वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११
न्यायकन्दली
लिङ्गवल्लिङ्गविशेषणस्यापि ज्ञायमानस्यैवानुमानहेतुत्वम् । अथ मन्यसे 'ज्ञानेन स्वोत्पत्त्य-
न्तरमर्थे ज्ञातता नाम काचिदवस्था जन्यते पाकेनेव तण्डुलेषु पक्वता, सा चार्थ-
धर्मत्वादर्थेन सह प्रतीयते' इति । तदप्यसारम्, अननुभवात् । यथा हि तण्डुला-
नामैवौदनीभावः पक्वताऽनुभूयते नैवमर्थस्य ज्ञातता । या चेयमपरोक्षरूपता हानादिव्य-
वहारयोग्यता च तस्य, साऽपि हि ज्ञानसम्बन्धो न धर्मान्तरम् । यथा चार्थे ज्ञायमाने
ज्ञातता, तथा ज्ञाततायामपि ज्ञायमानायां ज्ञाततान्तरमित्यनवस्था । अथेयं स्वप्रकाशा ?
ज्ञाने कः प्रद्वेषः ?
वस्तुतस्त्रिकालविशिष्टोऽप्यर्थो ज्ञानेन प्रतीयमानो वर्त्तमानकालावच्छिन्नः
प्रतीयते । या च त्रिकालस्य वर्त्तमानकालावच्छिन्नावस्था सा ज्ञातता,
ज्ञानकृतत्वात्तस्य लिङ्गमिति कश्चित् । तदपि न किञ्चित्, वर्त्तमानावच्छिन्नता
भी कारण है, वह लिङ्ग की तरह ज्ञात होकर ही । अगर यह मानें कि (प्र.) ज्ञान
की उत्पत्ति के बाद इस ज्ञान से ही अर्थ की एक विशेष प्रकार की अवस्था होती
है, जिसे ज्ञाततावस्था कहते हैं । जिस प्रकार कि चावल में पाक से पक्वता नाम
की एक अवस्था उत्पन्न होती है । (उ.) इस कथन में भी कुछ विशेष सार नहीं हैं;
क्योंकि पाक से चावल में जिस प्रकार ओदनावस्था रूप पक्वता का अनुभव होता
है, वैसे ही अर्थ में ज्ञातता का कोई अनुभव नहीं होता । (विषयों के ज्ञान के
बाद जो) उसमें अपरोक्षरूपता, त्याग या ग्रहण करने की जो योग्यता भासित होती
है, वह भी ज्ञान सम्बन्ध को छोड़कर और कुछ नहीं है । एवं इस पक्ष में
अनवस्था दोष भी है; क्योंकि जिस प्रकार ज्ञात होने पर अर्थों में ज्ञातता मानते हैं,
उसी प्रकार ज्ञातता के ज्ञात होने पर उसमें भी कोई दूसरी ज्ञातता माननी
पड़ेगी । जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । अगर ज्ञातता को स्वप्रकाश मान
लें तो फिर ज्ञान को ही स्वप्रकाश मान लेने में क्यों द्वेष है ?
कोई कहते हैं कि (प्र.) तीनों कालों में से वर्त्तमानकाल ही ऐसा है जिससे
युक्त अर्थ का प्रत्यक्ष होता है, अर्थात् वर्त्तमानकालिक वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष होता
है । अतः वस्तुओं की जो वर्त्तमानावस्था, भूतावस्था और भविष्यदवस्था है, इनमें से
वस्तुओं के प्रत्यक्षमूलक होने के कारण केवल वर्त्तमानावस्था ही उसकी ज्ञातता है ।
यह ज्ञातता ही ज्ञानानुमिति का हेतु है । (उ.) किन्तु इस कथन में भी कुछ सार नहीं
है; क्योंकि वस्तुओं का वर्त्तमानकाल के साथ सम्बन्ध (या उसमें रहना) ही उनकी
२३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी, न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते ।
योऽपि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति, सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः-किं विषय-
संवेदनमात्मनि समवैति ? विषये वा ? न तावद्विषये, तच्चैतन्यप्रतिषेधात् । अथात्मनि
समवैति ? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति
चेत् ? तत्किं नित्यम् ? अनित्यं वा ? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषये-
न्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनःसंयोगोऽस्य कारणमिति चेत् ? सैव सामग्री विषयसंवेदनो-
त्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन ? अथ तन्नित्यम् ? कादाचित्कविषयेन्द्रियसन्निकर्षादिसहकारि
कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगमः, तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषय-
संवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम् ? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहा-
रस्य च सिद्धेः ।
वर्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है, यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न
नहीं होता, ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है ।
जो कोई विषयसंवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं, उन्हें इस प्रकार पराजित
करना चाहिए कि यह 'विषयसंवेदन' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है ? या
विषयों में ? विषयों में तो रह नहीं सकता; क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन
कर चुके हैं (देखिए-आत्मनिरूपण, पृ. १७१) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से
आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन-सी वस्तु है ? जिसका
विषयसंवेदन से अनुमान होता है । (प्र.) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों
भिन्न हैं; क्योंकि (अनुमेय) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार
है । (उ.) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है ? अथवा अनित्य ? अगर
अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा ।
विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता के मनःसंयोग को अगर उसका
कारण मानें, तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति
मानिये । विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की
क्या आवश्यकता है ? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय
एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व
(कभी होना कभी नहीं) का निर्वाह करते हैं, तो फिर विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व
के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए ।
इस तरह के ज्ञान की कल्पना ही व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हों