वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो द्वित्व-
गुणबुद्धेर्विंनश्यत्ता द्रव्यज्ञानात् संस्कारस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।
तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् द्वित्वगुणबुद्धेर्विनाशो द्रव्यबुद्धेरपि संस्कारात् ।
संवलन, द्रव्यज्ञान से उसी विषयक संस्कार की उत्पादक सामग्री का
संवलन-इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त द्रव्य-
विषयक ज्ञान से गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि का विनाश और उस
द्रव्यविषयक बुद्धि का भी संस्कार से विनाश हो जाता है ।
न्यायकन्दली
द्वित्वगुणश्च तस्य ज्ञानं च सम्बन्धश्चेति योजना । तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो
द्वित्वस्य विनाशो गुणबुद्धेर्विनाशश्चेत्येकः कालः । यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिकाले
द्वित्वं नास्ति, तथापि तदस्य कारणम्, कार्योत्पत्तिकाले कारणस्थितेरनुपयोगात् । कार्योत्पत्त्य-
नुगुणव्यापारजनकत्वं हि कारणस्य कारणत्वम् । स चेदनेन कृतः, किमस्य कार्योत्पत्ति-
काले स्थित्या ? व्यापारादेव कार्योत्पत्तिसिद्धेः । न त्वेवं सति तस्याकारकत्वम्, व्यापार-
द्वारेण तस्यैव हेतुत्वात् । न चैवं सति भाक्तं कारकत्वम् ? स्वव्यापारेण व्यवधाना-
ज्ञान 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार के) द्रव्यविषयक ज्ञान का उत्पादक भी है । अतः गुण-
स्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (सामान्यरूप द्वित्वविषयक ज्ञान) की
'विनश्यत्ता' एवं दूसरे ('द्वे द्रव्ये' इस द्रव्य ज्ञान) की 'उत्पद्यमानता' दोनों ही होगी ।
'द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्यः' इस समस्त वाक्य का विग्रह इस प्रकार है-द्वित्वगुणश्च,
तस्य ज्ञानञ्च, सम्बन्धश्च । इसके बाद के एक समय में 'द्वे द्रव्ये' इस द्रव्यज्ञान की
उत्पत्ति, द्वित्व का विनाश एवं गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की विनश्यत्ता ये तीन
काम होते हैं । यद्यपि 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के उत्पत्तिकाल में द्वित्व की सत्ता नहीं
रहती, फिर भी द्वित्व उस ज्ञान का कारण अवश्य है । कारण होने के लिए यह
आवश्यक नहीं है कि वह कार्य के उत्पत्ति क्षण तक रहे ही; क्योंकि कार्य के
उत्पादन में उस समय तक कारण की सत्ता का कुछ भी उपयोग नहीं है । कारण
का इतना ही स्वरूप है कि कार्य की उत्पत्ति के अनुकूल किसी व्यापार को वह
उत्पन्न कर दे । यह (व्यापारोत्पादनरूप) काम अगर इस (द्वित्व) ने कर दिया तो
फिर कार्य की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता रहे ही इससे क्या प्रयोजन ? द्वित्व
से उत्पन्न व्यापार के द्वारा 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञानस्वरूप कार्य की उत्पत्ति तो हो ही
जाएगी; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह (व्यापारी द्वित्व) कारण ही नहीं है,
वह भी (उत्पत्तिकण के अव्यवहित पूर्व क्षण में न रहने पर भी) व्यापार के
उत्पादन के द्वारा कारण अवश्य है । (प्र.) तो फिर द्वित्व में व्यापार के द्वारा
कारणत्व के रहने से कारकत्व का प्रयोग गौण है ? (उ.) नहीं; क्योंकि मध्य में
२८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो
निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति ।
इसी से (अनेक द्रव्यों में रहने वाली) त्रित्वादि संख्याओं की भी
व्याख्या समझनी चाहिए । (फलतः अनेक द्रव्यों में रहनेवाली संख्याओं
की उत्पत्ति) अनेकविषयक बुद्धि का साथ रहने पर अनेक एकत्वों से
होती है एवं अपेक्षाबुद्धि के विनाश से इन (अनेकद्रव्या संख्याओं) का
विनाश होता है ।
न्यायकन्दली
भावात् । अन्यथा शरमुक्तिसमकालं निष्ठुरपृष्ठाभिघातादभिपतितस्य धन्विनः क्षणान्तर-
भाविनि लक्ष्यव्यतिभेदे कर्तृत्वं न स्यात् । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् गुणबुद्धेर्विनाशः, संस्कार-
स्योत्पद्यमानता, ततः संस्कारस्योत्पादो द्रव्यबुद्धेर्विनश्यत्ता, क्षणान्तरे संस्काराद् द्रव्यबुद्धे-
र्विनाशः, द्रव्यबुद्धिविनाशकारणत्वं च, संस्कारस्य तद्भावभावित्वादप्यन्याऽसम्भवाच्च ।
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एतेन द्वित्वोत्पत्तिविनाशनिरूपणप्रक्रमेण
त्रित्यादीनामुत्पत्तिर्व्याख्याता । तमेव प्रकारं दर्शयति-एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो
निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति ।
व्यापार के रहने से भी व्यवधान नहीं माना जाता । अगर ऐसी बात न हो तो
फिर तीर छोड़ने के समय यदि कोई धनुषधारी पीठ में पाये हुए किसी निष्ठुर
आघात से गिर जाय और उस छोड़े हुए तीर से आगे क्षण में लक्ष्य का छेदन भी
हो जाय, तब उस धनुषधारी में उस छेदन क्रिया के कर्तृत्व का व्यवहार नहीं होगा
(क्योंकि छेदन क्रिया की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता नहीं है) । इसके बाद 'द्वे
द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान से गुण (द्वित्व) बुद्धि का नाश होता है एवं
संस्कार के कारण एकत्र होते हैं। इसके दूसरे क्षण में संस्कार की उत्पत्ति होती है
एवं उक्त द्रव्यबुद्धि के विनाशक और कारणों का संवलन होता है । इसके बाद के
क्षण में संस्कार से उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस बुद्धि का विनाश होता है । संस्कार के रहने
से ही उक्त बुद्धि का नाश होता है एवं संस्कार को छोड़कर और कोई उसके
विनाश का कारण सम्भव भी नहीं है । इन्हीं दोनों से यह समझना चाहिए कि
संस्कार ही उक्त द्वित्वविषयक बुद्धि के विनाश का कारण है ।
एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । 'एतेन' द्वित्व की उत्पत्ति एवं विनाश के
उक्त उपपादन क्रम से त्रित्वादि और अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली (अनेकद्रव्या)
और संख्याओं की भी व्याख्या हो गयी समझनी चाहिए । त्रित्वादि संख्याओं की
उत्पत्ति की ही रीति 'एकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च
विनाशः' इत्यादि से दिखलायी गयी है ।