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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं
आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं
(कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः
अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान
जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे
(दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का
स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के
विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है ।
इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दली
भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुलक्ष्यात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य-
मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा-
न्तरेऽपि । तस्माद्भेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डपरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु
पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं
उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे
गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति
गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती
है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
(सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी
अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो
व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत
एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव'
इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु
का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने
सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने
आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं
में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से
प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते
हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से

७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु
द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्तादिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा
'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस
रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में
परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में
'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर
विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक
न्यायकन्दली
प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो
जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति
तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य
प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष-
विरोधादपास्यन्ते ।
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य
कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण
प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे-
इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस
रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति'
अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की
उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह
का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में)
जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष
क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में
उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य
अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले
सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का
है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार-
पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य
(ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में
एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,