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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७
न्यायकन्दली
(२) निखिलवासनोच्छेदे विगतविषयाकारोपप्लवविशुद्धज्ञानोदयो महोदय इत्यपरे ।
तदयुक्तम्, कारणाभावे तदनुपपत्तेः । भावनाप्रचयो हि तस्य कारणमिष्यते, स च स्थिरैकाश्रया-
भावादिष्टेषानाधायकः प्रतिक्षणमपूर्ववदुपजायमानो निरन्वयविनाशी लङ्घनाभ्यासवदना-
सादितप्रकर्षो न स्फुटाभज्ञानजननाय प्रभवतीत्यनुपपत्तिरेव तस्य । समलचित्तक्षणानां
स्वाभाविक्याः सदृशारम्भणशक्तेरसद्दृशारम्भं प्रत्यशक्तेश्चाकस्मादनुच्छेदात्, किञ्च पूर्वे
सब से प्रिय है, उसका विनाश वस्तुतः आत्मा का विनाश ही है, तो अपने सब से
अधिक प्रिय वस्तु का नाश करने के लिये कौन बुद्धिमान् प्रवृत्त होगा ? और यह
बात भी है कि महोदय¹ का पर्य्याय 'मुक्ति' शब्द और 'बन्धविच्छेद' शब्द दोनों
एक ही अर्थ के बोधक हैं ।
(२) कोई कहते² हैं कि सभी वासनाओं के नष्ट हो जाने पर विषयरूप
आकार के मालिन्य से रहित ज्ञान की उत्पत्ति ही 'महोदय' है । किन्तु यह पक्ष भी
कारण की अनुपपत्ति से अयुक्त है, क्योंकि इस पक्ष के मानने वाले भावना के
'प्रचय' अर्थात् बार-बार होने को इसका कारण मानते हैं । (किन्तु इस मत में) सभी
वस्तु क्षणिक हैं । वस्तुओं का निरन्वय विनाश उत्पत्ति के द्वितीय क्षण में ही कूदने के
अभ्यास की तरह हो जाता है, और दूसरे क्षण में बिलकुल अपूर्व अन्य व्यक्ति की
उत्पत्ति होती है । जब पहले विज्ञान से आगे के विज्ञान में कोई उपकार नहीं पहुँच
सकता है तो 'स्फुटाभ' ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं होगी । इस प्रकार इस पक्ष में
निर्वाण ही अनुपपन्न हो जाएगा । और भी बात है-'मल' अर्थात् बन्ध सहित चित्त
(ज्ञान)-क्षण अपने उत्तर क्षण में अपने सदृश ही चित्त की उत्पत्ति का कारण हो
सकता है, क्योंकि सदृशारम्भकत्व ही उसका स्वभाव है । घटविज्ञान दूसरे घट-
विज्ञान को ही उत्पन्न कर सकता है, पटविज्ञान को नहीं, नीलघटविज्ञान को भी
नहीं । तब घटादि विषयरूप मलसहित विज्ञान अपने से विसदृश शुद्ध (निर्मल)
विज्ञानरूप मुक्ति का कारण कैसे हो सकता है ? विज्ञान का सदृशारम्भकत्व तो नष्ट
नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि प्रत्येक क्षण अपने स्वभावसिद्ध निर्वाण से
१. अभिप्राय यह है कि जैसे कोई अपराधी राजा की आज्ञा से बँध जाता है और उसके उस
बन्धन के खुल जाने पर 'वह मुक्त हो गया' यह व्यवहार होता है । इस व्यवहार के लिए
उस आदमी के मरने की आवश्यकता नहीं होती । वह आदमी रहता ही है, उसका बन्धन
भर खुल जाता है । वैसे ही 'यह जीव मुक्त हो गया' इस वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि
वह स्वयं ही नष्ट हो गया । उससे इतनी ही प्रतीति होती है कि उसके मिथ्याज्ञानादि
बन्धन खुल गये हैं । इसलिए 'महोदय' शब्द का अर्थ आत्मा से अभिन्न ज्ञान का उच्छेद
कदापि नहीं हो सकता ।
२. अभिप्राय यह है कि इस मत में वास्तविक सत्ता ज्ञान की ही है । अन्य घटादि
विषय 'संवृति' या अज्ञान से कल्पित हैं (वेदान्ती लोग जिनकी व्यावहारिक सत्ता
मानते हैं) । वास्तविक सत्ताविशिष्ट ज्ञान निर्विकल्पक है । उसमें घटादि विषयों का

८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-
न्यायकन्दली
क्षणाः स्वरसनिर्वाणाः, अयमपूर्वो जातः, सन्तानश्चैको न विद्यते, बन्धमोक्षौ चैकाधि-
करणौ विषयभेदेन वर्तेते, य एव च प्रवर्त्तते प्राप्य च निवृत्तो भवति ।
(३) प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनादुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष
इत्यन्ये । तन्न, प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदसीन्ययोगात् । पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः
प्रवृत्तिः, विवेकख्यातिश्च पुरुषार्थः । तस्यां संजातायां सा निवर्त्तते कृतकार्य्यत्वादिति
चेन्न, अस्या अचेतनाया विमृश्यकारित्वाभावात् । यथेयं कृतेऽपि शब्दाद्युपलम्भे पुनस्तदर्थं
प्रवर्त्तते, तथा विवेकख्यातौ कृतायामपि पुनस्तदर्थं प्रवर्त्तिष्यते स्वभावस्यानपायित्वात् ।
(४) नित्यनिरतिशयसुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरित्यपरे। तदप्यसारम्, अग्रे निराकरिष्य-
माणत्वात् । तस्मादहितनिवृत्तिरात्यन्तिकी महोदय इति युक्तम् ।
युक्त है (क्षण शब्द से क्षणिक-विज्ञान विवक्षित है), यह विशुद्ध विज्ञान बिलकुल
अपूर्व ही है । संतान नाम की कोई विलक्षण वस्तु नहीं है । यह नियम है कि जो
बद्ध रहता है वही मुक्त होता है । एवं यह भी स्वाभाविक है कि जो प्रवृत्त होता
है वही प्राप्त करके निवृत्त होता है ।
(३) कोई कहते हैं कि जब प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान से प्रकृति अपने
सृष्ट्यादि कार्यों से निवृत्त हो जाती है, उस समय पुरुष की अपने स्वरूप में
अवस्थिति ही 'मुक्ति' है । किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
प्रवृत्तिस्वभाववाली प्रकृति कभी उससे उदासीन नहीं हो सकती । (प्र.) पुरुष के
प्रयोजन-सम्पादन के लिए ही प्रकृति प्रवृत्त होती है, एवं प्रकृति और पुरुष का
भेदज्ञान ही पुरुष का परम प्रयोजन है । उसके सम्पादित हो जाने पर वह
कृतकार्य्य हो जाती है और फिर कार्य्य में प्रवृत्त नहीं होती । (उ.) किन्तु उक्त
कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृति जड़ है । उसमें विचार कर काम करने की
शक्ति नहीं है, (अतः) वह जिस प्रकार शब्दविज्ञान के उत्पन्न होने पर भी फिर
उसके लिए प्रवृत्त होती है, उसी प्रकार 'विवेकख्याति' अर्थात् प्रकृति-पुरुष के
विवेक-ज्ञान के उत्पन्न होने पर भी फिर उसके लिए प्रवृत्त होगी । (तस्मात् इस
पक्ष में अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग होगा) ।
(४) यह भी कोई कहते हैं कि नित्य एवं निरतिशय ( सर्वोत्कृष्ट) सुख
की अभिव्यक्ति ही 'मुक्ति' है । इस मत के ठीक न होने की युक्ति आगे लिखी
जाएगी । तस्मात् दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही 'मुक्ति' है ।
सम्बन्ध ही सुख और दुःखजनक होने के कारण 'बन्ध' है अतः उक्त विशुद्धज्ञान में
घटादि विषयों के सम्बन्ध का उच्छेद ही मुक्ति है । यह ध्यान में रखना चाहिए कि
आत्माभिन्न ज्ञानोच्छेद, ही मुक्ति है, इस कथित पक्ष में नौ दोष दिखलाये गए हैं, ये दोष
इस पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इस पक्ष में मुक्तावस्था में ज्ञानरूप आत्मा का नाश नहीं
होता, किन्तु उसमें घटादि विषयों के सम्बन्ध का ही नाश होता है ।