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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७७
न्यायकन्दली
मित्यत्र का वार्ता ? न हि चक्षुर्गन्धविषयं न च घ्राणं द्रव्यमादत्ते । अत एव न ताभ्यां
सम्बन्धग्रहणम्, उभयसम्बन्धिग्रहणाधीनत्वात् सम्बन्धग्रहणस्य । यथा संस्कारेन्द्रियजन्यं
प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षमुभयकारणसामर्थ्यात्पूर्वापरकालविषयम्, एवं चक्षुर्घाणाभ्यां सम्भूय
जन्यमानमिदं कारणद्वयसामर्थ्यादुभयविषयं स्यादित्येके समर्थयन्ति ।
तदपि न साधीयः, निर्भागत्वात् । यदि ज्ञानं सभागं स्यात्तदा कश्चिदस्यांशो घ्राणेन
जन्येत कश्चिच्चक्षुषेत्युपपद्यते व्यवस्था; किन्त्विदमेकमखण्डमुभाभ्यां जनितं यदि गन्धं द्रव्यं
च गृह्णाति, तदा गन्धोऽपि चाक्षुषो द्रव्यमपि घ्राणगम्यं प्रसक्तम्, तज्जनितज्ञानविषयत्व-
लक्षणत्वात्तत्तदिन्द्रियग्राह्यतायाः । न चाणुत्वान्मनसो युगपदुभयेन्द्रियाधिष्ठानसम्भवः । तस्माद्
घ्राणेन गन्धे गृहीते पश्चात्तद्ग्रहणसहकारिणा चक्षुषा केवलविशेष्यालम्बनमेवेदं विशेष्यज्ञानं
जन्यत इत्यकामेनाप्यभ्युपगन्तव्यम् । तथा च सत्यन्येषामपि विशेष्यज्ञानानामयं न्याय
क्योंकि गन्ध का ग्रहण आँखों से नहीं होता एवं घ्राण में द्रव्य को ग्रहण करने की
शक्ति नहीं है । अतएव सौरभ और चन्दन इन दोनों का ग्रहण भी इन दोनों
इन्द्रियों से नहीं हो सकता, क्योंकि सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उनके दोनों आश्रयों
का प्रत्यक्ष आवश्यक है । कोई कहते हैं कि 'सुरभिचन्दनम्' यह एक ही ज्ञान चक्षु
और घ्राण दोनों इन्द्रियों से होता है । इसका समर्थन इस प्रकार करते हैं कि जिस
प्रकार (योऽहं घटमद्राक्षं सोऽहमिदानीं स्मरामि) इत्यादि आकार की प्रत्यभिज्ञारूप
प्रत्यक्ष इन्द्रिय से उत्पन्न होने के कारण वर्तमानकालविषयक होता है, एवं संस्कार
से उत्पन्न होने के कारण भूतकालविषयक भी होता है, इस प्रकार 'सुरभिचन्दनम्'
यह ज्ञान अलग-अलग सामर्थ्य वाली चक्षु और घ्राण इन दोनों इन्द्रियों से उत्पन्न
होने के कारण द्रव्य एवं सौरभ दोनों विषयों का हो सकता है ।
किन्तु इस प्रकार का समर्थन संगत नहीं है; क्योंकि ज्ञान अखण्ड है, उसके
अंश नहीं होते । यदि ज्ञान अंशों से युक्त होता तो यह कह सकते थे कि उसका
एक अंश आँखों से उत्पन्न होता है तो दूसरा घ्राण से । अतः ज्ञान अगर अखण्ड
है और उसकी उत्पत्ति दो इन्द्रियों से होती है एवं सौरभ और द्रव्य दोनों उसके
विषय हैं, तो फिर यह मानना ही पड़ेगा कि गन्ध का ग्रहण भी आँख से होता है,
एवं घ्राण से द्रव्य भी गृहीत होता है; क्योंकि जिस इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न
ज्ञान से जिसका प्रतिभास होता है, वही उस इन्द्रिय का ग्राह्य विषय है ।
दूसरी बात यह है कि मन अणु है, अतः एक ही समय वह दो इन्द्रियों का
अधिष्ठान नहीं हो सकता, अतः इच्छा न रहते हुए भी प्रकृत में आपको यही
मानना पड़ेगा कि घ्राण के द्वारा केवल गन्ध का ग्रहण हो जाने के बाद उसके
सहकारी चक्षु के द्वारा केवल विशेष्यविषयक (चन्दनविषयक) ज्ञान उत्पन्न
होता है । इस प्रकार यही रीति अन्य विशेष्य ज्ञानों के लिए भी प्रयुक्त होती

२७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
उपतिष्ठते । विवादाध्यासितं विशेष्यज्ञानम्, केवलविशेष्यालम्बनम्, प्रत्यक्षत्वे सति विशेष्य-
ज्ञानत्वात्, सुरभिचन्दनमिति ज्ञानवत् । प्रत्यक्षत्वे सतीति लैङ्गिकज्ञानव्यवच्छेदार्थम् । ननु
यदि द्रव्यस्वरूपमात्रमेव विशेष्यज्ञानस्यालम्बनम्, असत्यपि विशेषणे तथा प्रत्ययः स्यात् ।
अथ विशेषणस्य जनकत्वान्न तदभावे विशेष्यज्ञानोदयः, तथापि द्रव्यरूपप्रत्ययादस्य न
विशेषः, विषयविशेषमन्तरेण ज्ञानस्य विशेषान्तराभावात्, न, अनभ्युपगमात् । न
विशेष्यज्ञानस्य द्रव्यस्वरूपमात्रमालम्बनं ब्रूमः, किन्तु विशिष्टम् । विशिष्टता च
स्वरूपातिरेकिण्येव, या दण्डीति ज्ञाने प्रतिभासते । न खलु तत्र पुरुषमात्रस्य प्रतीतिर्नापि
दण्डसंयोगितामात्रस्य । तथा च दण्डीति प्रतीतावितरविलक्षण एव पुरुषः संवेद्यते
वैलक्षण्यं चास्य दण्डोपसर्जनत्वमेव । अत एव विशेषणं व्यवच्छेदकमिति गीयते । दण्डो
हि स्वोपसर्जनताप्रतिपत्तिं पुरुषे कुर्वन् पुरुषमितरस्माद् व्यवच्छिनत्ति । अयमेव
है। इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार 'सुरभिचन्दनम्' यह ज्ञान
प्रत्यक्षात्मक होने पर भी केवल विशेष्यविषयक ज्ञान है, उसी प्रकार प्रकृत में
विवाद का विषय 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान भी केवल विशेष्यविषयक ही है; क्योंकि वह
भी प्रत्यक्षात्मक होने पर भी विशेष्य ज्ञान है । प्रकृत अनुमान वाक्य के प्रयोग के
हेतु वाक्य में 'प्रत्यक्षत्वे सति' यह विशेषण अनुमिति में व्यभिचार वारण के लिए
है । (प्र.) यदि 'द्वे द्रव्ये' इस विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान का विषय केवल द्रव्य ही हो
तो फिर विशेषण के न रहने पर भी उक्त प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । यदि
यह कहें कि विशेषण विशेष्यज्ञान का कारण है, अतः विशेषण के न रहने पर
विशिष्टज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, तथापि केवल 'द्रव्यम्' इस आकार के ज्ञान
में और उक्त विशिष्टज्ञान में कोई अन्तर नहीं रहेगा; क्योंकि कारणों की विभिन्नता
रहते हुए भी दोनों ज्ञानों के विषयों में कोई अन्तर नहीं है । विषयों के भेद से ही
ज्ञानों में भेद होता है, कारणों के भेद से नहीं । (उ.) हम यह नहीं मानते कि 'द्वे
द्रव्ये' इस ज्ञान में केवल द्रव्य ही विषय है; किन्तु 'विशेष्य' (विशिष्ट) को उक्त
ज्ञान का विषय मानते हैं । 'दण्डी' इस प्रकार की विशिष्ट प्रतीति में भासित होने
वाली विशिष्टता विशेष्य (विशिष्ट) के स्वरूप से कोई भिन्न वस्तु नहीं है । 'दण्डी'
इस प्रतीति से दण्ड से रहित पुरुषों से विलक्षण पुरुष का ही बोध होता है । और
पुरुषों से इस पुरुष में यही वैलक्षण्य है कि यह दण्डरूप विशेषण का विशेष्य है,
और कुछ भी अन्तर नहीं है । अतएव विशेषण को व्यवच्छेदक (भेदक)
कहा जाता है । पुरुष में अपनी (दण्ड की) विशेष्यता की प्रतीति एवं इस पुरुष
को और पुरुषों से भिन्न समझना ये ही दो काम यहाँ दण्डरूप विशेषण
के हैं । विशेषण और उपलक्षण इन दोनों में यही अन्तर है कि उपलक्षण