वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ११
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ११
न्यायकन्दली
रविशेषात् । वक्तृप्रामाण्यानुसरणन्तु स्वरूपविपर्य्यासहेतोर्दोषस्याभावावगमाय । प्रत्यक्ष इव
स्वकारणशुद्धेरनुगमो विपर्य्यासशङ्कानिरासार्थ इत्येषा दिक् । विस्तरस्त्वद्वयसिद्धौ द्रष्टव्यः ।
ननु कार्य्येऽर्थे शब्दस्य प्रामाण्यं न स्वरूपे, वृद्धव्यवहारेष्वन्वयव्यति-
रेकाभ्यां कार्य्यान्वितेषु पदानां शक्त्यवगमात् । अतो वेदान्तानां न स्वरूपपरतेति
दोनों शब्दों के सामर्थ्य में कोई अन्तर नहीं है । (प्रमात्व के) स्वरूप के
विपर्य्यासरूप अप्रमात्व के प्रयोजक दोषों के अभाव को जानने के लिए ही लौकिक
वाक्यों में वक्ता के प्रामाण्य का अनुसन्धान किया जाता है । जैसे प्रत्यक्ष में स्वरूप
विपर्य्यास, अर्थात् अप्रमात्व की शङ्का को हटाने के लिए उसके कारणों की शुद्धि
का अनुसन्धान किया जाता है । यह केवल इस विषय का दिग्दर्शन मात्र है,
इसका विशेष विचार हमारे 'अद्वयसिद्धि' नामक ग्रन्थ में देखना चाहिए ।
(प्र.) कोई (प्रभाकर) कहते हैं कि कार्य्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शब्द की शक्ति है ।
'स्वरूप' अर्थात् कार्य्यत्व से असम्बद्ध केवल अर्थ में ही नहीं । क्योंकि अन्वय और
व्यतिरेक से वृद्धों से व्यवहृत कार्य्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शक्ति गृहीत होती है¹ । अतः
वेदान्त वाक्य भी स्वरूप अर्थात् कार्य्यत्व से असम्बद्ध अर्थ के बोधक नहीं हैं² ।
साधकतम करण नहीं है। एवं यथार्थानुभव से उत्पन्न स्मृति अप्रमा न होती हुई भी
प्रमाणजन्य न होने के कारण प्रमा नहीं है । जिस यथार्थानुभव से उत्पन्न होने के कारण
जिस स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना है, उस यथार्थ पूर्वानुभव का करण उस
स्मृतिविषय-विषयक उसी यथार्थानुभव को उत्पन्न करने के कारण तज्जनित स्मृति की
उत्पत्ति के समय में ज्ञातज्ञापक हो जाता है सुतरां उससे स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना
नहीं है । तस्मात् उक्त स्मृति में अयथार्थभिन्नत्वप्रयुक्त कदाचित् प्रमात्व का गौण व्यवहार हो
भी,तथापि उसके करण में प्रमाणत्व के व्यवहार की सम्भावना नहीं है ।
- शब्द की शक्ति को ग्रहण करने की स्वाभाविक रीति यह है कि जिस स्थल में एक व्यक्ति
दूसरे व्यक्ति से कहता है कि 'गामानय', अर्थात् गाय ले आओ, अथवा गां बन्धय अर्थात्
गाय को बाँध दो । तब वह व्यक्ति गाय ले आता है या बाँध देता है । अगर उस स्थान
पर कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा रहता है जिसे 'आनय' या 'बन्धय' रूप क्रियापद के अर्थ का
ज्ञान है; किन्तु उस क्रिया के कर्म के बोधक 'गाम्' इस पद के अर्थ का ज्ञान नहीं है, वह
व्यक्ति अनायास ही जिस व्यक्ति को लाया या बाँधा गया देखता है, उस व्यक्ति को गोपद
का अर्थ समझ लेता है । तब फिर दूसरे समय आनयनादि कार्यों को छोड़कर केवल
'गो' प्रभृति अर्थों में गोपद की शक्ति कैसे गृहीत हो सकती है ? - अर्थात् जिस "अशरीरम्" इत्यादि वेदान्तवाक्य को आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष
१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-
न्यायकन्दली
चेत्, वान्तमिदम्, स्वरूपपरस्यापि वाक्यस्य लोके प्रयोगदर्शनात् । यथा परिणामसुरसाम्रं,
परिणतिविरसञ्च पनसामिति । अत्रापि प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुपदेशः, एवं हि वाक्यार्थः परिणाम-
सुरसाम्रं भक्षय, परिणतिविरसञ्च मा भक्षयेति । न, वैयर्थ्यात् । सुरसत्वप्रतीत्यैव स्वयम-
भिलाषात् पुरुषः प्रवर्त्तते, विरसत्वप्रतीत्यैव द्वेषान्निवर्त्तते । का तत्र वस्तुसामर्थ्य-
भाविन्युपदेशापेक्षा, अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवद्भवति । अथ प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेनास्य
वाक्यस्य प्रयोगात् तादर्थ्यमिति चेत्, अस्ति प्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थता, किन्तु जनकतान्न तु
प्रतिपादकत्वेन । यस्माद् भूतार्थविषय एव प्रामाण्यम् । यदि तु प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेन
वाक्यप्रयोगात् तयोःप्रतीयमानयोरपि शाब्दता, आम्रभक्षणोत्तरकालीना तृप्तिर्धातुसाम्यञ्च
(उ.) किन्तु यह कथन भी सारशून्य है, क्योंकि 'स्वरूप' कार्यत्व से असम्बद्ध अर्थ
के बोधक वाक्य से भी लोक में अर्थ-बोध देखा जाता है । जैसे
"परिणतिसुरसाम्रम्, परिणतिविरसञ्च पनसम्" (आम परिणाम में सुखद है और
कटहल परिणाम में दुःखद है) इत्यादि वाक्यों से अर्थ-बोध होता है । (प्र.) यहाँ
पर भी प्रवृत्ति और निवृत्ति ही वक्ता के उन वाक्यों से अभीष्ट है, तदनुसार
उन दोनों वाक्यों का अर्थ यह है कि "आम खाओ, क्योंकि वह परिणाम में सुख
देनेवाला है,और कटहल मत खाओ, क्योंकि वह अन्त में दुःख देनेवाला है" ।
(उ.) नहीं, यह कल्पना व्यर्थ है । वाक्यों को प्रवृत्त्यर्थक या निवृत्त्यर्थक न मानने
पर भी आम में परिणामतः सुख देने की कारणता का ज्ञान ही पुरुष को आम
खाने में प्रवृत्त करेगा । एवं कटहल में परिणामतः दुःख देने की कारणता का
ज्ञान ही पुरुष को कटहल खाने से निवृत्त करेगा । फिर वस्तुओं के सामर्थ्य से ही
उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियों एवं निवृत्तियों में उपदेश की आवश्यकता ही क्या है ?
क्योंकि और सभी प्रमाणों से अज्ञात वस्तु को समझाना ही शास्त्र (शब्द) का
असाधारण प्रयोजन है । (प्र.) "लोग आम खाने में प्रवृत्त हों और कटहल खाने
में नहीं" यह मन में रखकर ही वक्ता उन वाक्यों का प्रयोग करते हैं, अतः
प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों उन वाक्यों के अर्थ हैं । (उ.) यह ठीक है कि उन
वाक्यों से प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है किन्तु इससे केवल यही सिद्ध होता है कि
वे वाक्य क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति के कारण हैं । इससे यह सिद्ध नहीं होता है
कि वे दोनों उन दोनों वाक्यों के प्रतिपाद्य भी हैं । क्योंकि निष्पन्न अर्थों में ही
शब्दों की शक्ति है । (अगर प्रवृत्ति और निवृत्ति के अभिप्राय से उन वाक्यों का
प्रयोग किया गया है, केवल इसीलिए प्रवृत्ति और निवृत्ति को उन वाक्यों का अर्थ
मान लिया जाय तो) आम के खाने से जो तृप्ति होती है या शरीर का उपकार
होता है, उनकी प्रतिपादकता भी उस वाक्य में माननी पड़ेगी । (किसी प्रकार की
में प्रमाण माना है, उसका भी वह निष्पन्न अर्थ नहीं है। उसका भी धार्य्यत्वविशिष्ट कोई
दूसरा ही अर्थ है। जिससे कि आपकी इच्छा पूर्ण नहीं होगी ।