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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७५
प्रशस्तपादभाष्यम्
पटः, इह वीरणेषु कटः, इह द्रव्ये गुणकर्मणी, इह द्रव्यगुणकर्मसु सत्ता, इह
द्रव्ये द्रव्यत्वम्, इह गुणे गुणत्वम्, इह कर्मणि कर्मत्वम्, इह नित्यद्रव्येष्वन्त्या
विशेषा इति प्रत्ययदर्शनादस्तेषां सम्बन्ध इति ज्ञायते ।
न चासौ संयोगः, सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वाद् अन्यतर
प्रकार 'इस मटके में दही है' यह प्रतीति (दधि और मटके में संयोग)
सम्बन्ध के रहते ही होती है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है, इन
वीरणों (तृणविशेषों) में चटाई है, इस द्रव्य में गुण और कर्म हैं, द्रव्य,
गुण और कर्मों में सत्ता है, द्रव्य में द्रव्यत्व है, गुण में गुणत्व है, कर्म में
कर्मत्व है, इन नित्यद्रव्यों में विशेष है' इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं,
अतः समझते हैं कि (प्रतीति के विषय इन आधार और आधेय में भी)
कोई सम्बन्ध अवश्य है ।
कथित प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती;
क्योंकि उन प्रतीतियों में विशेष्य और विशेषण रूप से
भासित होनेवाले प्रतियोगी और अनुयोगी अयुतसिद्ध हैं एवं
अन्यतर कर्म या उभयकर्म या विभाग उस सम्बन्ध के
न्यायकन्दली
तथैह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययानां दर्शनादस्त्येषां तन्तुपटादीनां सम्बन्ध इति ज्ञायते । इह
तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययाः सम्बन्धनिमित्तका अवधारितप्रत्ययत्वात्, इह कुण्डे
दधीतिप्रत्ययवत् ।
नन्वयं संयोगो भविष्यतीत्यत आह-न चासौ संयोग इति ।
असौ तन्तुपटादीनां सम्बन्धो न संयोगो भवति, कुतः? इत्यत्राह-सम्बन्धिनाम-
अवश्य है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार 'इस मटके में दही है'
यह निश्चयात्मक प्रतीति दही और कुण्ड में संयोग सम्बन्ध के रहने पर ही होती
है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है' इस प्रकार की निश्चयात्मक प्रतीति भी उन
दोनों में किसी सम्बन्ध के कारण ही उत्पन्न होती है (वही सम्बन्ध समवाय है) ।
(मटके और दही के संयोग की तरह) 'तन्तुओं में पट है' इत्यादि प्रतीतियों का
नियामक सम्बन्ध भी संयोग ही होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर "न चासौ संयोगः"
इत्यादि से दिया गया है । 'असौ' अर्थात् तन्तु और पट का सम्बन्ध, संयोग क्यों
नहीं है? इसी प्रश्न का उत्तर "सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वात्" इस वाक्य के द्वारा
दिया गया है । अर्थात् संयोगसम्बन्ध युतसिद्ध वस्तुओं में ही होता है और यह
(समवाय) सम्बन्ध अयुतसिद्धों में होता है; क्योंकि संयोग अपने प्रतियोगी और
अनुयोगी दोनों में से एक के कर्म से होगा, या उक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों

७७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मादिनिमित्तासम्भवात्, विभागान्तात्वाददर्शनात्, अधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव
भावादिति ।
स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरं भाववल्लक्षणभेदात् ।
यथा भावस्य द्रव्यादीनां स्वाधारेषु आत्मानुरूपप्रत्यय-
कारण नहीं हो सकते । एवं विभाग से इस सम्बन्ध का नाश भी नहीं
देखा जाता एवं यह (समवाय) अधिकरण एवं आधेय रूप दो वस्तुओं
में ही देखा जाता है (अतः उन प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं
हो सकती)।
यह (समवाय) द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से (सर्वथा भिन्न) स्वतन्त्र पदार्थ
ही है; क्योंकि जिस प्रकार सत्तारूप सामान्य या द्रव्यत्वादिरूप सामान्य
स्वसदृश (यह सद् है, यह द्रव्य है, यह गुण है इत्यादि) प्रतीतियों के
उत्पादक होने के कारण द्रव्यादि अपने आश्रयों से भिन्न हैं, उसी प्रकार
न्यायकन्दली
युतसिद्धत्वादिति । संयोगो हि युतसिद्धानामेव भवति । अयं त्वयुतसिद्धानामिति । तथा
संयोगोऽन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजो वा स्यादिति । इह तु अन्यतरकर्मादीनां निमित्ता-
नामभावो भावोत्पादककारणसामर्थ्याद्भवितव्यत् । संयोगस्य विभागान्तत्वं विभागविना-
श्यत्वं दृश्यते न समवायस्य । संयोगः स्वतन्त्रयोरपि भवति, यथोर्ध्वावस्थितयोरङ्गुल्योः ।
अयं त्वधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव भवति, तस्मान्नायं संयोगः किन्तु तस्मात् पृथगेव ।
एवं स्थिते समवाये तस्य द्रव्यादिभ्यो भेदं प्रतिपादयति—स च
द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरमिति । कुत इत्यत आह—भाववल्लक्षणभेदादिति ।
के कर्म से होगा, अथवा संयोग से ही होगा । तन्तु एवं पट के इस सम्बन्ध के
लिए कथित अन्यतर कर्म प्रभृति कारणों में से किसी की भी अपेक्षा नहीं होती
है । यह तो अपने आश्रयीभूत पदार्थों के उत्पादक कारणों की सत्ता से स्थिति का
लाभ करता है । संयोग का अन्त अर्थात् विनाश विभाग से देखा जाता है; किन्तु
समवाय का विनाश ही नहीं होता (अतः संयोग से समवाय गतार्थ नहीं हो
सकता) एवं संयोग स्वतन्त्र (आधाराधेयभावानापन्न) वस्तुओं में भी होता है, जैसे
कि ऊपर उठी हुई दो अङ्गुलियों में संयोग होता है । समवाय सम्बन्ध आधार और
आधेयभूत दो वस्तुओं में ही होता है । तस्मात् समवाय संयोग नहीं है, उससे
अलग ही वस्तु है ।
इस प्रकार संयोग से समवाय की स्वतन्त्र सत्ता के सिद्ध हो जाने पर
"स द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरम्" इस वाक्य के द्वारा समवाय में द्रव्यादि पदार्थों
के भेद का उपपादन करते हैं । समवाय द्रव्यादि पदार्थों से भिन्न क्यों है ? इस