वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५
न्यायकन्दली
यथा हि सुविदितरत्नपरीक्षाशास्त्रो रत्नजातिभेदं प्रत्यक्षतः प्रत्येति, नापरः । न च तावता
रत्नजातिभेदो नास्ति, न च तत्प्रत्यक्षमप्रत्यक्षम् । यच्चोक्तम्-स्त्रीणां स्वभावचपलानां
विशुद्धिर्दुरवबोधैवेति । तदसत्, अभियुक्तैः सुरक्षितानां सुकरस्तद्वयबोधः, कथितश्च
तासां बहुविधो रक्षणोपाय इत्यास्तां तावदसक्तानुप्रसङ्गः ।
तच्च द्रव्यादिकं स्वविषयस्य विजातीयेभ्यो व्यावृत्तेरपि हेतुत्वाद्बिशेषाख्यां
विशेषसंज्ञामपि लभते, न केवलमनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यसंज्ञां लभते, व्यावृत्तेरपि
हेतुत्वाद्विशेषसंज्ञामपि लभत इत्यपिशब्दयोरर्थः । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्यत्वादिषु
सामान्यशब्दो मुख्यः, अनुवृत्तिहेतुत्वस्य सामान्यलक्षणस्य सम्भवात्, विशेषशब्दश्च
भाक्तः, स्वाश्रयो विशिष्यते सर्वतो व्यवच्छिद्यते येन स विशेष इति लक्षणस्यात्राभावात् ।
इदन्तु लक्षणमन्यविशेषेष्वस्ति ।
केवल प्रथम दर्शन में ही क्षत्रियादि व्यक्तियों से विलक्षण रूप से ब्राह्मणों की
प्रतीति नहीं होती है । क्योंकि ब्राह्मणत्व जाति व्यक्ति में सम्बद्ध रहने पर भी
उद्भूत नहीं है । जब यह ज्ञान हो जाता है कि यह व्यक्ति ब्राह्मण माता-पिता से
उत्पन्न है, तब उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष के साथ ही ब्राह्मणत्व जाति का भी प्रत्यक्ष हो
जाता है । जैसे कि रत्नों की परीक्षा में निपुण व्यक्ति रत्नों की जातियों को प्रत्यक्ष
ही देखता है । एवं उस परीक्षा से अनभिज्ञ व्यक्ति रत्नों की जातियों को समझाने
पर भी नहीं समझ पाता है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि रत्नों की
भिन्न जातियाँ ही नहीं हैं या उस निपुण पुरुष का प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष ही नहीं है । (प्र.)
कोई कहते हैं कि स्त्रियाँ चञ्चल होती हैं, अतः तन्मूलक वंशविशुद्धि का ज्ञान
दुर्लभ है । (उ.) किन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि आर्यों से सुरक्षित स्त्रियों
की सन्तानों में विशुद्धि का बोध कठिन नहीं है । स्त्रियों की रक्षा के बहुत से उपाय
शास्त्रों में कहे गये हैं । अब इस प्रसङ्ग से आये विषय को यहीं छोड़ देना चाहिये ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने आश्रयों को भिन्नजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से
भी समझाती हैं, अतः वे 'विशेष' नाम से भी कही जाती हैं । अपने विभिन्न
आश्रयों में एकाकारप्रतीतिरूप अनुवृत्तिप्रत्ययजनक होने से केवल 'सामान्य' शब्द
से ही व्यवहृत नहीं होती हैं । यही दोनों (व्यावृत्तेरपि विशेषाख्यामपि) 'अपि'
शब्दों का अभिप्राय है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? यही कि द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'सामान्य' शब्द के मुख्य अर्थ हैं । क्योंकि "अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्व" रूप
सामान्य का सम्पूर्ण लक्षण उनमें है । 'विशेष' शब्द का उनमें लाक्षणिक प्रयोग
होता है, क्योंकि "जो अपने आश्रय व्यक्ति को और सभी पदार्थों से भिन्न रूप से
समझावे वही 'विशेष' है"। विशेष का यह सम्पूर्ण लक्षण उनमें नहीं है, किन्तु
वह अन्य विशेषों में (ही) है ।
३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः । ते खल्व्यत्यन्तव्यावृत्तिहेतुत्वाद्विशेषा एव ।
सभी नित्य द्रव्यों में रहनेवाले 'अन्त्य' ही 'विशेष' हैं । वे (अपने
आश्रय की और पदार्थों से भिन्नत्व बुद्धिरूप) व्यावृत्ति के ही कारण
हैं । अतः वे 'विशेष' ही हैं (अपने आश्रयों को परस्पर समानरूप से
न समझाने के कारण 'सामान्य' शब्द के गौण अर्थ भी नहीं हैं) ।
न्यायकन्दली
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषा इति । नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तन्त एव ये ते विशेषा इति ।
नित्यद्रव्येष्वेवेति द्रव्यगुणकर्म्मसामान्यानां व्यवच्छेदः । द्रव्यगुणकर्माणि द्रव्येष्वेव वर्त्तन्ते,
न नित्येष्वेवेति । सामान्यानि तु न द्रव्येष्वेव । न नित्येष्वेव वर्त्तन्त एवेति बुद्धिशब्दादीनां
व्यवच्छेदः, तेषां समस्तनित्यद्रव्यप्राप्त्यभावात् । ननु किं विशेषा एव किं वा
द्रव्यत्वादिवदुभयरूपाः ? इति । तत्राह-ते खल्विति । खलुशब्दो निश्चये, नित्यद्रव्यवृत्तयो
ये विशेषास्ते विशेषा एव निश्चिता न तु सामान्यान्यपि भवन्तीत्यर्थः । अत्यन्तं सर्वदा,
व्यावृत्तेरेव स्वाश्रयस्येतरस्माद्व्यवच्छेदस्यैव, हेतुत्वात् कारणत्वादिति । यथा चेदं
तथोपरिष्टादुपपादनीयम् ।
जो (पदार्थ) केवल सभी नित्यद्रव्यों में रहें और अवश्य ही रहें वे ही 'विशेष'
हैं । 'नित्य द्रव्यों में ही रहें' (नित्यद्रव्येष्वेव) इस अंश से द्रव्य, गुण और कर्म्म
इन तीनों में विशेष के लक्षण की अतिव्याप्ति की शङ्का मिट जाती है, क्योंकि वे
यद्यपि द्रव्यों में ही रहते हैं, तथापि नित्य द्रव्यों में ही नहीं रहते (किन्तु अनित्य
द्रव्यों में भी रहते हैं) । सामान्य पदार्थ केवल द्रव्य में ही नहीं रहता है (गुणादि में
भी रहता है, अतः सामान्य में विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है) ।
'नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तत एव' इस वाक्य से शब्द और बुद्धि इन दोनों में विशेष
लक्षण की अतिव्याप्ति वारित होती है; क्योंकि शब्दादि यद्यपि नित्य द्रव्यों में
ही रहते हैं, किन्तु सभी नित्य द्रव्यों में नहीं रहते । क्या ये 'विशेष' ही हैं ?
या द्रव्यत्वादि की तरह सामान्य और विशेष दोनों ही हैं ? इस संशय को 'ते
खलु' इत्यादि वाक्य से हटाते हैं । यहाँ 'खलु' शब्द 'निश्चय' अर्थ का
बोधक है । अभिप्राय यह है कि नित्य द्रव्यों में रहनेवाले ये 'विशेष' निश्चित रूप
से केवल 'विशेष' ही हैं, ये कभी सामान्य नहीं होते । क्योंकि ये बराबर अपने
आश्रय को और पदार्थों से भिन्न रूप में ही समझाते हैं। यह जिस प्रकार उत्पन्न
होता है, वह आगे दिखाया जाएगा ।