वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैयोपलभ्यते ।
तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति ।
तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनकत्वानुपलम्भादेव ।
तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके-"तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति"
यागेनाहितत्वादपूर्व्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः, अपूर्वोपकृतात् कर्मणः फलानु-
त्पत्तेः, तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावरस्थादिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलोत्पत्तेर-
पूर्वमेव श्रेयःसाधनम् । कारणत्वश्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति
प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि
यागादौ धर्मव्यपदेशः, सोऽप्यपूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः। स्वर्ग-
साधने हि चोदितस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्द-
नादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात्, तदभावे चाप्रयोगात्, प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः,
लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है। जैसा कहा गया है कि "कार्यरूप हेतु से
अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी, उसी में उसकी सत्ता
माननी पड़ेगी" अतः उस कारण की शक्ति उसी कारण में ही रहेगी, कभी उससे
भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती । (उ.) किन्तु यह भी अयुक्त ही है; क्योंकि शक्ति
के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से
कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से
आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है
कि "उससे (याग से) जिस लिए कि 'उसका' अपूर्व का आधान होता है; अतः
'अपूर्व' याग की शक्ति कहलाता है ।" क्योंकि याग से 'आहित' अर्थात् उत्पन्न
होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है । अपूर्व याग की शक्ति नहीं है,
क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है और इस
उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है (क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के
अव्यवहित पूर्वक्षण में याग की सत्ता ही नहीं है, फिर अपूर्व किसका साहाय्य
करेगा ? ) । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत
पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसे
उपयुक्त देश-कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है । अतः प्रमाण के द्वारा इसी
पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है ।
यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है,वह हेतुता
'अपूर्व' का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं, इसी
अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि 'धर्म पुरुष का
ही गुण है' । यागादि क्रियाओं में जो 'धर्म' शब्द का व्यवहार होता है, उसे अपूर्व या
धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए । जैसे कि प्रीति के चन्दन-
६६४ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि, तस्मात् प्रीतिसाधन-
प्रतीत्युत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावैयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षण्या
तत्साधने प्रयोगः, एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनानवकाशादिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः। अन्त्यसुख-
संविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी, न च निर्हेतुको
विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं
यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम्, तस्य
यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः, कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य
भागशो नाशः सम्भाव्यते, तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते । ये तु
वनितादि साधनों में 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साधनीभूत
अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित
व्यवहार होता है, वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में
जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है, तभी 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग होता है, जब जिसे
उन साधनों से सुख नहीं मिलता है, तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग
नहीं होता । अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द
लाक्षणिक है और प्रीति में ही उसकी अभिधा शक्ति है; क्योंकि प्रीति और उसके
साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द की अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म
के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है;
क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप
उसके मुख्यार्थ और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थ दोनों के बोध की उत्पत्ति हो
जाएगी । अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टोमादि, दोनों में धर्म शब्द की
अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यही तार्किक लोगों की रीति है ।
'अतीन्द्रियः' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी
इन्द्रिय से नहीं देख सकता, अतः 'धर्म अतीन्द्रिय' है । 'अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी'
धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः वह विनाशशील भी है; किन्तु कोई भी विनाश
बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न
किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि. फलों की उत्पत्ति से पहले तक
उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी । (यदि किसी भी उपभोग से धर्म का विनाश मानें
तो) किसी-किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है, अतः उनमें
पहले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा, आगे उससे उपभोग ही रुक
जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग
का विनाश हो (और अवशिष्ट भाग बचा रहे), तस्मात् अन्तिम सुख ही धर्म का नाशक