वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३३
प्रशस्तपादभाष्यम्
उपघातलक्षणं दुःखम् । विषाद्यनभिप्रेतविषयसान्निध्ये सत्यनिष्टोपलब्धी-
न्द्रियार्थसन्निकर्षादधर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद् यदमर्षोपघातदैन्यनिमित्त-
मुत्पद्यते तद् दुःखम् । अतीतेषु सर्पव्याघ्रचौरादिषु स्मृतिजम् । अनागतेषु
सङ्कल्पजमिति ।
उपघातस्वभाव अर्थात् प्रतिकूलवेदनीय ही दुःख है । वह विष प्रभृति
अनभिप्रेत विषयों के सामीप्य, उनके साथ इन्द्रियों का संयोग एवं
अधर्मसहकृत आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । वह
असहिष्णुता, दुःख का अनुभव एवं दीनता का कारण है । अतीत सर्प,
व्याघ्र एवं चोर इत्यादि से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण
उनकी स्मृतियाँ हैं । एवं भविष्य में आनेवाले विषयों से जो दुःख उत्पन्न
होता है, उसका कारण उन (अनभिप्रेत) विषयों का सङ्कल्प है ।
न्यायकन्दली
सङ्कल्पाज्जायते । यत्तु विदुषामात्मज्ञानवतामसत्सु विषयानुस्मरणसङ्कल्पेष्वसति
विषयेऽसति चानुस्मरणे असति च सङ्कल्पे चाविर्भवति तद्विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष-
निमित्तमिति । विद्या आत्मज्ञानम्, शमो जितेन्द्रियत्वम्, सन्तोषो देहस्थितिहेतुमात्रातिरि-
क्तानभिकाङ्क्षितत्वम्, धर्मविशेषः प्रकृष्टो धर्मो निवर्तकलक्षणः, एतच्चतुष्टयनिमित्तम् ।
ये तु दुःखाभावमेव सुखमाहुस्तेषामानन्दात्मानुभवविरोधः, हितमाप्स्यामि, अहितं
हास्यामीति प्रवृत्तिद्वैविध्यानुपपत्तिश्च ।
सुखप्रत्यनीकतया तदनन्तरं दुःखं व्याचष्टे—उपघातलक्षणं दुःखम् ।
अनुभूत अतीत के साधनों में सुख की स्मृति से अनुराग उत्पन्न होता है । 'यह मुझे
मिलेगा' इस आकार के संकल्प से सुख के भविष्य साधनों में अनुराग उत्पन्न होता
है । 'विदुषाम्' अर्थात् आत्मज्ञानी विद्वानों में 'असद्विषयानुस्मरणसङ्कल्पेषु' अर्थात्
विषयों के न रहने पर, अनुस्मरण के न रहने पर एवं सङ्कल्प के न रहने पर भी जो
दिव्य सुख का आविर्भाव होता है, वह 'विद्याशमसन्तोषधर्मविशेषनिमित्तम्' अर्थात्
विद्या, शम, सन्तोष और प्रकृष्ट धर्म ये सब उसके कारण हैं । 'विद्या' है तत्त्वज्ञान,
'शम' है इन्द्रियों का जय करना, जितने धन से शरीरयात्रा चले उससे अधिक धन
की आकाङ्क्षा न करना ही 'सन्तोष' है । 'धर्मविशेष' शब्द से निवृत्तिरूप प्रकृष्टधर्म
अभीष्ट है । इन चारों कारणों से आत्मज्ञानियों में उक्त सुख की उत्पत्ति होती है ।
जो सम्प्रदाय दुःखाभाव को ही सुख मानते हैं, उनके मत में इन दोषों की
आपत्ति होगी । एक तो आनन्द का सभी जनों को जो अनुभव होता है, वह
विरुद्ध होगा । एवं 'मैं हित को प्राप्त करूँ एवं अहित को छोड़ूँ' ये दो प्रकार की
जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, वे अनुपपन्न हो जायेंगी ।
दुःख सुख का विरोधी है, अतः सुख के निरूपण के बाद 'उपघातलक्षणं दुःखम्'
६३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे इच्छा-
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा । सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात्
स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः ।
अपने लिए या दूसरों के लिए अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही 'इच्छा' है ।
यह (इच्छा) सुख अथवा स्मृति से साहाय्यप्राप्त आत्मा और मन के संयोग
से उत्पन्न होती है । वह प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्म का कारण है ।
न्यायकन्दली
उपहन्यतेऽनेनेत्युपघातः, उपघातलक्षणम् उपघातस्वभावम् । दुःखमुपजातं प्रतिकूलस्य-
भावतया स्वात्मविषयमनुभवं कुर्वदात्मानमुपहन्ति । एतद् विवृणोति-अनिष्टोपलब्धी-
त्यादिना । अमर्षोऽसहिष्णुता द्वेष इति यावत् । उपघातो दुःखानुभवः, दैन्यं विच्छायता,
तेषां निमित्तम् । दुःखे सति तदनुभवलक्षण आत्मोपघातः स्यात् । अतीतेषु सर्पादिषु
स्मृतिजम्, अनागतेषु सङ्कल्पजमिति पूर्ववद् व्याख्यानम् ।
स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा । अप्राप्तस्य वस्तुनः स्वार्थं प्रति
या प्रार्थना इदं मे भूयादिति, परार्थं वा प्रार्थना अस्येदं भवत्विति सेच्छा ।
सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अनागते
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दुःख की व्याख्या करते हैं । प्रकृत में 'उपघात' शब्द
'उपहन्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध है । 'उपघातलक्षण' अर्थात् दुःख
उपघातस्वभाव का है । दुःख की उत्पत्ति ही अपने आश्रयीभूत आत्मा की इच्छा
के प्रतिकूल होती है, अतः वह अपनी उत्पत्ति के द्वारा आत्मा का 'उपहनन'
करती है । 'अनिष्टोपलब्धि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी का विवरण देते हैं ।
'अमर्ष' शब्द का अर्थ है असहिष्णुता, फलतः द्वेष । 'उपघात' शब्द का अर्थ है
दुःख का अनुभव । दैन्य शब्द का अर्थ है दीनता । दुःख इन सबों का कारण है ।
दुःख के रहने पर आत्मा का दुःखानुभवरूप उपघात होता है । अतीत साँप प्रभृति
वस्तुओं से उनकी स्मृति के द्वारा दुःख उत्पन्न होता है । अनागत अनिष्ट वस्तुओं
के संकल्प से दुःख उत्पन्न होता है । इस प्रकार सुख प्रकरण में कथित रीति से
यहाँ भी व्याख्या करनी चाहिए ।
'स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा' अर्थात् अपने लिए या दूसरों के लिए किसी अप्राप्त
वस्तु की जो 'प्रार्थना' अर्थात् 'यह मुझे मिले' या 'यह इस व्यक्ति को मिले' इस प्रकार
की जो प्रार्थना वही 'इच्छा' है।'सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वोत्पद्यते'
सुख के साधनीभूत भविष्य वस्तु की इच्छा होती है, अतः उस विषय से होनेवाला सुख