वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६७
प्रशस्तपादभाष्यम्
एकादिव्यवहारहेतुः संख्या ।
'यह एक है, ये दो हैं' इत्यादि व्यवहारों का कारण ही 'संख्या' है ।
न्यायकन्दली
संयोगादुत्पन्नेषु द्व्यणुकान्तरकारणस्य परमाणोर्द्व्यणुकान्तरकारणेन परमाणुना सह
संयोगाद् द्व्यणुकान्तरकारणपरमाणुना संयोगः, ततोऽपि द्व्यणुकयोः संयोग इत्यनेन
क्रमेण संयोगजसंयोगेभ्य एतेषामुत्पादात् । एवं यथोपदेशं यथाप्रज्ञं च व्याख्यातमस्माभिः ।
सिद्धेऽपि सङ्ख्यास्वरूपे ये केचिदत्यन्तदुद्दर्शनाभ्यासात्तिरोहितबुद्धयो विप्रतिपद्यन्ते तान्
प्रत्याह- एकादीति । व्यवहृतिर्व्यवहारो ज्ञेयज्ञानं व्यवह्रियतेऽनेनेति व्यवहारः शब्दः,
एकादिव्यवहार एकं द्वे त्रीणीत्यादिप्रत्ययः शब्दश्च, तयोर्हेतुः सङ्ख्येति । एकं द्वे
त्रीणीत्यादिप्रत्ययो विशेषणकृतो विशिष्टप्रत्ययत्वाद् दण्डीतिप्रत्ययवत् । एवं शब्दमपि
पक्षीकृत्य विशिष्टप्रत्ययत्वादिति हेतुर्वगन्तव्यः ।
के संयोग से द्व्यणुकों की उत्पत्ति हो जाने पर दूसरे द्वयणुक के कारणीभूत
परमाणु का तीसरे द्वयणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा। इस
संयोग से एक द्वयणुक का दूसरे द्वयणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी
संयोग होगा । परमाणु एवं द्वयणुक के इस संयोग से इस परमाणु के कार्यरूप
द्वयणुक एवं पहले के द्वयणुक इन दोनों में संयोगजसंयोग होगा। इन द्व्यणुकों के
संयोगजसंयोग के द्वारा भी त्र्यसरेणु की उत्पत्ति हो सकती है। इस विषय में हम
लोगों की जैसी शिक्षा है और जितनी बुद्धि है, तदनुसार व्याख्या लिखी है।
संख्या को यद्यपि सभी लोग जानते हैं फिर भी अत्यन्त दुष्ट दर्शनों के
अभ्यास से जिनकी बुद्धि मारी गयी है, वे इसमें भी विवाद ठानते हैं, अतः
उनको समझाने के लिए ही 'एकादि' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । 'व्यवहृति-
र्व्यवहारः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'व्यवहार' शब्द का अर्थ ज्ञान है । एवं
'व्यवह्रियते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसी का शब्दप्रयोग अर्थ भी है ।
(तदनुसार) 'एकादिव्यवहारः' अर्थात् एक, दो, तीन इत्यादि की प्रतीतियाँ एवं
एक, दो, तीन इत्यादि शब्दों के प्रयोग इनदोनों की हेतु ही 'संख्या' है । (प्रतीति
की हेतुता संख्या में इस प्रकार है कि ) जैसे कि 'दण्डी पुरुषः' इस विशिष्ट
प्रतीति के प्रति दण्ड केवल इसीलिए कारण है कि वह भी विशिष्ट प्रतीति (अर्थात्
विशेषण से युक्त विशेष्य की प्रतीति) है, वैसे ही 'यह एक है, ये दो हैं, ये तीन
हैं' इत्यादि प्रतीतियाँ भी विशिष्ट प्रतीति होने के कारण ही एकत्वादि संख्या रूप
विशेषणों से उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार शब्द को पक्ष बनाकर विशिष्ट शब्दत्व
२६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
नन्वयं प्रत्ययो रूपादिविषयः ? न, तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । रूपनिमित्तो हि प्रत्ययो
नीलं पीतमित्येवं स्यान्न त्वेकं द्वे इत्यादि । अस्तु तर्हि निर्विषयो रूपादिद्व्यतिरि-
क्तस्यार्थस्याभावात् । कुतोऽस्मिन्नेकद्वित्रीणीत्याद्याकारो जातः ? आलयविज्ञानप्रति-
बद्धवासनापरिपाकादिति चेत् ? नीलाद्याकारोऽपि तत एवास्तु, न हि ज्ञानारूढस्य तस्य
सङ्ख्याकारस्य वा कश्चिदनुभवकृतो विशेषो येनैकोऽर्थजोऽनर्थजश्चापर इति प्रतिपद्यामहे ।
अथायं विशेषोऽयमभ्रान्तो नीलाकारः, सङ्ख्याकारस्तु विप्लुत इति । तदसारम्,
नीलाकारस्याप्यत्राभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावात् । न तावत् क्वचिदस्यास्ति संवादः,
तदेकज्ञाननियतत्वात् क्षणिकत्वाच्च । अत एव नार्थक्रियापि । न च प्रत्येकं
सर्वज्ञानेषु स्वाकारमात्रसमाहितेषु पूर्वपरज्ञानवर्तिनामाकाराणां सादृश्यप्रतिपत्ति-
को संख्या का साधक हेतु समझना चाहिए¹ ।
(प्र.) ये ('एकः, द्वौ' इत्यादि) प्रतीतियाँ तो रूपादिविषयक हैं ? (उ.)
रूपादिविषयक प्रतीतियाँ 'यह नील है, यह पीत है' इत्यादि आकारों की होती हैं,
'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ उनसे भिन्न आकार की हैं । अतः ये रूपादिविषयक
नहीं हैं । (प्र.) (प्रत्यक्ष से दीखने वाले) रूपादि पदार्थों से भिन्न किसी वस्तु की
सत्ता नहीं है । अतः 'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ (अगर रूपादिविषयक नहीं हैं
तो फिर) बिना विषय के (निर्विषयक) ही मानी जायें ? (उ.) तो फिर इस प्रतीति
में 'एकः, द्वौ' इत्यादि आकार किससे उत्पन्न होते हैं । (प्र.) आलयविज्ञान में
नियत रूप से सम्बद्ध वासना के परिपाक से ही (उक्त आकार उत्पन्न होते हैं)
(उ.) इस प्रकार तो नीलाकार, पीताकारादि ज्ञान भी उस वासना से ही उत्पन्न
होंगे (फलतः निर्विषयक होंगे); क्योंकि ज्ञानों में सम्बद्ध संख्या के आकारों
में एवं नीलादि के आकारों में कोई अन्तर नहीं है । अतः नीलादिविषयक
प्रतीतियों को अर्थ (नीलादि) जन्य मानें एवं संख्याविषयक प्रतीति को अनर्थ
(केवल वासना) जन्य मानें, इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है । (प्र.) यही दोनों में
अन्तर है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं और संख्यादि आकार भ्रान्त हैं ।
(उ.) यह समाधान ठीक नहीं है; क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि
नीलादि आकार अभ्रान्त हैं । एवं प्रत्येक आकार क्षणिक है, अतः एक
आकार नियमतः एक ही ज्ञान से गृहीत हो सकता है । सुतरां नीलादि
आकारों की अभ्रान्तता किसी प्रमाण से निश्चित नहीं हो सकती । प्रत्येक ज्ञान
क्षणिक होने के कारण अर्थक्रियाकारी (कार्यजनक) होने पर भी नीलाकारादि की
- अर्थात् जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' विशेष प्रकार के इस शब्द के प्रयोग में दण्ड कारण है
उसी प्रकार 'एकः, द्वौ, त्रीणि' इत्यादि प्रयोगों का भी कोई कारण अवश्य है । वही है
संख्या ।