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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधं परमपरञ्चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं
सत्ता, महाविषयत्वात् । सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव ।
१. पर और २. अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है ।
वे 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न वस्तुओं में एक आकार की
प्रतीति के कारण हैं । उनमें 'सत्ता' पर सामान्य ही है, क्योंकि
वह 'महाविषय' अर्थात् और सभी सामान्यों से अधिक आश्रयों में
विद्यमान है । सत्ता केवल सामान्य ही है (विशेष नहीं), क्योंकि
वह केवल अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, अर्थात् परस्पर भिन्न अपने
न्यायकन्दली
गमनग्रहणात् पञ्चैव कर्म्माणि । अत्रोपपत्तिमाह-भ्रमणरेचनस्यन्दनेत्यादि । यस्माद्
भ्रमणादयोऽपि गमनविशेषा गमनप्रभेदा न जात्यन्तराणि, तस्माद् गमनग्रहणेनैतेषामपि
ग्रहणात् पञ्चैवेत्यवधारणं सिद्ध्यतीत्यर्थः ।
सामान्यं कथयति-सामान्यं द्विविधमिति । द्वैविध्यमेव कथयति-परमपरं
चेति । चोऽवधारणे, परमपरमेवेत्यर्थः । तस्य रूपं कथयति- अनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणमिति । अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणादन्योन्यस्वरूपानु-
गमः प्रतीयते तत्सामान्यम् । किं तत्परं सामान्यमित्याह-परं सत्तेति ।
भी तो हैं ? फिर 'कर्म पाँच ही हैं' यह अवधारण असङ्गत है । इसी प्रश्न का
समाधान 'गमनग्रहणात्' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् चूँकि गमनरूप कर्म का
ग्रहण किया गया है, इसलिए कर्म पाँच ही हैं । 'भ्रमणरेचन' इत्यादि से इसी में
युक्ति देते हैं । चूँकि भ्रमणादि गमनत्व जाति के ही हैं, दूसरी जाति के कर्म्म नहीं
हैं, अतः 'गमन' पद से भ्रमणादि कर्मों का भी संग्रह हो जाने से 'कर्म पाँच ही
हैं, यह अवधारणा ठीक है ।
"सामन्यं द्विविधम्" इत्यादि पङ्क्तियों से अब (अवसरप्राप्त) सामान्य का
निरूपण 'परमपरञ्च' इस वाक्य से करते हैं । (१) पर और (२) अपर, ये दो
प्रकार सामान्य के कहे गये हैं । इस वाक्य के 'च' शब्द से इस 'अवधारण' का
बोध होता है कि सामान्य के पर और अपर भेद से दो ही प्रकार हैं ।
'अनुवृत्तिप्रत्ययकारणम्' इत्यादि से सामान्य पदार्थ का लक्षण कहते हैं (अर्थात्)
अत्यन्त विभिन्न दो वस्तुओं में जिस एक वस्तु के रहने से एक आकार की प्रतीति
होती है, उसी को 'सामान्य' कहते हैं । वह 'पर' सामान्य कौन-सा है ?
१. जैसे कि एक घट दूसरे घट से भिन्न है, फिर भी उन दोनों में 'ये घट हैं'
एक आकार की प्रतीति होती है और पट में यह प्रतीति नहीं होती । इसका
कारण सभी घटों में घटत्व नाम के सामान्य का रहना ही है । एवं घट और

३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यत्वाद्यपरम्, अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात् सामान्यं
सद्विशेषाख्यामपि लभते ।
आश्रयों में एकाकारप्रतीति को उत्पन्न करती है । किसी भी प्रकार की
व्यावृत्तिबुद्धि अर्थात् अपने विभिन्न आश्रयों में परस्पर भेदबुद्धि को
उत्पन्न नहीं करती । द्रव्यत्वादे सामान्य सत्ता की अपेक्षा थोड़े आश्रयों
में रहने के कारण 'अपर सामान्य' है । ये द्रव्यत्वादि अनुवृत्तिप्रत्यय
की तरह व्यावृत्तिप्रत्यय के भी कारण हैं, अतः वे सामान्य होते हुए
'विशेष' भी कहलाते हैं ।
न्यायकन्दली
अत्र युक्तिमाह-महाविषयत्वादिति । द्रव्यत्वाद्यपेक्षया बहुविषयत्वादित्यर्थः । सा
चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । द्रव्यत्वादिकं तु स्वाश्रयस्य विजातीयेभ्योऽपि
व्यावृत्तेरपि हेतुत्वादिशेषोऽपि भवति । सत्ता तु स्वाश्रयस्यानुवृत्तेरेव हेतुस्तेन
सामान्यमेव । यद्यप्येषा सामान्यादिभ्यो व्यावर्तते तथापि न तेभ्यः
इस प्रश्न का समाधान 'परं सत्ता' इस वाक्य से देते हैं । सत्ता 'पर' सामान्य ही
क्यों है ? इसका हेतु 'महाविषयत्वात्' इस (पञ्चम्यन्त) पद से दिखलाया है ।
अर्थात् 'सत्ता' जाति द्रव्यत्वादि और जातियों से अधिक आश्रयों में रहती है ।
यह (सत्तारूप सामान्य) केवल अनुवृत्ति-बुद्धि (अनेक वस्तुओं में एकाकारता की
बुद्धि) का ही कारण है, अतः यह केवल 'सामान्य' ही है (विशेष नहीं) ।
द्रव्यत्वादिरूप सामान्य (विभिन्न द्रव्यों में एकाकारतारूप अनुवृत्तिबुद्धि की तरह)
अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में गुणादि से व्यावृत्तिबुद्धि, अर्थात् द्रव्य गुणादि से
भिन्न हैं, इस प्रकार की विभिन्नाकारता प्रतीति का भी कारण है, अतः द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'विशेष'भी हैं । सत्ता तो अपने आश्रयीभूत द्रव्य, गुण और कर्म में "ये
सत् हैं" इस प्रकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है (किसी भी व्यावृत्तिबुद्धि
का नहीं), अतः वह 'सामान्य' ही है । (प्र.) यद्यपि यह कह सकते हैं कि सत्ता
जाति सामान्यादि पदार्थों में नहीं है (क्योंकि उनमें कोई भी सामान्य नहीं है),
अतः 'सत्ता जाति' द्रव्य, गुण, और कर्म, इन तीनों में 'ये सत् हैं' इस
अनुवृत्तिबुद्धि की तरह (सत्ताजातियुक्त) द्रव्यादि पदार्थ (सत्ताशून्य) सामान्यादि
पदार्थों से भिन्न हैं, इस व्यावृत्तिबुद्धि के भी करण है । (इस युक्ति से सत्ता भी
द्रव्यत्वादि सामान्य की तरह 'विशेष' कहला सकती है) तथापि सामान्यादि पदार्थों
में भी भावत्व, अस्तित्वादि रूप सत्ता तो है ही, जिससे सामान्यादि पदार्थों में भी
"ये सत् हैं" इस प्रकार की प्रतीति होती है । अतः सामान्यादि में जातिरूप सत्ता
का सम्बन्ध न भी रहे, तथापि द्रव्यादि से सामान्यादि पदार्थों से भिन्नत्व प्रतीति का
पट दोनों परस्पर भिन्न होते हुए भी दोनों में 'ये द्रव्य हैं' । इस एक आकार की प्रतीति
होती है । इसका भी कारण घट और पट में द्रव्यत्व नामक सामान्य का रहना ही है ।