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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८९
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हति । तथा चाह सूत्रकारः -"समवायिनः
श्वैत्याच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते बुद्धेस्ते कार्यकारणभूते" इति ।
अर्थात् ज्ञानरूप एक अर्थ में विशेष्य और विशेषण के सामानाधिकरण्य
मात्र से (फलतः दोनों के एक ज्ञान में विषय होने मात्र से) विशेष्य ज्ञान की
उत्पत्ति नहीं हो सकती । जैसा कि सूत्रकार ने कहा है कि 'समवायी' (अर्थात्
विशेष्य) की शुक्लता से द्रव्य में शुक्लता की प्रतीति होती है; क्योंकि
इन दोनों (विशेषण एवं विशेष्य के ज्ञानों) में एक कारण और दूसरा कार्य है,
न्यायकन्दली
परिहारमाह-न, विशेष्यज्ञानत्वादिति । ज्ञानमात्रादेव द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्ति-
रित्येतन्न, कस्मात् ? विशेष्यज्ञानत्वात् । भवतु विशेष्यज्ञानं तथापि कुतो ज्ञानमात्रान्न
भवति ? तत्राह-न हीति । विशेषणं विशेष्यस्य स्वरूपं विशेष्यानुरञ्जकं विशेष्ये
स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुरिति यावत् । न चाविद्यमानस्यानुरञ्जकत्वं स्वोपसर्जनताप्रतीति-
हेतुत्वं युक्तम्, अतो न विशेष्यज्ञानं विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हति विशेष्यज्ञानं
सारूप्याद्विशेषणानुक्तत्वाद्विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुं नार्हति । सूत्रार्थे सूत्रकारानुमतिं
तो वाय्वभ्रसंयोग की अनुमिति से पहले विद्यमान ही है; क्योंकि (प्रतियोगीभूत)
वस्तुओं की स्वरूपतः उत्पत्ति के बिना प्रागभाव का विनाश नहीं होता है, अतः
मेरी ही व्याख्या ठीक है ।
'न विशेष्यज्ञानत्वात्' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । यह
बात नहीं है कि (द्वित्व के नष्ट हो जाने पर भी) केवल द्वित्व के ज्ञान से ही 'द्वे
द्रव्ये' इस (विशेष्य) ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (प्र.) क्यों ? (उ.) चूँकि वह
विशेष्य ज्ञान है । (प्र.) रहे वह विशेष्यज्ञान ही फिर भी (हेतु के न रहने पर
भी हेतु के) केवल ज्ञान से ही उसकी उत्पत्ति क्यों नहीं होगी ? 'न हि' इत्यादि से
इसी प्रश्न का समाधान करते हैं । (अर्थात्) विशेषण विशेष्य (विशिष्ट) का
'स्वरूप' है, अर्थात् विशेष्य का 'अनुरञ्जक' है । फलतः अपने में उपसर्जनत्व
(विशेषणत्व) प्रतीति का कारण है । यह अनुरञ्जकता या 'स्व' में उपसर्जनता
प्रतीति की कारणता किसी अविद्यमान वस्तु में नहीं हो सकती, अतः विशिष्टज्ञान
में (विशेष्यज्ञान ज्ञानत्व रूप से अविशिष्ट ज्ञान का) सारूप्य रहने के कारण ही
विशेषण सम्बन्ध के बिना यह अनुरञ्जकता नहीं हो सकती । 'तथा चाह'
इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रसङ्ग में सूत्रकार की अनुमति दिखलाते हैं । द्रव्यविशेष
में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले श्वेत गुण से ही श्वैत्यबुद्धि अर्थात्

२१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
न तु लैङ्गिकं ज्ञानमभेदेनोत्पद्यते । तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । न, आशुत्पत्तेः ।
यथा शब्दयदाकाशमित्यत्र त्रीणि ज्ञानान्याशूत्पद्यन्ते, तथा द्वित्वादिज्ञानो-
त्पत्तावित्यदोषः ।
अर्थात् (विशिष्टज्ञानरूप विशेष्य ज्ञान में विशेषण कारण है), अतः
लैङ्गिक ज्ञान अर्थात् अनुमिति में लिङ्ग अर्थात् हेतु अभेद सम्बन्ध से भासित
नहीं होता (किन्तु 'श्वेतः शङ्खः' इत्यादि आकार के विशेष्य ज्ञान अथवा
विशिष्ट ज्ञान में 'श्वेत' रूप विशेषण अभेद सम्बन्ध से भासित होता
है), अतः विशेष्य में विशेषण के न रहते हुए भी विशेषण के केवल ज्ञान
से ही विशिष्ट ज्ञान की उपपत्ति के लिए लैङ्गिक ज्ञान को दृष्टान्त रूप
में उपस्थित करना युक्त नहीं है; क्योंकि लैङ्गिक ज्ञान एवं विशेष्य ज्ञान
दोनों समान नहीं हैं । (प्र.) 'द्वे द्रव्ये इस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से द्रव्य की
तरह उसमें विशेषणीभूत द्वित्व भी प्रकाशित होता है; किन्तु उस समय द्वित्व
न्यायकन्दली
दर्शयति-तथा चाहेति । समवायिनः समवेताच्छ्वैत्याच्छ्वेतगुणाच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते द्रव्ये
बुद्धिर्भवति श्वेतं द्रव्यमिति । ते विशेषणविशेष्यबुद्धी कार्यकारणभूते कार्यकारणस्त्यभावे
इति सूत्रेण विशेषणस्यानुरञ्जकत्वमुक्तम् । तच्चाविद्यमानस्यानस्तीति भावः ।
सम्प्रति लैङ्गिकज्ञानस्य विशेष्यज्ञानात् 'तु'शब्देन विशेषं सूचयन्नाह-न त्विति ।
लैङ्गिकं ज्ञानं लिङ्गाभेदेन लिङ्गिनो लिङ्गोपसर्जनताग्राहितया नोत्पद्यते ।
तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । लैङ्गिकवदित्युपन्यासो विषमो द्वे द्रव्ये इति ज्ञानेन
सह तुल्यो न भवतीत्यर्थः । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानकाले द्वित्वमपि नास्ति कथं
तद्विशिष्टमेव ग्रहणम् ? न, ज्ञानोत्पत्तेः पूर्वस्मिन् क्षणे तस्य सद्भावात् । सर्वत्र
श्वेत द्रव्य में श्वैत्यबुद्धि की उत्पत्ति होती है; क्योंकि श्वैत्य बुद्धि एवं श्वेत गुण
इन दोनों में पहला कार्य है और दूसरा कारण ।
अब लैङ्गिक ज्ञान (अनुमिति) से प्रकृत विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान में 'तु' शब्द के द्वारा
अन्तर दिखलाते हुए 'न तु' इत्यादि भाष्य लिखते हैं । अर्थात् (जिस प्रकार 'श्वेतः
शङ्खः' इस विशिष्टबुद्धि में श्वेतगुणविशिष्ट अभेद सम्बन्ध से भासित होता है, उसी
प्रकार) लैङ्गिक ज्ञान में लिङ्ग का अभेद भासित नहीं होता है, फलतः अनुमिति में
साध्य का भान होता है; किन्तु साध्य में विशेषण होकर हेतु का भान नहीं होता,
अतः कोई भी अनुमिति लिङ्गाभेदविशिष्ट लैङ्गिक विषयक न होने के कारण लिङ्ग
में साध्य की उपसर्जनता नहीं होती । तस्मात् इसका दृष्टान्त रूप से 'लैङ्गिकवत्' इस
वाक्य का उत्थापन 'विषम' है, अर्थात् लैङ्गिकवत् यह दृष्टान्त प्रकृत 'द्वे द्रव्ये' इस
ज्ञान के बराबर नहीं है । (प्र.) 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय जब द्वित्व की सत्ता ही
नहीं है, तो फिर द्वित्व से युक्त द्रव्य का उस ज्ञान से ग्रहण ही कैसे होता है ? (उ.)