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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः ।
पृथिवी और तेज इन दो द्रव्यों का नैमित्तिक द्रवत्व का सम्बन्ध
साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः । निमित्तादुपजातं (नैमित्तिकम्), नैमित्तिकञ्च
तद्द्रवत्वञ्चेति नैमित्तिकद्रवत्वम्, तेन सह क्षितितेजसोर्योगः, पार्थिवस्य सर्पिरादेस्तैजसस्य
च सुवर्णरजतादेरग्निसंयोगेन विलयनात् । गुरुत्ववत्पार्थिवमेव द्रवत्वं दह्यमानेषु
सुवर्णादिषु संयुक्तसमवायात् प्रतीयत इति चेत् ? न, पार्थिवद्रवत्वस्यात्यन्ताग्निसंयोगेन
भस्मीभावोपलब्धेः, अस्य च तदभावात् । अत एव सुवर्णादिकमपि पार्थिवमेवेति कस्यचित्
प्रवादोऽपि प्रत्युक्तः, पार्थिवत्वे सति सर्पिरादिवदत्यन्तवह्निसंयोगेन द्रवत्वोच्छेदप्रसङ्गात् ।
यदपीदमुक्तं पार्थिवं सुवर्णादिकम्, सांसिद्धिकद्रवत्वाभावे सति
इस प्रकार यह स्वीकार करना पड़ेगा कि देश और काल भी कार्योत्पत्ति के अङ्ग
हैं, क्योंकि कार्य के उत्पादक सभी कारण काल और दिशा की अपेक्षा रखते हैं ।
काल और दिशा में सभी कार्यों का यही निमित्तकारणत्व है कि किसी कालविशेष और
देशविशेष में ही कार्यों की उत्पत्ति होती है, सभी कालों और सभी देशों में नहीं ।
'निमित्तादुपजातं नैमित्तिकम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो कारण से उत्पन्न हो
उसे 'नैमित्तिक' कहते हैं । 'नैमित्तिकञ्च तद्द्रवत्वञ्चेति' इस कर्मधारय समास के
बल से किसी निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही 'नैमित्तिकद्रवत्व' शब्द का अर्थ है ।
उसके साथ सम्बन्ध ही पृथिवी और तेज का साधर्म्य है; क्योंकि घृतादि पार्थिव
द्रव्य और सुवर्णादि तैजस द्रव्य आग के संयोग से विलीन होते (पिघलते) दीख
पड़ते हैं, अतः उनमें अवश्य ही नैमित्तिक द्रवत्व है । (प्र.) जिस प्रकार सुवर्ण में
पार्थिव गुरुत्व की ही उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है, उसी प्रकार
सुवर्ण में पृथिवीगत नैमित्तक द्रवत्व की ही संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्धि होती
है । (अर्थात् सुवर्ण में नैमित्तिक द्रवत्व नहीं है ।) (उ.) घृतादि पार्थिव द्रव्यों में
रहनेवाले नैमित्तिक द्रवत्व का यह स्वभाव है कि अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट
हो जाना, सुवर्ण के द्रवत्व में यह बात नहीं है । इसी समाधान से स्वर्ण को पृथिवी
होने का प्रवाद भी खण्डित हो जाता है, अगर सुवर्ण पार्थिव होता तो फिर
घृतादि पार्थिव द्रव्यों के द्रवत्व की तरह सुवर्ण का द्रवत्व तो अग्नि के अत्यन्त
संयोग से नष्ट हो जाता ।
(प्र.) यह जो विरोधी अनुमान का प्रयोग किया जाता है कि सुवर्ण पार्थिव ही है;
क्योंकि सांसिद्धिक द्रवत्व के न रहने पर भी उसमें गुरुत्व है, जैसे कि ढेले में । (उ.) इस

६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एवं सर्वत्र साधर्म्यं विपर्ययाद्वैधर्म्यञ्च वाच्यमिति द्रव्यासङ्करः ।
इसी प्रकार रहने के कारण साधर्म्य और नहीं रहने के कारण
वैधर्म्य समझना चाहिए । अतः द्रव्यों में कोई साङ्कर्य नहीं है ।
न्यायकन्दली
गुरुत्वाधिकरणत्वाल्लोष्टादिवत्, तदप्यसारम्, किं तत्र गुरुत्वस्योपलब्धिस्तद्गुणत्या-
दुतान्यगुणत्वेऽपि घृतादिष्वपि स्नेहवत् स्वाश्रयप्रत्यासत्तिनिमित्तादिति संशयस्यानिवृत्तेः ।
यदपि साधनान्तरं परप्रकाशयमानत्वादिति, तदप्यनुद्भूतरूपवत्त्वेनाप्युपपत्तेरसाधनम् ।
दिङ्मात्रमस्माभिरुपदिष्टम् ।
अनेनैव न्यायेन सर्वत्र पदार्थेऽन्यदपि साधर्म्यं स्वयं वाच्यम्, विपर्ययादितरव्यावृत्तेवैधर्म्यं
वाच्यमिति शिष्यानाह- एवमिति ।
अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्तन्ते निर्विषयत्वात्, अलक्षितेषु च
तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात्, अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्योभयथा
प्रवृत्तिः उद्देशो लक्षणञ्च । परीक्षायास्त्वनियमः । यत्राभिहिते लक्षणे
प्रवादान्तरव्याक्षेपात्तत्त्वनिश्चयो न भवति, तत्र परपक्षव्युदासार्थं
अनुमान में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि सुवर्ण में जिस गुरुत्व की उपलब्धि
होती है वह उसका अपना गुण है, जैसे कि ढेले में, या उसमें संयुक्त किसी दूसरे
द्रव्य का है, जैसे कि तेल में स्नेह का, इस संशय की निवृत्ति नहीं होती है ।
'सुवर्ण तैजस नहीं है' इसको सिद्ध करने के लिए कोई यह हेतु देते हैं कि सुवर्ण
तैजस इसलिए नहीं है कि वह (दीपादि) दूसरी वस्तुओं से प्रकाशित होता है,
किन्तु यह भी हेत्वाभास ही है, क्योंकि स्वर्ण को (दीपादि) दूसरे द्रव्यों से
प्रकाशित होने की उपपत्ति उसके भास्वर शुक्ल रूप को अनुद्भूत मान लेने से भी
हो सकती है । सुवर्ण में तैजसत्व की साधक और बाधक युक्तियों का यहाँ हम
लोगों ने दिग्दर्शन मात्र किया है ।
इसी प्रकार सभी पदार्थों में और साधर्म्यों की भी कल्पना स्वयं करनी चाहिए ।
एवं जो साधर्म्य जिनमें न हो उसको उनका वैधर्म्य समझना चाहिए । इसी विषय
को शिष्यों को समझाने के लिए आगे 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं ।
जिन पदार्थों का उल्लेख नामतः नहीं होता है, उनमें लक्षण की प्रवृत्ति नहीं होती
है; क्योंकि उस लक्षण का कोई लक्ष्य ही निर्दिष्ट नहीं रहता है । एवं बिना लक्षण के
पदार्थों का बोध ही असम्भव है । अतः पदार्थों के प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों की प्रवृत्ति
नियमतः (१) उद्देश और (२) लक्षण भेद से दो ही प्रकार की होती है, परीक्षा
रूप शास्त्र की प्रवृत्ति के प्रसङ्ग में नियम नहीं है, (अर्थात्) जहाँ लक्षण कहे जाने के