वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१७
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१७
न्यायकन्दली
सम्बन्ध इति चेत् ? शब्दस्यैकस्य देशभेदेन नानार्थेषु प्रयोगात् । यत्रायमार्यैः प्रयुज्यते
तत्रास्य वाचकत्वम्, इतरत्र सङ्केतानुरोधात् प्रवृत्तस्य लिङ्गत्वमिति चेत् ? न, तुल्य एव
तायच्चौरशब्दस्तस्करे भक्ते च प्रतीतिकरः, तत्रास्य तस्करे वाचकत्वं भक्ते च लिङ्गत्व-
मिति नास्ति विशेषहेतुः । आर्याणामपि चौरशब्दादर्थप्रतीतिः लिङ्गपूर्विका, चौरशब्दजनित-
प्रतिपत्तित्वात्, उभयाभिमतदाक्षिणात्यप्रयुज्यमानचौरशब्दजनितप्रतिपत्तिवत् । न च
स्वाभाविकसम्बन्धसद्भावे प्रमाणमस्ति । शब्दस्य वाच्यनिष्ठा स्वाभाविकी वाचकशक्ति-
रेवोभयत्र दत्तपदत्वात् सम्बन्ध इत्युच्यते भवद्भिः । तथा चोक्तम्-"शक्तिरेव हि
सम्बन्धः" इति । शब्दशक्तेश्च स्वाभाव्यादेव वाच्यनिष्ठत्वे व्युत्पन्नवदव्युत्पन्नोऽपि शब्दार्थं
(प्र.) यदि अर्थ के साथ असम्बद्ध शब्द को ही अर्थ का बोधक मानें तो फिर (घट
पद से पट बोध की आपत्ति रूप) अतिप्रसङ्ग होगा, अतः शब्द का अर्थ के साथ
स्वाभाविक (शक्ति रूप) सम्बन्ध की कल्पना करते हैं । (उ.) यह सम्भव नहीं है;
क्योंकि एक ही शब्द का विभिन्न अर्थों के बोध के लिए प्रयोग होता है । (प्र.)
जिस अर्थ में आर्यलोग जिस शब्द का प्रयोग करते हैं, उस अर्थ का तो वह शब्द
वाचक है (अर्थात् उस अर्थ में उस शब्द का स्वाभाविक सम्बन्ध है) । उससे भिन्न
जिन अर्थों में केवल सङ्केत से ही शब्द प्रवृत्त होता है, वहाँ वह (धूम की तरह )
ज्ञापक लिङ्ग है । (उ.) यह भी कहना सम्भव नहीं है; क्योंकि एक ही 'चौर' शब्द
चोर और भात दोनों का समान रूप से बोधक है । इन दोनों अर्थों में से चौर
रूप अर्थ का तो चौर शब्द को वाचक मानें और भात रूप अर्थ का उसे बोधक
लिङ्ग मानें, इसमें विशेष युक्ति नहीं है । (इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि)
जिस प्रकार दोनों पक्ष यह मानते हैं कि दाक्षिणात्यों के द्वारा प्रयुक्त 'चौर'
शब्द से भात रूप अर्थ की प्रतीति उक्त शब्द रूप लिङ्ग से उत्पन्न (होने का
कारण अनुमिति रूप होती) है, उसी प्रकार आर्यों के द्वारा प्रयुक्त चौर शब्द
से तस्कर की प्रतीति भी चौर शब्द रूप लिङ्ग से ही होती है; क्योंकि यह
प्रतीति भी चौर शब्द से उत्पन्न होती है । इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है कि
शब्द और अर्थ दोनों में कोई स्वाभाविक सम्बन्ध है; क्योंकि केवल शब्द में ही
रहनेवाला जो वाच्य (अर्थ) का वाचकत्व सम्बन्ध है, उसी सम्बन्ध को अर्थ और
शब्द दोनों में कल्पना कर लेते हैं और केवल शब्द में रहनेवाले उस सम्बन्ध को
ही आप (मीमांसक) लोग दोनों का 'सम्बन्ध' कहते हैं । जैसा कहा गया है कि
'शक्ति ही सम्बन्ध है' । शब्द के शक्ति रूप सम्बन्ध को यदि स्वाभाविक रूप
से ही वाच्य अर्थ में भी मान लें तो फिर जिस प्रकार व्युत्पन्न (अर्थ में शब्द-
५१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
प्रतीयात् शब्दस्यार्थस्य तयोः सम्बन्धस्य च सम्भवात् । ज्ञातः सम्बन्धोऽर्थप्रत्ययहेतुर्न
सत्तामात्रेणेति चेत् ? यथाहः –
ज्ञापकत्वाद्वि सम्बन्धः स्वात्मज्ञानमपेक्षते ।
तेनासौ विद्यमानोऽपि नागृहीतः प्रकाशकः ॥ इति ।
कीदृशं तस्य सम्बन्धस्य ज्ञानम् ? अस्य शब्दस्यायमर्थो वाच्य इत्येवंभूतमिति चेत् ?
तत् कस्माद् भवति ? वृद्धव्यवहारादिति चेत् ? एतदेवाभिधानाभिधेयालम्बनज्ञानं परस्परं
व्यवहरद्भिर्वृद्धैः पार्श्वस्थस्य बालकस्य क्रियमाणं सङ्केतो व्युत्पत्तिरिति चाभिधीयमानं
संस्कारद्वारेणार्थप्रतीतिकारणमस्तु, किं सम्बन्धान्तरेण ? शब्दस्य हि निजं सामर्थ्यं शब्द-
त्वम्, आगन्तुकं च सामर्थ्यं सङ्केतो विशिष्टा चानुपूर्वी । तस्मादेव सामर्थ्याद्वितयात् तदर्थ-
प्रत्ययोपपत्तिः, सम्बन्धान्तरकल्पनावैयर्थ्यम्, दृष्टात् कार्योपपत्तावदृष्टकल्पानानवकाशात् ।
सङ्केत को जाननेवाले) पुरुष को शब्द से अर्थ का बोध होता है, उसी प्रकार
अव्युत्पन्न (उक्त सङ्केत को न जाननेवाले) पुरुष को भी शब्द से अर्थ के बोध की
आपत्ति होगी; क्योंकि वहाँ भी शब्द और अर्थ इन दोनों का शक्ति रूप सम्बन्ध
है ही । (प्र.) उक्त सम्बन्ध ज्ञात होकर ही अर्थबोध के प्रति कारण है, केवल
सत्ता मात्र से नहीं (अतः अव्युत्पन्न पुरुष को अर्थबोध नहीं होता है) । जैसा कि
आचार्यों ने कहा है कि चूँकि शब्द का शक्ति रूप सम्बन्ध ज्ञापक हेतु है (उत्पादक
नहीं), अतः वह अपने अर्थज्ञान रूप कार्य के उत्पादन में अपने ज्ञान की अपेक्षा
रखता है, यही कारण है कि शब्द में विद्यमान रहने पर भी जब तक वह ज्ञात
नहीं हो जाता है, तब तक अर्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता । (उ.) शक्ति रूप
सम्बन्ध का कैसा ज्ञान अर्थबोध के लिए अपेक्षित है ? यदि यह कहें कि 'इस
शब्द का यह अर्थ वाच्य है' इस प्रकार का ज्ञान अपेक्षित है, तो फिर यह पूछना
है कि 'यह ज्ञान किससे उत्पन्न होता है' ? यदि इसका यह उत्तर दें कि 'यह ज्ञान
वृद्धों के व्यवहार से उत्पन्न होता है' तो फिर 'अभिधानाभिधेय' के इस ज्ञान को
ही अपने संस्कार के द्वारा कारण क्यों नहीं मान लेते ? जो शब्दों का व्यवहार
करते हुए वृद्धजनों से बालकों में उत्पन्न होता है और जिसे 'सङ्केत' एवं 'व्युत्पत्ति'
भी कहते हैं । इसके लिए शब्द का अर्थ में विलक्षण सम्बन्ध मानने का क्या
प्रयोजन है ? कहने का अभिप्राय है कि शब्द की अपनी स्वाभाविक शक्ति शब्दत्व
रूप ही है, एवं पुरुषों के द्वारा उसमें दो शक्तियाँ उत्पन्न की जाती हैं, जिनमें
पहली है सङ्केत और दूसरी है विशेष प्रकार की आनुपूर्वी (वर्णों का विन्यास) ।
इन्हीं दोनों सामर्थ्यों से शब्द के द्वारा अर्थ की उत्पत्ति हो जाएगी । अतः शब्द की
अर्थ में स्वतन्त्र सम्बन्ध की कल्पना व्यर्थ है; क्योंकि दृष्ट कारणों से ही कार्य की
उत्पत्ति संभावित होने पर अतीन्द्रिय कारणों की कल्पना उचित नहीं है ।