वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७
न्यायकन्दली
कल्पयति, अन्यस्मिन् कल्पिते च न तस्योपपत्तिरिति चेत् ? बहिर्भावे सति तस्यो-
पपत्तिरिति केन तत् कथितम् ? वयं तु ब्रूमो बहिर्भावेऽपि सति गृहाभावस्यानुपपत्तिरेव ।
दृष्टमेतद् अव्यापकं द्रव्यमेकत्रास्ति तदन्यत्र नास्तीति । यथा प्राचीप्रतीच्योरेकत्रोपलभ्यमानः
सविताऽन्यत्र न भवतीति, इदं दर्शनबलेनैवावधार्यते जीवतो गृहाभावो बहिर्भावे
सत्युपपद्यते नान्यथेति । नन्वेवमन्वयव्याप्तिपूर्वकैव तथोपपत्त्यवगतिः ? तथा सति
चार्थापत्तिरनुमानमेव, अन्वयाधीनजन्यत्वात् । यत्तु विरोधे सति प्रवर्तत इति तद्
वैधर्म्यमात्रम् । तथा चात्र प्रयोगः-देवदत्तो बहिरस्ति, जीवनसम्बन्धित्वे सति गृहेऽनु-
पलभ्यमानत्वात्, अहमिवेति ।
श्रुतार्थापत्तिमन्तर्भावयति-श्रवणादनुमितस्यानुमानमिति । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इति
वाक्यश्रवणाद् रात्रिभोजनकल्पना 'अनुमितस्यानुमानम्' । लिङ्गभूतेन वाक्येनानुमितात्
पीनत्वात् तत्कारणस्य रात्रिभोजनस्यानुमानात् ।
(प्र.) चैत्र का गृह में न रहना (गृहाभाव) अपनी उपपत्ति के लिए ही दूसरे अर्थ
की कल्पना करता है, यह काम चैत्र के बहिर्भाव रूप दूसरे अर्थ की कल्पना से
ही सम्भव है और किसी दूसरे अर्थ की कल्पना से नहीं। अतः वह चैत्र के
बहिर्भाव की ही कल्पना करता है, किसी और अर्थ की नहीं । (उ.) यह आपसे
किसने कहा कि चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर लेने से ही चैत्र के घर में न
रहने की उपपत्ति हो जाएगी ? यदि हम यह कहें कि जीवित चैत्र के बाहर रहने
की कल्पना कर भी ली जाय, तो भी चैत्र का घर में न रहना अनुपपन्न ही रहेगा।
यदि इसका यह उत्तर दें कि (प्र.) (व्यापक आकाशादि को छोड़कर) जितने भी
अव्यापक (मूर्त्त) द्रव्य हैं, उनको देखते हैं कि एक समय यदि एक आश्रय में
रहते हैं तो दूसरे में नहीं । जैसे कि पूर्वदिशा और पश्चिमदिशा इन दोनों में से
किसी एक में जिस समय सूर्य की उपलब्धि होती है, उस समय वे दूसरी दिशा में
नहीं रहते । इसी से यह समझते हैं कि जीवित चैत्र का घर में न रहना, चैत्र के
बाहर रहने से ही उपपन्न हो सकता है । (उ.) यदि ऐसी बात है तो फिर चैत्र के
बहिर्भाव में उसके गृह में न रहने की अन्वयव्याप्ति से ही अर्थापत्ति होती है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि चूँकि अर्थापत्ति की उत्पत्ति अन्वयव्याप्ति से होती है,
अतः वह अनुमान ही है । यह (अर्थापत्ति रूप अनुमान) जो विरोध के कारण
अपने कार्य में प्रवृत्त होता है, इससे और अनुमानों से इसकी विचित्रता ही केवल
व्यक्त होती है, (इससे इसका अनुमान न होना निश्चित नहीं होता) । प्रकृत में
अनुमान का यह प्रयोग इष्ट है कि जैसे कि 'जीवन सम्बन्ध से युक्त मैं घर में न
रहने पर बाहर अवश्य रहता हूँ' उसी प्रकार जीवन के सम्बन्ध से युक्त देवदत्त
घर में अनुपलब्ध होने के कारण अवश्य ही बाहर है।
'श्रवणादनुमितस्यानुमानम्' इस वाक्य के द्वारा 'श्रुतार्थापत्ति' को अनुमान में अन्तर्भूत
करते हैं । 'श्रवणात्' अर्थात् 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने से जो
५३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-
न्यायकन्दली
इदमत्राकूतम्-अर्थप्रतिपादकत्वं प्रमाणास्यानुपपत्तिः । 'दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्यं
च स्वार्थं बोधयत्येव, का तस्यानुपपन्नता ? पीनत्वं भोजनकार्यं दिवाऽभोजने सति नोप-
पद्यते, कारणाभावात् । तदनुपपत्तौ च वाक्यमप्यनुपपन्नम्, अनन्वितार्थत्वादिति चेत् ?
तर्ह्यर्थानुपपत्तिर्वाक्यस्यानुपपन्नत्वमर्थोपपत्तिश्चोपपन्नत्वम्, न तस्य स्वरूपेणोपपत्त्यनुपपत्ती ।
दिवा न भुञ्जानस्य पीनत्वलक्षणस्यार्थो भोजनकार्यत्वाद् रात्रिभोजनरूपेणार्थेनोपपद्यते, न
रात्रिभोजनवाक्येनेत्यर्थस्यानुपपत्त्या तस्य तद्वाक्यस्य चोपपत्तिहेतुरर्थ एवार्थनीयो न वाक्यम्,
अनुपपादकत्वात् । उपपद्यमानश्चार्थोऽर्थेनैवावगम्यते, दिवा भोजनरहितस्य पीनत्वस्य रात्रि-
भोजनकार्यत्वाव्यभिचारादिति नास्त्यर्थापत्तिः शब्दगोचरा ।
देवदत्त के रात्रिभोजन की कल्पना होती है वह भी 'अनुमितानुमान' ही है ।
अर्थात् 'पीनः' इस वाक्य रूप लिङ्ग (हेतु) से अनुमित पीनत्व (मोटाई) के द्वारा
पीनत्व के कारणीभूत रात्रि-भोजन का वहाँ भी अनुमान ही होता है ।
गूढ़ अभिप्राय यह है कि अपने अर्थ को यथार्थ रूप से न समझा पाना ही
प्रमाणों की अनुपपत्ति है । 'दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य का अर्थ है दिन में
अभोजन, इस अर्थ का ज्ञापन तो वह अवश्य ही करता है, फिर उसमें किस
प्रकार की अनुपपत्ति है ? (प्र.) भोजन से उत्पन्न होनेवाला पीनत्वरूप कार्य ही
दिन को भोजन न करने से अनुपपन्न होता है; क्योंकि पीनत्व का कारण वही
नहीं है । पीनत्व रूप अर्थ की इस अनुपपत्ति से ही 'पीनः' इत्यादि वाक्य अनुपपन्न
होता है; क्योंकि (योग्यता न रहने के कारण) उसका अन्वय नहीं हो पाता है ।
(उ.) तो फिर यह कहिए कि अर्थ की अनुपपत्ति ही वाक्य की अनुपपत्ति है और
अर्थ की उपपत्ति ही उसकी उपपत्ति है, वाक्य स्वतन्त्र रूप से उपपन्न या अनुपपन्न
नहीं होता । दिन को भोजन न करनेवाले (देवदत्त) में रहनेवाली पीनता भी
भोजन से ही उत्पन्न हो सकती है, अतः प्रकृत में रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही
उसकी उपपत्ति होती है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस रात्रिभोजन वाक्य से नहीं । चूँकि
पीनत्व रूप अर्थ की अनुपपत्ति से ही रात्रि-भोजन रूप अर्थ और उसका बोधक
'रात्रौ भुङ्क्ते' यह वाक्य दोनों की ही उपपत्ति होती है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य
से इसकी उपपत्ति नहीं होती है, अतः इनके लिए 'रात्रिभोजन' रूप अर्थ की
कल्पना ही आवश्यक है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की कल्पना आवश्यक नहीं है ।
उपपन्न होनेवाला 'अर्थ' (अपने व्याप्त) दूसरे अर्थ से ही उपपन्न होता है; (इस
नियम के अनुसार) चूँकि दिन में भोजन न करनेवाले देवदत्त की पीनता की
व्याप्ति रात्रि-भोजन रूप कार्य के साथ है, अतः दिन को न खानेवाले की पीनता
रूप अर्थ की उपपत्ति रात्रि भोजन रूप अर्थ से ही होती है, तस्मात् कोई भी
अर्थापत्ति 'शब्द' विषयक नहीं है (अर्थात् श्रुतार्थापत्ति नाम की कोई वस्तु नहीं है) ।