यह वाक्य पृथिवी के अवान्तर भेद के निरूपण के लिए
लिखते हैं । 'पृथिवी के और प्रकार नहीं हैं' इसकी सूचना देने के लिए ही दोनों
'च' शब्द लिखे गये हैं । इनमें कौन नित्य है ? और कौन अनित्य ? यह समझाने के