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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९१
न्यायकदली
अथैकं वस्तुभयात्मकं न भवतीति सुदृढप्रमाणावसितोऽयमर्थो न शक्यतेऽन्यथा
कर्तुम्, तर्हि तयोस्तुल्यबलत्वं नास्त्येव, एकस्य यथार्थत्वादिति, कुतः संशयः ? यद्यपि
वस्तुवृत्त्या द्वयोर्यथार्थता नास्ति, तथाप्यन्यतरस्य विशेषानुपलम्भेन भवेत् तुल्यबलत्वाभि-
मान इति चेदस्त्वेवम्, तथापि तुल्यबलतयाद्योत्तरेणार्थं प्रतिबध्यते, तथाद्येनाप्युत्तरं
प्रतिबध्यत इति परस्परं स्वसाध्यसाधकत्वं न स्यात्, न तु संशयकर्तृत्वम्,
विशेषानुपलम्भमात्रेण विरुद्धोभयविशेषोपस्थापनाभावादित्याह-तुल्यबलत्वे चेति ।
ननु यद्वस्तु तन्मूर्त्तं भवत्यमूर्त्तं वा, न मूर्त्तामूर्त्ताभ्यां प्रकारान्तर-
मुपलभ्यम्, अतो मनसि मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वयोरनुपलम्भेऽपि द्वयोरभावं द्वयोरपि
वस्तु का 'तत्त्व' होगा (यथार्थ रूप होगा) । अगर सुदृढ़ प्रमाण के द्वारा यह
निश्चित है कि वस्तु दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः उसका निराकरण नहीं
किया जा सकता, तो फिर दोनों हेतु समान बल के हैं ही नहीं; क्योंकि उनमें एक
यथार्थ (अनुमिति का साधक) है । अतः संशय किस प्रकार होगा ? (प्र.) यद्यपि
वस्तुस्थिति यही है कि (परस्पर विरोधी साध्यों के साधक) दोनों हेतु यथार्थ
(ज्ञान) के साधक नहीं हो सकते, फिर भी दोनों पक्षों में से किसी एक में (यथार्थ
के प्रयोजक) विशेष धर्म की उपलब्धि नहीं होती है, अतः दोनों हेतुओं में समान
बल होने का अभिमान होता है । (उ.) अगर दोनों हेतुओं को समान बल का
मान भी लें, तो भी जैसे कि पहला हेतु दूसरे हेतु को प्रतिरुद्ध करता है, वैसे ही
(उसी के समान बल होने के कारण) दूसरा हेतु भी पहले हेतु को प्रतिरुद्ध कर
सकता है । इस प्रकार दोनों परस्पर एक-दूसरे से प्रतिरुद्ध होने के कारण केवल
अपने-अपने साध्य का साधन भर न कर सकेंगे । इससे यह सम्भव नहीं है कि
दोनों मिलकर संशय का उत्पादन करें; क्योंकि 'दोनों के विशेष (असाधारण) धर्म
उपलब्ध नहीं हैं' केवल इतने से ही दोनों हेतुओं से परस्पर विरुद्ध दो साध्यों की
उपस्थिति नहीं हो सकती । यही बात 'तुल्यबलत्वे च' इत्यादि भाष्य के द्वारा कही
गयी है । (प्र.) जो कोई भी वस्तु वह या तो मूर्त्त ही होगी या फिर अमूर्त्त ही
होगी; क्योंकि (परस्पर विरोधी) दो प्रकारों में से किसी एक ही प्रकार की होगी,
दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार की नहीं; (जैसे कि कोई भी वस्तु द्रव्य ही होगी
वा अद्रव्य ही, द्रव्य भी न हो, और अद्रव्य भी न हो ऐसे किसी तीसरे प्रकार की
वस्तु की उपलब्धि नहीं होती है), अतः मूर्त्त या अमूर्त्त इन दोनों को छोड़कर
वस्तुओं का कोई तीसरा प्रकार उपलब्ध नहीं है । अतः मन में मूर्त्तत्व और
अमूर्त्तत्व इन दोनों में से किसी एक के निश्चित न होने पर भी जिस पुरुष के मन
में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों की सम्भावना या दोनों के अभाव की भी सम्भावना
नहीं है, उस पुरुष को मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से एक पक्ष का यह
संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है या अमूर्त्त ?' (उ.) यह ठीक है कि उस पुरुष को
उक्त प्रकार का संशय होता है; किन्तु वह इस कारण नहीं होता कि मनरूप धर्मी में

५९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
न्यायकन्दली
भावमसम्भावयतो भवत्येवान्यतरपक्षे स संशयः । सत्यं भव्येय, न तु विरुद्धाव्यभि-
चारिधर्मद्वयसन्निपातात्, किन्तु वस्तुत्यात् । यन्मूर्त्तामूर्त्ताभ्यां दृष्टसाहचर्यं मनसि
प्रतीयमानं स्मृतिद्वारेण तयोरुपस्थापनं करोति ।
तुल्यबलत्वमभ्युपगम्य विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निरस्तम्, न त्वनयोस्तुल्य-
बलत्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्देशस्य 'अमूर्त्तं मनः' इत्यस्यागमेन 'तदभावादणु मनः'
(अ.७,आ..१,सू.२३) इति सूत्रेण बाधितत्वात् । अथेदं सूत्रमप्रमाणम् ? व्यापकमेव मनः,
तदा मनःसद्भावे न किञ्चित् प्रमाणमस्तीत्यमूर्त्तं मनः, अस्पर्शत्वादिति हेतुराश्रयासिद्धः । अथ
युगपज्ज्ञानानुत्पत्त्या सिद्धं मनस्तदा धर्मिग्राहकप्रमाणबाधितो युगपज्ज्ञानानुत्पत्तेर्मनसोऽणु-
विरुद्धाव्यभिचारी मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व रूप दोनों धर्मों का संनिवेश है । वह तो
इस वस्तुस्थिति के कारण होता है कि क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप जो दोनों
धर्म मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व के साथ क्रमशः घटादि और आकाशादि में ज्ञात हो
चुके हैं, उन दोनों की जब मन में प्रतीति होती है, तो वे मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन
दोनों को मनरूप धर्मी में उपस्थित कर देते हैं ।
विरुद्धाव्यभिचारी दोनों हेतुओं को समान बल का मानकर उनमें संशय की
हेतुता का खण्डन किया गया है; किन्तु यथार्थ में वे दोनों समान बल के हैं ही
नहीं; क्योंकि उन दोनों में से पहला 'अनुमेयोद्देश' अर्थात् 'अमूर्त्तं मनः' यह
प्रतिज्ञावाक्य 'तदभावादणु मनः' इस सूत्ररूप आगमन से बाधित होने के कारण
'आगमविरोधी' है । अगर उक्त सूत्र को प्रमाण न मानें, तो फिर मन (आकाशादि
की तरह) व्यापक द्रव्य ही होगा, ऐसी स्थिति में मन की सत्ता में कोई प्रमाण न
रहने के कारण (अमूर्त्तं मनः, अस्पर्शवत्त्वात्) यह हेतु आश्रयासिद्ध होगा ।
अगर एक ही समय दो ज्ञानों की उत्पत्ति न होने के कारण मन की सिद्धि मान
लें, तो मन का अमूर्त्तत्वरूप साध्य मनरूप धर्मी के ज्ञापक 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति' रूप
प्रमाण से ही बाधित होगा; क्योंकि, 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति' अर्थात् एक ही समय दो
ज्ञानों की अनुत्पत्ति तभी उपपन्न हो सकती है जब कि मन अणु (मूर्त्त) हो;
क्योंकि मन अगर व्यापक होगा' तो एक ही समय सभी इन्द्रियों के साथ
सम्बद्ध हो सकेगा, जिससे एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति सम्भव
हो जाएगी । 'अनुमेयोद्देश' अर्थात् ज्ञान में आगम के विरोध से कौन सा दोष
होगा ? इसी प्रश्न का समाधान 'अयं तु विरुद्धभेद इति' इस भाष्य वाक्य से
किया गया है । अर्थात् 'अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा' इस प्रतिज्ञा-लक्षण में
'अविरोधि' पद के उपादान से जिन प्रत्यक्षादि विरुद्ध प्रतिज्ञाभासों का निराकरण
किया गया है, उन्हीं (निराकृत प्रतिज्ञाभासों) में से ही 'अमूर्त्तं मनः' यह
आगमविरोधी प्रतिज्ञा भी है । अतः यहाँ प्रतिज्ञाभास ही दोष है, सन्दिग्ध रूप
हेत्वाभास नहीं । प्रकृत भाष्य वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द के द्वारा यह व्यक्त किया