वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४६५
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४६५
प्रशस्तपादभाष्यम्
युक्तानां योगधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मान्तराकाशादिकालपरमाणुवायुमनस्सु
तत्समवेतगुणकर्मसामान्यविशेषेषु समवाये चावितथं स्वरूपदर्शनमुत्पद्यते ।
वियुक्तानां पुनश्चतुष्टयसन्निकर्षाद् योगधर्मानुग्रहसामर्थ्यात् सूक्ष्मव्यवहित
विप्रकृष्टेषु प्रत्यक्षमुत्पद्यते ।
१. युक्त और २. वियुक्त भेद से योगी दो प्रकार के हैं, उनमें (हम
लोग जैसे साधारण जनों से विलक्षण) 'युक्तयोगियों' को योगाभ्यास के
द्वारा विशेष बलशाली मन से अपनी आत्मा, आकाश, दिक्, काल,
परमाणु, वायु और मन एवं इन सबों में रहनेवाले गुण, कर्म, सामान्य,
विशेष एवं समवाय प्रभृति पदार्थों के भी यथार्थस्वरूप का प्रत्यक्ष होता
है । किन्तु (वियुक्त योगियों को) आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन
(चारों के) तीन संयोग से ही योगजनित धर्मरूप विशेष बल के कारण
सूक्ष्म (परमाण्वादि), व्यवहित (दीवाल प्रभृति से घिरे हुए वस्तु) और
बहुत दूर की वस्तुओं का भी प्रत्यक्ष होता है ।
न्यायकन्दली
क्वचिदात्मप्रदेशे वशीकृतस्य मनसस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टेनात्मना संयोगः । असम्प्रज्ञातश्च
वशीकृतस्य मनसो निरभिसन्धिर्निरभ्युत्थानात् क्वचिदात्मप्रदेशे संयोगः । तत्रायमुत्तरो
मुमुक्षूणामविद्यासंस्कारविलयार्थमन्त्ये जन्मनि परिपच्यते, न धर्ममुपचिनोति, अभि-
सन्धिसहकारिविरहात् । नापि बाह्यं विषयमभिमुखीकरोति, आत्मन्येव परिणामात् ।
पूर्वस्तु योगोऽभिसन्धिसहायः प्रतनोति धर्मम् । यदर्थं तत्त्वबुभुत्साविशिष्टश्च तदर्थ-
मुद्द्योतयति, इति तेन योगेन योगिनः च्युतयोगा अपि योग्यतया योगिन उच्यन्ते । न च
तेषामप्रक्षीणमलावरणानां तदानीमतीन्द्रियार्थदर्शनमस्त्यत आह-युक्तानामिति ।
युक्तानां समाध्यवस्थितानां योगधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मनि,
किसी द्रव्य के साथ संयोग ही 'असम्प्रज्ञात' योग है । इन दोनों योगों में
अन्तिम योग अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि का परिपाक मुमुक्षुओं को अन्तिम
जन्म में होता है, जिससे संस्कार-सहित अविद्या का विनाश हो जाता है ।
असम्प्रज्ञात समाधि से धर्म की उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि धर्म का
सहकारिकारण अभिलाषा या एषणा उस समय नहीं रहती है । उस समय किसी
बाह्य विषय का भान भी नहीं होता है, क्योंकि उस समय अन्तःकरण केवल
अपने स्वरूप से ही परिणत होता है । पहिला योग अर्थात् सम्प्रज्ञातयोग विषयों
की अभिलाषा की सहायता से धर्म को उत्पन्न करता है, जिससे तत्त्वज्ञान की इच्छा
से युक्त योगी को सभी विषय प्रतिभात होते हैं। अतः सम्प्रज्ञात समाधि से युक्त
४६६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
स्वात्मान्तरेषु स्वात्मन आत्मान्तरेषु परकीयेषु, आकाशे दिशि काले वायौ परमाणुमनस्सु
तत्समवेतेषु गुणादिषु समवाये चावितथमविपर्यस्तं स्वरूपदर्शनं भवति । अस्मदादिभिरात्मा
सर्वदैवाहं ममेति कर्तृत्वस्वामित्वरूपसंभिन्नः प्रतीयते, उभयं चैतच्छरीराद्युपाधिकृतं रूपं न
स्वाभाविकमत एव अहं ममेति, प्रत्ययो मिथ्यादृष्टिरिति गीयते, सर्वप्रवादेषु,
विपरीतरूपग्राहकत्वात् । स्वाभाविकं तु यदस्य स्वरूपं तद्योगिभिरालोक्यते, यदा हि
योगी वेदान्तप्रवेदितमात्मस्वरूपमहं तत्त्वतोऽनुजानीयामित्यभिसन्धानाद् बहिरिन्द्रियेभ्यो
मनः प्रत्याहृत्य क्वचिदात्मदेशे नियम्यैकाग्रतयात्मानुचिन्तनमभ्यस्यति, तदास्य तत्त्वज्ञान-
संवर्तकधर्माधानक्रमेणाहङ्कारममकारविनिर्मुक्तमात्मतत्त्वं स्फुटीभवति । यदा तु परात्माकाश-
कालादिबुभुत्सया तदनुचिन्तनप्रवाहमभ्यस्यति, तदास्य परात्मादितत्त्वज्ञानानुगुणोऽचिन्त्य-
प्रभावो धर्म उपचीयते, तद्वलाच्चान्तःकरणं बहिः शरीरान्निर्गत्य परात्मादिभिः संयुज्यते ।
तेषु संयोगात्, संयुक्तसमवायात् तद्गुणादिषु, संयुक्तसमवेतसमवायात्
योगी (अपने लक्ष्य असम्प्रज्ञात से) च्युत होने पर भी 'योग' की अर्थात्
असम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता के कारण 'योगी' कहलाते हैं । सम्प्रज्ञात समाधि
के समय योगियों के (तत्त्व के) आवरक मल की सत्ता सर्वथा क्षीण नहीं रहती है,
अतः उन्हें अतीन्द्रिय अर्थों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । यही बात 'युक्तानाम्' इत्यादि
से कही गयी है । 'युक्तों' को अर्थात् 'सम्प्रज्ञात' समाधि से युक्त योगियों को इस
योग से उत्पन्न धर्म के अनुग्रह से युक्त मन के द्वारा अपनी आत्मा और अपनी
आत्मा से भिन्न आत्माओं का अर्थात् अपनी आत्मा से भिन्न दूसरों की आत्माओं
का, आकाश, काल, वायु, परमाणु और मन इन सबों का और इन सबों में
रहनेवाले गुणादि और समवाय का 'अवितथ' अर्थात् विपर्ययरहित (यथार्थ) ज्ञानं
होता है । अस्मदादि को आत्मा की प्रतीति कर्तृत्व एवं स्वामित्व रूप से ही बराबर
होती है । ये दोनों ही शरीररूप उपाधि मूलक होने के कारण आत्मा के
स्वाभाविक धर्म नहीं हैं । अतः तन्मूलक 'अहम्, मम' इत्यादि आकार की आत्मा
की सभी प्रतीतियाँ सभी मतों के अनुसार आत्मा के स्वरूप के विरुद्ध धर्म विषयक
होने के कारण 'मिथ्यादृष्टि' कही जाती हैं । आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप को केवल
योगिगण ही देख पाते हैं । जिस समय योगिगण उपनिषदों में कथित आत्मा के
स्वरूप को 'मैं यथार्थ रूप से जानूँ' इस संकल्प के द्वारा बाह्य विषयों से मन को
खींचकर आत्मा के किसी भी प्रदेश में लगाकर आत्मचिन्तन का अभ्यास करते हैं,
उस समय तत्त्वज्ञान के सम्पादक धर्म के उत्पादन के क्रम से अहङ्कार और ममकार
से विनिर्मुक्त आत्मा का तत्त्व प्रकाशित होता है । जिस समय दूसरे की आत्मा एवं
कालादि वस्तुओं को जानने की इच्छा से उनके चिन्तन के प्रयास का अभ्यास योगिगण
करते हैं, उस समय योगियों में वह उत्कृष्ट धर्म बढ़ने लगता है, जिसका प्रभाव हम