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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाऽनुवादसहितम् ३३७

प्रकरणम्] भाषाऽनुवादसहितम् ३३७
न्यायकन्दली
संयोगस्तृणकर्मणो हेतुरित्यादिकमूह्यम् । यथायं द्रव्यमारभते, यथा च गुणकर्मणी, तं
प्रकारं दर्शयति--द्रव्यारम्भ इत्यादिना । द्रव्यस्यारम्भे कर्त्तव्ये संयोगः स्वाश्रयं
स्वनिमित्तं च कारणमन्तरेण नान्यदपेक्षते । न त्वयमनपेक्षार्थः पश्चाद्भावि निमित्तान्तरं
नापेक्षत इति, श्यामादिविनाशनान्तरभाविनोऽन्यस्य परमाण्वग्निसंयोगस्य पाकजानां
गुणानामपि आरम्भे निरपेक्षकारणत्वप्रसङ्गात् । कथमेतदवगतं त्वया यदयं द्रव्यारम्भे
निरपेक्षः संयोग इति ? तत्राह-तथा भवतीति । 'सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्च' इति
वचनात्, पटार्थमुपक्रियमाणेष्वस्तन्तुभ्यो 'भविष्यति पटः' इति प्रत्ययो जायत इति
पूर्वं प्रतिपाद्य सूत्रकारेणैतदुक्तम्-तथा भवतीति सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति । अस्यायमर्थो
यथोपक्रियमाणेष्व्यो भविष्यति पट इति प्रत्ययस्तथा सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति
युक्त वायु का संयोग तिनके की क्रिया का कारण है 'द्रव्यारम्भे' इत्यादि से
यह प्रतिपादन करते हैं कि संयोग किस रीति से द्रव्य का उत्पादन करता है
एवं किस प्रकार वह गुण एवं क्रिया का उत्पादन करता है । 'द्रव्यारम्भे
निरपेक्षस्तथा भवति' इस वाक्य में प्रयुक्त 'अनपेक्ष' शब्द का यही अर्थ है कि
संयोग को द्रव्य के उत्पन्न करने में द्रव्य के समवायिकारणों और निमित्तकारणों
को छोड़कर और किसी की अपेक्षा नहीं होती है । उक्त 'अनपेक्ष' शब्द का यह
अर्थ नहीं है कि पीछे उत्पन्न होनेवाले भी किसी गुण की अपेक्षा उसे नहीं होती है,
अगर ऐसा मानें तो श्यामादि गुणों के नष्ट होने के बाद उत्पन्न होनेवाले
अग्निसंयोग को भी पाकज रूपादि के प्रति निरपेक्ष कारण मानना पड़ेगा । (प्र.)
यह तुमने कैसे समझा कि द्रव्य के उत्पादन में संयोग को और किसी की
अपेक्षा नहीं होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'तथा भवति' और 'सापेक्षेभ्यो
निरपेक्षेभ्यश्च' इत्यादि दो सूत्रों के उल्लेख से करते हैं । अभिप्राय यह है
कि सूत्रकार ने पहले यह प्रतिपादन किया है कि 'पट के लिए व्यापृत तन्तुओं से
पट की उत्पत्ति होगी' इस प्रकार की प्रतीति होती है । इसके बाद सूत्रकार के
द्वारा 'तथा भवति' एवं 'सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्च' ये दो सूत्र कहे गये हैं ।
इन दोनों सौत्र वाक्यों का यह अर्थ है कि जिस प्रकार पट के लिए व्यापृत तन्तुओं
में यह प्रतीति होती है कि सापेक्ष और निरपेक्ष दोनों प्रकार के पट की इनसे

  1. समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाले कार्यों का असमवायिकारण भी अवश्य होता है ।
    अतः कार्यरूप द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों के असमवायिकारण भी अवश्य हैं ;
    किन्तु इसमें द्रव्य के असमवायिकारण में यह विशेष है कि उसके उत्पन्न हो जाने पर कार्य
    के उत्पादन में और किसी की अपेक्षा नहीं रहती है । असमवायिकारण का सम्बन्ध होने के
    अव्यवहित उत्तर क्षण में ही कार्य उत्पन्न हो जाता है । कपालों का संयोग होने पर या तन्तुओं
    में संयोग होने पर घट या पट रूप कार्य अव्यवहित उत्तर क्षण में उत्पन्न हो ही जाता है,

३३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
न्यायकन्दली
भवतीति वर्तमानप्रत्ययः, अन्यथा सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति भवतीति वर्तमानप्रत्ययो न
स्यात्, यदा कतिचित्तन्तवः संयुक्ता वर्तन्ते कतिचिच्चासंयुक्तास्तदा तेभ्यो भवति पट इति
प्रत्ययः स्यादित्यर्थः । अत्र सूत्रे वार्त्तमानिकप्रतीतिहेतुत्वेनाभिधीयमानेषु तन्तुषु
संयुक्तेष्वेनपेक्षशब्दप्रयोगात् संयोगो द्रव्यारम्भे निरपेक्ष इति प्रतीयत इति तात्पर्यम् ।
तुशब्देन पूर्वस्माद्विशेषं प्रतिपादयन्नाह--गुणकर्मारम्भे तु सापेक्षः । कुतो ज्ञातमित्यत
आह-संयुक्तसमवायादिति ।
अग्नेर्वैशेषिकमित्यग्निगतमुष्णत्वं विवक्षितम् । तत्यार्थिवपरमाणुसंयुक्ते वह्नौ
समवायात् परमाणौ रूपायुत्पत्तिकारणमित्यस्माद्वचनाद् गुणारम्भे परमाण्वग्नि-
संयोगस्योष्णस्पर्शासापेक्षत्वं प्रतीयते, अन्यथा वह्निसंयोगजेषु रूपादिषु वह्निस्पर्शस्य
कारणत्वाभिधानायोगात्, बुद्ध्यारम्भे आत्ममनःसंयोगस्य स्वाश्रय-
उत्पत्ति होगी, उसी प्रकार यह वर्त्तमानत्वविषयक प्रतीति भी होती है कि सापेक्ष
और निरपेक्ष दोनों प्रकार के तन्तुओं से पट उत्पन्न हो रहा है । संयोग अगर
निरपेक्ष होकर द्रव्य का उत्पादक न हो तो फिर उक्त वर्त्तमानत्वविषयक प्रतीति
नहीं हो सकेगी, प्रत्युत जिस समय पट के उत्पादक तन्तुओं में से कुछ परस्पर
संयुक्त हैं और कुछ असंयुक्त, उस समय भी वर्तमानत्व की प्रतीति होगी । कहने
का तात्पर्य है कि वर्त्तमानकालिक उक्त प्रतीति के कारण रूप से कथित परस्पर
संयुक्त उक्त तन्तुओं में 'अनपेक्ष' शब्द का प्रयोग किया गया है, अतः समझते हैं
कि संयोग को द्रव्य के उत्पादन में किसी और की अपेक्षा नहीं है । 'गुणकर्मारम्भे
तु सापेक्षः' यह वाक्य अपने 'तु' शब्द के द्वारा अपने पहले पक्ष से इस पक्ष में
अन्तर को समझाने के लिए लिखा गया है । यह आपने कैसे समझा? इस प्रश्न
का उत्तर देने के लिये 'संयुक्तसमवायात्' यह वाक्य लिखा गया है ।
'अग्नेर्वैशेषिकम्' इस वाक्य से अग्नि में रहनेवाला उष्ण स्पर्श अभीष्ट
है । वह उष्ण स्पर्श पार्थिव परमाणु से संयुक्त वह्नि में समवाय सम्बन्ध से रहने
के कारण परमाणु में होनेवाले (पाकज) रूप की उत्पत्ति का कारण है, इस
वाक्य से यह समझते हैं कि परमाणु और अग्नि के संयोग से जो पाकजरूप
की उत्पत्ति होती है, उसमें उसे उष्णस्पर्श की भी अपेक्षा रहती है । अगर ऐसी
बात न हो तो फिर वह्निसंयोग से उत्पन्न होनेवाले रूपादि के प्रति वह्नि
को कारण कहना ही असङ्गत हो जाएगा । एवं आत्मा और मन के
संयोग को बुद्धि के उत्पादन में अपने आश्रय और निमित्त को छोड़कर
अतः द्रव्य के उत्पादन में असमवायिकारणीभूत संयोग को किसी और की अपेक्षा नहीं रह
जाती है । गुणों के असमवायिकारण के प्रसङ्ग में यह बात नहीं है; क्योंकि कपाल में रूप
की उत्पत्ति के बाद कपालसंयोगादि क्रम से जब घट की उत्पत्ति हो जाती है, उसके बाद
घट में उस रूप की उत्पत्ति होती है, जिसमें कपाल का रूप असमवायिकारण है, अतः
गुण के उत्पादन में असमवायिकारण को उस गुण के आश्रयादि की भी अपेक्षा रहती है ।