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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५
न्यायकन्दली
शब्दस्य तु कथम् ? न ह्यसावर्थात्मा, अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे मुखस्य पूरणदाह-
पाटनप्रसङ्गात् । नाप्यर्थजः, कौष्ठ्यवायुकण्ठाद्यभिघातजन्यत्वात्, अतदात्मनोऽतदुत्पन्नस्य
प्रतिपादकत्वं चातिप्रसङ्गात् । तद्युक्तम्, यदि कण्ठाद्यभिघातमात्रज एव शब्दो न
वक्तुर्विवक्षामपि प्रतिपादयेत् तदुत्पत्त्यभावात् । तथा च वक्तुर्विवक्षामपि न सूचयेयुः शब्दा
इति प्रमत्तगीतं स्यात् । पारम्पर्येण विवक्षापूर्वकत्वाच्छब्दस्य विवक्षाप्रतिपादकत्वमिति
चेत्? एवमर्थानुभवप्रतिपादकत्वमपि, विवक्षाया अर्थानुभवपूर्वकत्वात् । असत्यप्यर्थानुभवे
विप्रलम्भकस्य तदर्थविवक्षाप्रतीतिरिति चेत् ? असत्यामपि तदर्थविवक्षायां भ्रान्तस्य
तदर्थविषयं वाक्यमुपलब्धम् । यदाहुराचार्याः -
'भ्रान्तस्यान्यविवक्षायामन्यद् वाक्यं हि दृश्यते' । इति ।
नान्यविवक्षातोऽन्याभिधानसम्भवः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यद् यस्य कारणमव-
गतं तस्य तद्व्यभिचारे विश्वस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात्, अतो भ्रान्तस्याप्रतीयमानाऽपि
(प्र.) किन्तु 'शब्द' अपने बोध्य अर्थ का साधक किस तरह से है ? शब्द
स्वयं अर्थ स्वरूप नहीं है, अगर ऐसी बात हो तो अन्न शब्द के उच्चारण से ही
पेट भर जाय, 'अग्नि' शब्द के उच्चारण से मुँह जल जाय एवं असि (तलवार)
शब्द के उच्चारण से मुँह कट जाय । अर्थ से शब्द की उत्पत्ति भी नहीं होती है;
क्योंकि कोष्ठसम्बन्धी वायु के कण्ठादि देशों के साथ अभिघात से शब्द की उत्पत्ति
होती है । शब्द से भिन्न होने पर भी एवं शब्द का कारण न होने पर भी अगर
शब्द से अर्थ का प्रतिपादन माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा । (उ.) किन्तु यह ठीक
नहीं है; क्योंकि अगर शब्द की उत्पत्ति कण्ठादि के अभिघात से ही हो (विवक्षा
वक्ता के अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से नहीं), तो फिर शब्द विवक्षा का भी ज्ञापक
नहीं होगा; क्योंकि विवक्षा से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अगर विवक्षा की
सूचना भी शब्दों से नहीं होगी तो फिर शब्दों का प्रयोग केवल पागल का प्रलाप
ही होगा । (प्र.) (विवक्षा साक्षात् शब्द की उत्पादक न होने पर भी) परम्परा से
शब्द की उत्पादक है, अतः शब्द विवक्षा का ज्ञापक है । (उ.) इस प्रकार तो
शब्द अर्थानुभव का भी सूचक है ही; क्योंकि विवक्षा अर्थानुभव से ही उत्पन्न होती
है । (प्र.) अर्थ का अनुभव न रहने पर भी वञ्चक पुरुष में अर्थ की विवक्षा
देखी जाती है । (उ.) विवक्षा के न रहने पर भी भ्रान्त व्यक्ति के द्वारा उस अर्थ
के बोधक शब्द का प्रयोग भी तो देखा जाता है ।
जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि 'भ्रान्त पुरुष कहना कुछ चाहता है,
किन्तु कहता कुछ और ही है' । (प्र.) एक की विवक्षा से दूसरा पुरुष
शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से जिसमें
कारणता निश्चित है, उसके रहते हुए भी अगर कार्य की उत्पत्ति
कभी न भी हो तो फिर संसार की सभी रचनाएँ अनियमित हो जाएँगी ।

३१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
न्यायकन्दली
तदर्थविवक्षा सहसोपजाता गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानवदस्पष्टरूपा कार्येण कल्पनीयेति चेत् ?
विप्रलम्भकस्यापि विवक्षाविशेषेण तदर्थानुभवः कल्प्यताम्, असंविदितेऽर्थे तद्विषयस्य
विवक्षाविशेषस्यायोगात् । तदानीं विप्रलम्भकस्य तदर्थानुभवो नास्तीति चेत् ? मा स्म
भूत्, स्मरणं तावद्विद्यते, विप्रलम्भको हि पूर्वानुभूतमेवार्थमन्यथाभूतमन्यथा च कथयति ।
तत्रास्य तदर्थविवक्षा स्मरणकारणिका भवन्ती पारम्पर्येण तदनुभवकारणिकेति नास्ति
व्यभिचारः, मिथ्यानुभवपूर्विकाया अपि विवक्षायाः पारम्पर्येण सत्यानुभवपूर्वकत्वात् ।
अनुभवश्वार्थाव्यभिचारीति शब्दार्थसिद्धिः । अन्यथा वाक्यश्रुतौ श्रोतुरर्थप्रतीत्यभावाद्
विवक्षामात्रप्रतीतेश्चापुरुषार्थत्वाच्छब्दो व्यवहार उच्छियेत, वादिप्रतिवादिनोर्जयपराजय-
व्यवस्थानुपपत्तिः, विवक्षामात्रं प्रत्युभयोरपि भूतार्थवादित्वात् ।
यच्चोक्तं द्रव्याद्व्यतिरिक्तं परिमाणम्, द्रव्याग्रहे तद्बुद्ध्यभावादिति, तदसिद्धम् । दूराद्
द्रव्यग्रहणेऽपि तत्परिमाणविशेषास्याग्रहणात् । अत एव महानयंपुरियं भ्रान्त्या दृश्यते ।
अतः (भ्रान्त पुरुष के शब्दप्रयोगरूप) कार्य से ही यह अनुमान करते हैं कि
(शब्दप्रयोग से पहले) भ्रान्त पुरुष को भी अज्ञात अर्थविषयक अस्फुट विवक्षा
सहसा उत्पन्न होती है । जैसे कि राह चलते आदमी को तृण के स्पर्श का हठात्
अस्पष्ट प्रतिभास होता है । (उ.) तो फिर उस प्रतारक के विशेष प्रकार की
विवक्षा से उसके उस अर्थविषयक अनुभव की कल्पना कीजिए; क्योंकि अज्ञात
अर्थ की विवक्षा कभी भी नहीं उत्पन्न होती । (प्र.) उस समय ठगनेवाले पुरुष को
उस विषय का अनुभव तो नहीं है । (उ.) अनुभव न रहे, स्मरण तो रह सकता
है । पहले समझी हुई वस्तु को ही प्रतारक दूसरों से कहता है । इस प्रकार
प्रकृत में भी चूँकि अर्थविषयक विवक्षा स्मरण का कारण है, अतः परम्परा से वह
अनुभव का भी कारण होती है । सुतराम् (शब्द और विवक्षा के कार्यकारणभाव
में) व्यभिचार नहीं है । अतः मिथ्या अनुभव से उत्पन्न होनेवाली विवक्षा का
सत्यानुभव भी परम्परा से कारण है । तस्मात् विवक्षा एवं यथार्थानुभव इन दोनों
के कार्यकारणभाव में भी व्यभिचार नहीं है । अगर ऐसी बात न होती तो
वाक्य के सुनने से सुननेवाले को अर्थ की प्रतीति न होकर विवक्षा की ही
प्रतीति होती; किन्तु यह वाक्य का प्रयोग करनेवाले को अभीष्ट नहीं है, अतः
शब्द से होनेवाले व्यवहार का ही उच्छेद हो जाएगा । वादी एवं प्रतिवादी में
हार-जीत की व्यवस्था भी उठ जाएगी; क्योंकि विवक्षा के प्रसङ्ग में तो दोनों
बराबर ही कहते हैं ।
यह जो आपने कहा कि (प्र.) द्रव्य और उसके परिमाण दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि
द्रव्यज्ञान के बिना उसके परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, (उ.) सो ठीक नहीं है;