वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१
प्रशस्तपादभाष्यम्
सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वनैमित्तिकद्रवत्ववेगाः
सामान्यगुणाः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः ।
संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व,
नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये (दश) सामान्य गुण हैं ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच में से प्रत्येक एक ही
इन्द्रिय से गृहीत होता है एवं बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होता है ।
न्यायकन्दली
व्यवच्छिन्दन्ति न संख्यादयः, तेषां स्वतो विशेषाभावात् । यस्तु तेषां विशेषः स
आश्रयविशेषकृत एवेति बोद्धव्यम् ।
संख्यादयः सामान्यगुणाः । सामान्याय स्वाश्रयसाधर्म्याय गुणाः, न स्वाश्रयविशेषा-
येत्यर्थः । नन्वणुपरिमाणं परमाणूनां व्यवस्थापकम् ? न, जात्यन्तरपरमाणुसाधारणत्वात् ।
सांसिद्धिकद्रवत्वमपां विशेषगुण एव तेन नैमित्तिकग्रहणम् ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः । बाह्यानीन्द्रियाणि चक्षुरादीनि बाह्यार्थ-
प्रकाशकत्वात् । तैः प्रत्येकं रूपादयो गृह्यन्ते ।
वे ही 'वैशेषिक गुण' हैं, जैसे कि रूपादि । ये अपने आश्रयों को औरों से भिन्न
रूप में समझाते हैं । संख्यादि सामान्य गुण अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप
में नहीं समझा सकते; क्योंकि (एक द्रव्य की एक संख्या से दूसरे द्रव्य की उसी
संख्या में) स्वतः कोई अन्तर अर्थात् विशेष नहीं है । उन दोनों संख्याओं में जो
कुछ अन्तर है उसे आश्रय के विशेषों से ही समझना चाहिए ।
ऊपर कहे हुए संख्यादि सामान्य गुण हैं । अर्थात् 'सामान्याय गुणाः' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार कथित संख्यादि 'सामान्य' अर्थात् अपने आश्रयों में परस्पर
साधर्म्य प्रतीति के ही कारणीभूत गुण हैं, इनसे इनके आश्रयों में परस्पर विभिन्नता
की प्रतीति नहीं होती है । (प्र.) अणु परिमाण तो परमाणुओं का व्यवस्थापक है,
अर्थात् और परिमाणवालों से विभिन्नत्व बुद्धि का कारण है ? (उ.) नहीं, अणु
परिमाण भी विभिन्न जातीय परमाणुओं में समान रूप से रहने के कारण परस्पर
(परमाणुत्व रूप) साधर्म्यबुद्धि का ही कारण है । सांसिद्धिक (स्वाभाविक) द्रवत्व
जल का विशेष गुण है, अतः नैमित्तिक द्रवत्व को ही सामान्य गुणों में गिनाया है ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण 'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् बाह्य
विषयों के ही प्रकाशक होने के कारण चक्षुरादि 'बाह्येन्द्रिय' हैं । शब्दादि में से प्रत्येक
२३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वद्रवत्वस्नेहवेगा द्वीन्द्रिय-
ग्राह्याः ।
बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नास्त्वन्तःकरणग्राह्याः ।
संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व,
नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये नौ गुण दो इन्द्रियों से (भी) गृहीत हो
सकते हैं ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये छः गुण 'अन्तःकरण'
अर्थात् मन से ज्ञात होते हैं ।
न्यायकन्दली
संख्यादयो वेगान्ता द्वीन्द्रियग्राह्याः चक्षुःस्पर्शनग्राह्याः । यथा चक्षुषा 'स्निग्धोऽयम्'
इति प्रतीतिरेवं त्वगिन्द्रियेणापि भवति, संख्यादिवत् स्नेहोऽपि तदुभयग्राह्यः ।
बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ता अन्तःकरणग्राह्याः, मनसा प्रतीयन्त इत्यर्थः ।
बुद्धिरनुमेया नान्तःकरणेन गृह्यत इति केचित्, तदयुक्तम्, लिङ्गाभावात् ।
न तावदर्थमात्रं लिङ्गम्, तस्य व्यभिचारात् । ज्ञातोऽर्थो लिङ्गं चेत् ? ज्ञान-
सम्बन्धो ज्ञातता, याऽसौ ज्ञानकर्मता सा प्रतीयमाने ज्ञाने न प्रतीयते,
सम्बन्धिप्रतीत्यधीनत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति कथं तद्विशेषणार्थो लिङ्गं स्यात् ?
चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों में से ही किसी एक इन्द्रिय से गृहीत होता है ।
संख्या से लेकर वेगपर्यन्त कथित ये दश गुण 'द्वीन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् चक्षु
और त्वचा दोनों इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । 'यह स्निग्ध है' यह प्रतीति जैसे चक्षु
से होती है, वैसे ही त्वचा से भी होती है, अतः संख्यादि की तरह स्नेह भी
'द्वीन्द्रियग्राह्य' है ।
बुद्धि से लेकर प्रयत्न पर्यन्त कहे हुये ये छः गुण 'अन्तःकरणग्राह्य' हैं, अर्थात् इनका
प्रत्यक्ष मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ही होता है । कोई कहते हैं कि (प्र.) बुद्धि का
अनुमान ही होता है, अतः अन्तरिन्द्रिय से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । (उ.) किन्तु
यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि बुद्धि की अनुमिति का कोई उपयुक्त हेतु नहीं है ।
केवल (ज्ञेय) अर्थ के ज्ञान अनुमिति के हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि यह व्यभिचरित
है । ज्ञात अर्थ के ज्ञानों को अनुमिति का हेतु मानें (तो भी नहीं हो सकता,
क्योंकि) अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ही उसकी 'ज्ञातता' है । अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध
(ज्ञानक्रिया का) कर्मत्व रूप ही है । अतः ज्ञान के प्रतीत हुये बिना ज्ञानकर्मत्व रूप
ज्ञातता की प्रतीति नहीं हो सकती; किन्तु अनुमिति में लिङ्ग की तरह उसका विशेषण