वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५६
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५६
न्यायकन्दली
इति चेत् ? बाह्यत्वेनारोपितो विकल्पाकार एकाधीनस्वभावत्वाद् विकल्पे जायमाने
जायमान इव, विनश्यति विनश्यन्निव प्रतीयमानः प्रतिविकल्पं भिन्न एवावतिष्ठते । न च
भेदानुपातिनि सङ्केतप्रवृत्तिरित्युक्तम् ।
अथोच्यते—यादृशमेको गोविकल्पे बाह्यात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयति गोविकल्पान्त-
रमपि तादृशमेवारोपयति, विकल्पाश्च प्रत्येकं स्वाकारमात्रग्राहिणो न परस्परारोपिता-
नामाकाराणां भेदग्रहणाय पर्याप्नुवन्ति, तस्योभयग्रहणाधीनत्वात् । तदग्रहणाच्च विकल्पा-
रोपितानामाकाराणामेकत्वमारोप्य विकल्पनामेको विषय इत्युच्यते । तदेव च सामान्यं
बहिरारोपितेभ्यो विकल्पाकारेभ्योऽत्यन्तभेदाभावेनाभावरूपं स्वलक्षणज्ञानतदाकारारोपि-
तैश्चतुर्भिः सहोभिः समस्यार्द्धपञ्चमाकार इत्युच्यमानमारोपितबाह्यत्वं शब्दाभिधेयं शब्द-
का विषय नहीं हो सकता । (प्र.) यह परम्परया बाह्यविषयों के साथ भी है, अतः
विकल्प स्वयं अपने में ही बाह्यत्व का आरोप कर अपने में बाह्यत्वाकार के
विकल्प को भी उत्पन्न करता है । इसी बाह्यविषयक विकल्प में शब्दों का सङ्केत है ।
(उ.) बाह्यत्वविषयक यह आरोप प्रत्येक बाह्य विषय में अलग-अलग ही मानना
पड़ेगा; क्योंकि इस बाह्यविषयक विकल्प की उत्पत्ति केवल कथित आन्तर विकल्प-
मात्र से होती है, अतः इसके उत्पन्न होने पर वह वस्तुविषयक विकल्प उत्पन्न-सा और
विनष्ट होने पर विनष्ट-सा दीखता है । इस प्रकार वस्तुविषयक वह विकल्प असाधारण
और क्षणिक भी होगा । पहले ही कह चुके हैं कि सजातीय भिन्न व्यक्तियों में ही
शब्द का सङ्केत हो सकता है, असाधारण किसी एकमात्र व्यक्ति में नहीं । (प्र.)
एक गोविषयक विकल्प बाह्यत्वविषयक अपने जिस आकार को उत्पन्न करता है,
गोविषयक दूसरा विकल्प भी उसी तरह के बाह्यत्वविषयक अपने आकार के
विकल्प को उत्पन्न करता है । विकल्पों का यह स्वभाव है कि वे केवल अपने
आकारों का ही आरोप करें । समान आकारों में जो आरोपित परस्पर भेद हैं,
उन भेदों को ग्रहण कराने का सामर्थ्य उनमें नहीं है; क्योंकि भेद को समझने के
लिए उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों को समझना आवश्यक है । भेद के
इस अज्ञान के कारण ही एक आकार के विकल्प से कल्पित आकारों में एकत्व
का आरोप होता है । एकत्व के इसी आरोप के कारण 'इयं गौः' 'इस आकार के
सभी विकल्पों का विषय एक ही है' इस प्रकार का व्यवहार होता है । इसी को
(वैशेषिकादि) 'सामान्य' कहते हैं; किन्तु यह 'सामान्य' अभावरूप है (भावरूप
नहीं); क्योंकि बाह्य वस्तुओं में एवं आरोपित विकल्पों में जो परस्पर भेद है,
उनका अत्यन्ताभाव ही वह सामान्य है । (१) स्वलक्षण (कम्बुग्रीवादिमत्त्व प्रभृति),
(२) उसका ज्ञान, (३) ज्ञान के आकार एवं (४) आकार का बाह्यत्वारोप इन
चार सहायकों के साथ मिलकर (इन चारों से कुछ ही भिन्न होने के कारण) उसे
'अर्द्धपञ्चमाकार' कहा जाता है । उसी अर्द्धपञ्चमाकार वस्तु में शब्द
७६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
संसर्गविषयः । तदध्यवसाय एव स्वलक्षणाध्यवसायः, तदात्मतया तस्य समारोपात् ।
अन्यव्यावृत्तिस्वभावं भावाभावसाधारणं चेदम्, गौरस्ति नास्तीति प्रयोगात् । भावा-
त्मकत्वे ह्यस्य गौरस्तीति प्रयोगासम्भवः, पुनरुक्तत्वात् । नास्तीति च न प्रयुज्यते,
विरोधात् । एवं तस्याभावात्मकत्वे नास्तीति पुनरुक्तम्, अस्तीति विरुध्यते । यथोक्तम्-
घटो नास्तीति वक्तव्यं सन्नेव हि यतो घटः ।
नास्तीत्यपि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्तयोः ॥ इति ।
एतस्मादेव च भिन्नानामपि व्यक्तीनामेकतावभासः । इदं हि सर्वेषामेव
विकल्पानां विषयोऽस्यैकत्वाद् विकल्पानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कारणानां
का (सङ्केतरूप) संसर्ग होता है । शब्द से उसी का व्यवहार होता है एवं उसी का
बाह्य अर्थरूप में भी व्यवहार होता है, उसे ही 'स्वलक्षण' भी कहते हैं । इसी
'स्वलक्षणाध्यवसाय' रूप से उसका आरोप होता है । इस (अर्द्धपञ्चमाकार) का
अध्यवसाय ही 'स्वलक्षणाध्यवसाय' कहा जाता है; क्योंकि विकल्प का इसी रूप
से आरोप होता है । यह (अपोह) अन्यव्यावृत्ति स्वभाव का है, अर्थात् इसका
स्वभाव है कि अपने विषय को अन्यों से भिन्न रूप में समझावे । एवं भाव और
अभाव दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से रहना भी इसका स्वभाव है;
क्योंकि 'गौरस्ति' और 'गौर्नास्ति' ये दोनों ही प्रकार के प्रयोग होते हैं । यदि यह
केवल भावरूप ही होता, तो फिर पुनरुक्ति के कारण 'गौरस्ति' यह प्रयोग सम्भव
न होता। 'गौर्नास्ति' यह प्रयोग भी नहीं हो सकता; क्योंकि अस्तित्व और नास्तित्व
दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । इसी प्रकार इसको केवल अभावरूप ही मानें तो
'गौर्नास्ति' यह प्रयोग पुनरुक्ति के कारण नहीं हो सकेगा और 'गौरस्ति' यह
प्रयोग विरोध के कारण असम्भव होगा । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-
1"यतः घट सत् है, अतः 'घटोऽस्ति' यह प्रयोग ठीक नहीं है (क्योंकि इससे
पुनरुक्ति होती है) । 'घटो नास्ति' यह प्रयोग भी ठीक नहीं है; क्योंकि (घटशब्द
से बोध्य) सत्त्व और (नास्तिशब्द से बोध्य) असत्त्व दोनों परस्पर विरोधी हैं ।"
इसी (अर्द्धपञ्चमाकार) से विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है ।
यही सभी विकल्पों का विषय है और इसी की एकता से सभी विकल्पों में भी एकता
की प्रतीति होती है । विकल्पों के एकत्व से ही उसके कारणीभूत एवं प्रत्येक पिण्ड
- यह श्लोक मुद्रित पुस्तक में 'घटो नास्तीति वक्तव्यम्' इस प्रकार से मुद्रित है; किन्तु विषय
विवेचन की दृष्टि से 'घटोऽस्तीति न वक्तव्यम्' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है । यह पाठ
पाठान्तरों की सूची में भी है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।