वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२१
न्यायकन्दली
इत्येके । अन्ये तु परमाणुपरममहद्व्यवहारवत् परममहत्परमदीर्घव्यवहारस्यापि लोके
दर्शनात् परमाणुषु परमह्रस्वत्वं परमदीर्घत्वं चाकाशे इत्याहुः । दीर्घपरिमाणाधिकरण-
माकाशं महत्परिमाणाश्रयत्वात् स्तम्भादिवत् । एवं ह्रस्वपरिमाणाश्रयः परमाणुः,
अणुपरि- माणाश्रयत्वात्, द्व्यणुकवत् ।
यदि ह्रस्वत्वमुत्पाद्येनाणुत्वेनैकार्थसमवेतं कथमन्यत्र ह्रस्वत्वव्यवहारः ? तत्राह-
समिदिषुवंशादिष्विति । समिच्चेषुश्च वंशश्च समिदिषुवंशाः । एतेष्वञ्जसा परमार्थतो
दीर्घेष्वपि वंशे यः परिमाणप्रकर्षभावो दीर्घातिशययोगित्वं तस्याभावमिक्षावपेक्ष्य
प्रतीय भाक्तो गौणो व्यवहारः, एवमिक्षोः प्रकर्षभावस्तस्याभावं समिध्य-
पेक्ष्य ह्रस्वव्यवहारः । यत् खलु परमार्थतो ह्रस्वं द्व्यणुकं तत्र दैर्ध्याभावः,
एवं आकाशादि में भी परममहत्परिमाण के रहने से उनमें दीर्घत्व परिमाण नहीं
है । कोई कहते हैं कि (जैसा कि आकाशादि में परममहत्त्व का एवं (परमाणु में)
परम अणुत्व का व्यवहार लोकसिद्ध है, वैसे ही (दोनों में क्रमशः) परमदीर्घत्व
एवं परमह्रस्वत्व का भी व्यवहार लोकसिद्ध है, अतः आकाशादि में परमदीर्घत्व
भी है एवं परमाणु में परमह्रस्वत्व भी है । (इस प्रसङ्ग में अनुमानों का प्रयोग इस
प्रकार है कि) (१) जिस प्रकार स्तम्भ महत्परिमाण का आश्रय होने से दीर्घत्व
परिमाण का भी आश्रय है, वैसे ही आकाशादि भी परमदीर्घत्व परिमाण के
आश्रय हैं । (२) एवं जिस प्रकार द्व्यणुक में अणुपरिमाण के रहने से उसमें
ह्रस्वपरिमाण भी रहता है, वैसे ही परमाणु में भी ह्रस्वपरिमाण है; क्योंकि वह भी
अणुपरिमाणवाला है ।
(प्र.) जहाँ समवाय सम्बन्ध से उत्पत्तिशील अणुत्व रहता है वहीं अगर
उत्पत्तिशील ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहता है, तो फिर अन्यत्र (महत्परिमाण
के आश्रय) बाँस प्रभृति में, ह्रस्वत्व का व्यवहार कैसे होता है ? (उ.) इसी प्रश्न
का समाधान 'समिदादिषु' इत्यादि से देते हैं । समिध् (इन्धन), ईख और
बाँस इन सबों में 'अञ्जसा' अर्थात् वस्तुतः दीर्घत्व के रहने पर भी बाँस के
परिमाण का जो 'प्रकर्षभाव' अर्थात् विशेष प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध है,
उस प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध ईख में नहीं है । इसी कारण ईख में
ह्रस्वत्व का 'भाक्त' अर्थात् गौण व्यवहार होता है । इसी तरह ईख में जो
परिमाण का प्रकर्ष है वह समिध् में नहीं है । इसी से समिध् में भी ह्रस्वत्व का
गौण व्यवहार होता है । जो द्रव्य वास्तव में ह्रस्व है, जैसे कि द्व्यणुक उसमें
दीर्घत्व अवश्य ही नहीं है । ईख में भी बाँस में रहनेवाला परिमाण का प्रकर्ष नहीं
है, अतः उसमें भी अणुत्व का भाक्त व्यवहार ही होता है । (प्र.) इनमें
ह्रस्वत्व के व्यवहारों को भी मुख्य ही क्यों नहीं मानते ? (उ.) चूँकि उनमें ही
३२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मपि संख्यापरिमाणप्रचययोनि । तत्रेश्वरबुद्धिमपेक्ष्योत्पन्ना परमाणुद्व्यणुकेषु
बहुत्वसंख्या, तैरारब्धे कार्यद्रव्ये त्र्यणुकादिलक्षणे रूपायु-
१. परिमाण २. संख्या और ३. प्रचय (इन तीनों में से किसी) से
उत्पन्न होते हैं । (परमाणुओं से उत्पन्न होनेवाले) तीन परमाणु
द्व्यणुकों में से प्रत्येक में रहनेवाली तीन एकत्व संख्या एवं उक्त
तीन एकत्वविषयक ईश्वर की अपेक्षाबुद्धि इन दोनों से तीनों
परमाणु द्व्यणुकों में बहुत्व संख्या की उत्पत्ति होती है।
इन तीन परमाणु द्व्यणुकों से उत्पन्न होनेवाले त्र्यसरेणु
न्यायकन्दली
इक्षावपि वंशस्य यादृशं दैर्घ्यं तादृशं नास्तीत्युपचारः । नन्वेतेषु वास्तव एव
ह्रस्वत्वव्यवहारः किं नेष्यते? नेष्यते, तेष्वेव परापेक्षया दीर्घव्यवहारदर्शनात् । न
चैकस्य दीर्घत्वं ह्रस्वत्वं चोभयमपि वास्तवं युक्तम्, विरोधात् । अथ कस्माद् दीर्घव्यवहार
एव गौणो न भवति ? न, तस्योत्पत्तिकारणासम्भवात् । सर्वत्रैव भाक्तो ह्रस्वव्यवहारो
भवतु? नैवम्, मुख्यभावे गौणस्यासम्भवात् ।
अथेदानीमुत्पत्यास्य परिमाणस्य कारणनिरूपणार्थमाह- अनित्यं चतुर्विध-
मपीति । अनित्यं चतुर्विधमपि दीर्घं ह्रस्वं महत् अणु चेति चतुर्विधं
परिमाणम्, संख्यापरिमाणप्रचययोनि संख्यापरिमाणप्रचयकारणकम् । संख्याया-
परस्पर सापेक्ष दीर्घत्व का भी व्यवहार होता है । ह्रस्वत्व और दीर्घत्व दोनों
परस्पर विरुद्ध दो धर्म हैं, अतः एक आश्रय में उन दोनों धर्मों की वास्तविक
सत्ता मानी जा सकती है । (प्र.) तो फिर दीर्घत्व का ही व्यवहार गौण क्यों नहीं
है ? (उ.) उनमें भाक्त दीर्घत्व के व्यवहार को गौण मानने का कारण नहीं है,
अतः वहाँ दीर्घत्व व्यवहार को गौण नहीं मानते । (प्र.) सभी जगहों में ह्रस्वत्व
व्यवहार को गौण ही क्यों नहीं मान लेते ? (उ.) जहाँ जिसका मुख्य व्यवहार
सम्भव होता है, वहाँ उस व्यवहार को गौण नहीं माना जा सकता ।
अब उत्पत्तिशील परिमाण के कारणों का निरूपण करने के लिए 'अनित्यं
चतुर्विधमपि' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । 'अनित्यं चतुर्विधमपि' अर्थात् अनित्य
दीर्घ, ह्रस्व, अणु एवं महत् ये चारों प्रकार के परिमाण 'संख्यापरिमाणप्रचय-
योनि' अर्थात् ये चारों प्रकार के परिमाण संख्या, परिमाण एवं प्रचय इन तीनों में
से ही किसी से उत्पन्न होते हैं । संख्यादि तीनों कारणों में से (क्रमप्राप्त) संख्या में
परिमाण की कारणता 'तत्र' इत्यादि से दिखलाते हैं । 'परमाणुभ्यामारब्धं
द्व्यणुकम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दो द्व्यणुकों से उत्पन्न होने के कारण
'द्व्यणुक' ही यहाँ 'परमाणुद्व्यणुक' शब्द का अर्थ है । 'तेषु त्रिषु' अर्थात्