सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३
प्रशस्तपादभाष्यम्
चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे ।
त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि ।
पृथिवी, जल, तेज, और वायु इन चार द्रव्यों का द्रव्य को उत्पन्न
करना और स्पर्श से युक्त होना ये दो साधर्म्य हैं ।
पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का प्रत्यक्षत्व, रूपवत्त्व और
द्रवत्व ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वानीति । बाह्यैकैकेन्द्रियेण चक्षुरादिना ग्राह्या ये
विशेषगुणा रूपादयस्तैस्तद्वत्ता पृथिव्यादीनामिति । अन्तःकरणग्राह्यत्वमप्येषां गुणानामस्ति,
ततश्चैकैकेन्द्रियग्राह्यत्वमसिद्धम्, तदर्थं बाह्यग्रहणम् । एकैकग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् ।
चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । चतुर्णां पृथिव्युदकानलानिलानाम् । द्रव्यारम्भ-
कत्वं द्रव्यं प्रति समवायिकारणभावः । स च निजा शक्तिरेव । स्पर्शवत्त्वं स्पर्शसमवायः ।
त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । त्रयाणां क्षित्युदकतेजसां प्रत्यक्ष-
त्वमिन्द्रियजज्ञानप्रतिभासमानता, न तु महत्त्वादिकारणयोगः, रूपवत्त्व-
होती हैं । जहाँ शरीर से सम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है, उस अर्थ में 'यह
व्यवधानरहित है' इस प्रकार की बुद्धि होती है और जहाँ शरीर से असम्बद्ध
अर्थ का ग्रहण होता है उस अर्थ में 'यह व्यवहित है' इस प्रकार की प्रतीति
होती है ।
'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यगुणवत्त्वानि' अर्थात् चक्षुरादि एक-एक बाह्य इन्द्रियों से
गृहीत होनेवाले जो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द, ये पाँच विशेष गुण हैं,
'तद्वत्त्व' पृथिव्यादि पाँच द्रव्यों का साधर्म्य है । ये रूपादि मन रूप अन्तरिन्द्रिय से
भी गृहीत होते हैं, अतः उनमें 'एकैकेन्द्रियग्राह्यत्व' नहीं रह सकता, अतः 'बाह्य'
पद का प्रयोग है । 'एकैक' पद केवल इस वस्तुस्थिति को समझाने के लिए है कि
कथित रूपादि पाँच विशेष गुण एक-एक बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं,
संयोगादि की तरह दो इन्द्रियों से नहीं ।
'चतुर्णाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का 'द्रव्यारम्भ-
कत्व' अर्थात् द्रव्य का समवायिकारणत्व साधर्म्य है । यह उनकी स्वाभाविक शक्ति
है । 'स्पर्शवत्त्व' शब्द का अर्थ है, स्पर्श का समवाय ।
'त्रयाणाम्' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का 'प्रत्यक्षत्व'
साधर्म्य है । इस 'प्रत्यक्षत्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में प्रतिभासित

६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्वयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्च ।
भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् ।
पृथिवी और जल इन दोनों का गुरुत्व और रसवत्त्व ये दो साधर्म्य हैं ।
भूत अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पाँच और
आत्मा इन छः द्रव्यों का विशेषगुणवत्त्व साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
मित्यस्य पुनरुक्तत्वप्रसङ्गात् । नन्वात्मनोऽपि प्रत्यक्षत्वमस्ति ? सत्यम्, बाह्येन्द्रियापेक्षया
त्रयाणामित्युक्तम् । तथा रूपवत्त्वं रूपसमवायः । द्रवत्वं द्रवत्वन्नाम गुणान्तरम् ।
द्वयोर्गुरुत्वम् । द्वयोः पृथिव्युदकयोः, गुरुत्वन्नाम गुणान्तरम्, तस्य भावात्
पृथिव्यामुदके च गुरुशब्दनिवेशः । रसवत्त्वञ्च रससमवायः, न केवलं तयोर्गुरुत्वं
रसवत्त्वञ्चेति चार्थः ।
भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । भूतानां पृथिव्यप्तेजोवायुनभसामात्मनां च वैशेषिक-
गुणयोगः । विशेषो व्यवच्छेदः, विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति
वैशेषिका रूपादयस्तद्योगो भूतात्मनाम् ।
होना, महत्त्वादि प्रत्यक्ष के कारणों का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर इन
तीनों के रूपवत्त्व को साधर्म्य कहना पुनरुक्ति-दुष्ट हो जाएगा । प्रत्यक्षत्व तो
आत्मा में भी है ? (उ.) हाँ है, किन्तु यहाँ बाह्य इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष का ही
ग्रहण है । एवं 'रूपवत्त्व' शब्द का अर्थ है रूप का समवाय और 'द्रवत्व' शब्द से
द्रवत्व नाम का स्वतन्त्र गुण विवक्षित है ।
'द्वयोः' पृथिवी और जल इन दोनों का 'गुरुत्व' अर्थात् गुरुत्व नाम का
स्वतन्त्र गुण साधर्म्य है । इसी गुरुत्व नामक गुण के सम्बन्ध से पृथिवी और जल
ये दोनों 'गुरु' शब्द से व्यवहृत होते हैं । 'रसवत्त्व' शब्द से रस का समवाय इष्ट
है । गुरुत्व और रसवत्त्व इन दोनों में से केवल गुरुत्व ही या केवल रसवत्त्व ही
पृथिवी और जल के साधर्म्य नहीं हैं, किन्तु दोनों मिलकर उनके साधर्म्य हैं, यही
'च' शब्द से सूचित होता है ।
'भूतात्मनाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं आत्मा इन छः
द्रव्यों का वैशेषिक गुण का सम्बन्ध साधर्म्य है । यहाँ 'विशेष' शब्द का अर्थ है
'भेद' (व्यवच्छेद) "विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिकाः"
इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपने आश्रय को जो गुण भिन्न पदार्थों से अलग रूप से
समझावे वही यहाँ 'वैशेषिक' शब्द का अर्थ है । इन्हीं रूपादि विशेष गुणों का
योग पृथिव्यादि पाँच भूत एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का साधर्म्य है ।