वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुणादीनां पञ्चानामपि निर्गुणत्वनिष्क्रियत्वे ।
द्रव्यादीनां त्रयाणामपि सत्तासम्बन्धः, सामान्यविशेष-
गुण से लेकर समवाय तक अर्थात् गुण, कर्म्म, सामान्य, विशेष
और समवाय इन पाँच पदार्थों के निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व साधर्म्य हैं ।
द्रव्यादि तीन वस्तुओं के अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीन पदार्थों
के ये पाँच साधर्म्य हैं- १. सत्ता का सम्बन्ध, २. सामान्यवत्त्व, ३. विशेषवत्त्व
(अर्थात् पर और अपर दोनों जातियोंका सम्बन्ध), ४. इस शास्त्र के सङ्केत-
न्यायकन्दली
द्रव्यादीनामित्युक्ते समवायोऽपि गृह्येत, तदर्थं पञ्चानामित्युक्तम् । पञ्चानामित्युक्ते च
केषामिति न ज्ञायते तदर्थं द्रव्यादीनामिति ।
गुणादीनां समवायान्तानां साधर्म्यमाह-गुणादीनामिति । निर्गुणत्वं गुणाभाव-
विशिष्टत्वम्, निष्क्रियत्वं क्रियाभावविशिष्टत्वम्, यथा भावोऽभावस्य विशेषणं स्वविशिष्ट-
प्रत्ययजननादेवमभावोऽपि । तथा चोपनिबद्द्मघटं भूतलमिवि । भावाभावयोरसम्बन्धात्
कथमभावो विशेषणमिति चेदस्ति तावदयं विशिष्टप्रत्ययः, तद्दर्शनात् सम्बन्धमपि कल्प-
यिष्यामः । यदि सम्बद्धमेव विशेषणं मन्यसे ।
रहना । 'अनेकत्व' शब्द का अर्थ है विभिन्नत्व । वह परस्पर एक-दूसरे में न
रहनेवाला उन वस्तुओं का स्वरूप ही है । 'द्रव्यादीनाम्' केवल इतना कह देने से
समवाय का भी ग्रहण हो जाता, अतः 'पञ्चानाम्' यह पद है । केवल
'पञ्चानाम्' इतना ही कहने से 'कौन पाँच' यह समझ में नहीं आता, अतः
'द्रव्यादीनाम्' यह पद है ।
'गुणादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से गुण से लेकर समवाय तक के पाँच पदार्थों
का साधर्म्य कहते हैं । 'निर्गुणत्व' शब्द का अर्थ है गुणों का अभाव और
'निष्क्रियत्व' शब्द का अर्थ है क्रियाओं का अभाव । जिस प्रकार 'भाव' अपने से
युक्त अभाव प्रतीति का जनक होने से अभाव का विशेषण होता है, उसी प्रकार
एवं उसी हेतु से अभाव भी भाव का विशेषण हो सकता है । एवं उसी के
अनुकूल 'अघटं भूतलंम्' इत्यादि विशिष्टप्रतीति के जनक प्रयोग भी होते हैं। (प्र.)
भाव और अभाव दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः उन दोनों में परस्पर सम्बन्ध
असम्भव है, एवं दोनों में परस्पर सम्बन्ध न रहने से विशेष्यविशेषणभाव सुतराम्
असम्भव है । (उ.) उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि भावविशिष्ट अभाव की,
एवं अभावविशिष्ट भाव की दोनों ही प्रतीतियाँ अवश्य हैं । अगर परस्पर सम्बद्ध
दो वस्तुओं में से ही एक को विशेष्य और दूसरे को विशेषण मानना हो तो फिर
उक्त विशिष्ट प्रतीतियों के बल से भाव और अभाव इन दोनों में भी किसी
अनुकूल सम्बन्ध की कल्पना करनी ही पड़ेगी ।
४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वत्त्वम्, स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वम्, धर्म्माधर्म्मकर्त्तृत्वञ्च ।
रूप अभिधावृत्ति के द्वारा 'अर्थ' शब्द के द्वारा समझा जाना,
५. धर्म्माधर्म्मकर्त्तृत्व ।
न्यायकन्दली
द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः सत्तया सामान्येन सबन्धः समवायरूपो द्रव्यगुण-
कर्म्मणां साधर्म्यम् । यथा चैतेषु सत्तासम्बन्धस्तथोपपादितम् । इदन्त्विह निरूप्यते-किं
सत्तासम्बन्धः सतोऽसतो वा ? सतश्चेत् प्राक् सत्तासम्बन्धात् सद्भावात्सैवार्था इति व्यर्था
सत्ता ? अथासतः सम्बन्धः ? खरविषाणादिष्वपि सत्ता स्यात् । नित्येषु तावत्पूर्वापर-
भावानभ्युपगमः । अनित्येषु प्रागसत एव सत्ता, कारणसामर्थ्यात् । न च
खरविषाणादिष्व- तिप्रसङ्गः , तदुत्पत्तौ कस्यचित् सामर्थ्याभावात् ।
अन्यदपि साधर्म्यं द्रव्यादीनां त्रयाणां कथयति – सामान्यविशेषवत्त्वञ्चेति ।
अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषा द्रव्यत्वादयस्तैः सह सम्बन्धो द्रव्यादीनाम्, स च
समवाय एव ।
"द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः" अर्थात् सत्ता नाम की जाति के साथ
समवाय नाम का सम्बन्ध द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों का साधर्म्य है । इन
तीनों में सत्ता जाति का सम्बन्ध किस प्रकार है ? यह कह चुके हैं । (प्र.) अब
यहाँ विचार करना है कि सत्ता जाति 'सत्' अर्थात् पहले से विद्यमान वस्तुओं के
साथ सम्बद्ध होती है ? या असद्वस्तुओं के साथ ? अगर सत्ता सद्वस्तुओं के साथ
सम्बद्ध होती है तो फिर सत्ता जाति की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है, क्योंकि
सत्ता सम्बन्ध के बिना भी वे सत् हैं ही । अगर असत् वस्तुओं के साथ सत्ता
सम्बद्ध होती है तो फिर गदहे के सींग प्रभृति पदार्थों की भी सत्ता माननी पड़ेगी ।
(उ.) नित्य वस्तुओं में तो पहले-पीछे की कोई बात ही नहीं उठती है । अनित्य
वस्तुओं के प्रसङ्ग में यह कहना है कि पहले से अविद्यमान वस्तुओं के साथ ही
कारणों के (विशिष्ट) बल से सत्ता सम्बद्ध होती है । गदहे के सींग प्रभृति अलीक
पदार्थों की आपत्ति का भी प्रसङ्ग नहीं आता है, क्योंकि किसी भी वस्तु में उनके
उत्पादन का बल ही नहीं है ।
'सामान्यविशेषवत्त्वञ्च' इत्यादि से द्रव्यादि तीन पदार्थों के और भी साधर्म्य
कहते हैं । द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने विभिन्न आश्रयों में 'द्रव्यम्' इस एक आकार
की (अनुवृत्ति) बुद्धि का कारण होने से 'सामान्य' हैं एवं अपने आश्रयों को
औरों से भिन्न रूप में समझाने के कारण 'विशेष' भी हैं । सामान्य एवं विशेष
इन दोनों शब्दों से समझी जानेवाली द्रव्यत्वादि जातियों के साथ द्रव्यत्वादि तीनों
वस्तुओं का सम्बन्ध है । वह सम्बन्ध समवाय ही है ।