वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९
प्रशस्तपादभाष्यम्
समानदेशत्वञ्च ।
पृथिव्यादीनां पञ्चानामपि भूतत्वेन्द्रियप्रकृतित्वबाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यविशेषगुण-
वत्त्वानि ।
आधार होना) ये तीन साधर्म्य हैं ।
पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच द्रव्यों के भूतत्व,
इन्द्रियप्रकृतित्व और एक-एक बाह्येन्द्रिय से गृहीत होनेवाले विशेष गुण
ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
आकाशादीनाम्, न तु सर्वत्र गमनम्, तेषां निष्क्रियत्वात् । परममहत्त्वमियत्तान-
वच्छिन्नपरिमाणयोगित्वम् । सर्वसंयोगिसमानदेशत्वं सर्वेषां संयोगिनां मूर्त्तद्रव्याणामाकाशः
समानो देश एक आधार इत्यर्थः । एवं दिगादिष्वपि व्याख्येयम् । यद्यप्याकाशादिकं सर्वेषां
संयोगिनामाधारो न भवति, आधारभावेनानवस्थानात्, तथापि सर्वसंयोगाधारत्वात्
सर्वसंयोगिनामाधार इत्युच्यते, उपचारात् । अत एव सर्वगतत्वमित्यनेनापुनरुक्तता । तत्र
हि सर्वैः सह संयोगोऽस्तीत्युक्तम् । इह तु सर्वषामाधार इत्युच्यते ।
पृथिव्यादीनामाकाशान्तानामितरवैधर्म्येण साधर्म्यं कथयति – पृथिव्या-
दीनामिति । भूतत्वं भूतशब्दवाच्यत्वम् । एकनिमित्तमन्तरेणानेकेषु
मूर्त्त द्रव्यों के साथ संयोग ही सर्वगतत्व है, आकाशादि का भी मूर्त्त द्रव्यों में जाना
नहीं, क्योंकि वे सभी क्रियाशून्य हैं । 'परममहत्त्व' शब्द का अर्थ है इयत्ता से
रहित परिमाण का (सबसे बड़े परिमाण का) सम्बन्ध । 'सर्वसंयोगसमानदेशत्व'
अर्थात् आकाश संयोग से युक्त सभी मूर्त्त द्रव्यों का एक आधार है । इसी प्रकार
दिशा में भी व्याख्या करनी चाहिये । यद्यपि आकाशादि संयोग से युक्त पदार्थों का
आधार नहीं है, किन्तु उनके सभी संयोगों का आधार है, अतः उनमें 'सर्वाधार'
शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है । अतएव 'सर्वगतत्व' के बाद 'सर्वसंयोगि-
समानदेशत्व' के कथन से पुनरुक्ति की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि 'सर्वगतत्व'
शब्द से आकाशादि में भी मूर्त्त द्रव्यों का संयोग प्रतिपादित होता है और
'सर्वसंयोगिसमानदेशत्व' शब्द से लक्षणा वृत्ति के द्वारा उनमें सर्वाधारत्व का
प्रतिपादन होता है ।
पृथ्वी से लेकर आकाशपर्यन्त पाँच द्रव्यों का साधर्म्य औरों से असाधारण्य
दिखलाते हुए कहते हैं । 'भूत' शब्द का अर्थ है 'भूत' शब्द से अभिधावृत्ति के द्वारा
कहा जाना । यद्यपि पृथिवी प्रभृति पाँच द्रव्यों में सभी को समझाने के लिए एक
शब्द की प्रवृत्ति का नियामक कोई एक धर्म नहीं है, किन्तु तब भी 'अक्ष' शब्द
६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
पृथिव्यादिष्वेकशब्दप्रवृत्तिरक्षशब्दवत्, यथा देवनत्वेन्द्रियत्वबिभीतक्तत्वसामान्यत्रययोगा-
देवनादिष्वक्षशब्दः सङ्केतितः, तथा पृथिवीत्वादिसामान्यवशात् पृथिव्यादिषु चतुर्षु भूतशब्दः
सङ्केतितः । आकाशे तु व्यक्तिनिमित्त एव भूतं भूतमिति तच्छब्दानुविद्धः प्रत्ययस्तच्छब्द-
वाच्यतोपाधिकृतः, यथा देवनादिष्येकोऽक्ष इति प्रत्ययः ।
इन्द्रियप्रकृतत्वमिन्द्रियस्वभावत्वम् । न भूतस्वभावानीन्द्रियाणि, अप्राप्यका-
रित्वात्, प्राप्यकारित्वं हि भौतिको धर्मो यथा प्रदीपस्येति केचित् । तदयुक्तम्,
व्यवहितानुपलब्धेः, यदीन्द्रियमप्राप्यकारि कुड्यादिव्यवहितमप्यर्थं गृह्णीयादप्राप्तेर-
विशेषात् । योग्यताभावाद् व्यवहितार्थग्रहणमिति चेत् ? इन्द्रियस्य तावद्
योग्यता विषयग्रहणसामर्थ्यमस्त्येव तदानीमव्यवहितार्थग्रहणात्, विषयस्यापि योग्यता
की तरह 'भूत' शब्द की प्रवृत्ति उनमें होती है । अर्थात् जैसे देवनत्व (द्यूतत्व),
इन्द्रियत्व और बिभीतकत्व इन तीन सामान्य के सम्बन्ध से जूये प्रभृति में 'अक्ष'
शब्द की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही पृथिवीत्वादि चारों जातियों से पृथिवी, जल, तेज
और वायु इन चार द्रव्यों को समझाने के लिए 'भूत' शब्द प्रवृत्त होता है ।
आकाश में आकाशरूप व्यक्तिमूलक 'यह भूत है' इत्यादि 'भूत' शब्दमूलिका प्रतीति
भूतशब्दबोध्यत्वरूप उपाधि से होती है । जैसे कि एक ही 'अक्ष' शब्द देवनादि
सभी अर्थों को समझाने के लिए प्रवृत्त होता है ।
'इन्द्रियप्रकृतित्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रियस्वभावत्व । यहाँ कोई शङ्का उठाते हैं
कि (प्र.) भूत इन्द्रियों की प्रकृति (समवायिकारण) नहीं है, क्योंकि इन्द्रियाँ
वस्तुओं के साथ असम्बद्ध होकर ही अपना काम करती हैं । भौतिक वस्तुओं का
यही स्वभाव है कि अपने विषयों के साथ सम्बद्ध होकर ही अपना काम करें,
जैसे कि प्रदीप । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं की
इन्द्रियों से उपलब्धि नहीं होती । अगर इन्द्रियाँ अपने से असम्बद्ध विषयों का भी
ग्रहण करें, तो फिर दीवाल प्रभृति से ढके हुए अपने विषयों का भी वे ग्रहण कर
सकती हैं । दीवाल से घिरे और न घिरे हुए वस्तुओं में तो कोई अन्तर नहीं है,
और इन्द्रियों की असम्बद्धता तो दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान है । (प्र.)
व्यवहित वस्तुओं में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता
है ? (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि व्यवहित विषयों में प्रत्यक्ष होने की
योग्यता नहीं है ? या इन्द्रियों में व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष के उत्पादन की
योग्यता नहीं है ? इन्द्रियों की योग्यता है विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य,
सो उनमें है ही । क्योंकि उस समय भी अव्यवहित विषयों का वे ग्रहण करती