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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३
न्यायकन्दली
अथैको धर्मः सपक्षविपक्षयोर्दर्शनाद् धर्मिणि सन्देहं कुर्वन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः
स्यात्, एवमेकस्मिन् धर्मिणि द्वयोर्हेत्वोस्तुल्यबलयोर्विरुद्धार्थप्रसाधकयोः सन्निपाते सति
संशयदर्शनादयं विरुद्धद्वयसन्निपातोऽन्यः सन्दिग्धो हेत्वाभास इति केश्चिदुक्तम्, तद्
दूषयितुमुपन्यस्यति-एकस्मिंश्चेति । तस्योदाहरणमाह-यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः
क्रियावत्त्वात्स्पर्शवत्त्वयोरिति । मूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वाच्छरावादिवत्, अमूर्त्तं मनोऽस्पर्शा-
वत्त्वादाकाशादिवदिति विरुद्धार्थप्रसाधकयोः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोर्हेत्वोः सन्निपाते
मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति संशयः, न ह्यत्रोभयोरपि साधकत्वम्, वस्तुनो द्वयात्मकत्वासम्भवात् ।
नापि परस्परविरोधादुभयोरप्यसाधकत्वम्, मूर्त्तामूर्त्तव्यतिरेकेण प्रकारान्तराभावात् । न
किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि जिस प्रकार सपक्ष और विपक्ष दोनों में
यदि एक ही धर्म (हेतु) देखा जाय तो वह धर्मी (पक्ष) में साध्य के सन्देह को
उत्पन्न करने के कारण 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास होगा, उसी प्रकार परस्पर
विरुद्ध दो साध्यों के साधक एवं समान बल के दो हेतु यदि एक धर्मी में देखे
जाँय तो भी उस धर्मी में उक्त दोनों विरुद्ध साध्यों का संशय होगा । अतः यह 'विरुद्ध-
द्वयसन्निपात'मूलक एक अलग ही 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास है । इस पक्ष का
खण्डन करने का ही उपक्रम 'एकस्मिंश्च' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । इसी
(विशेष प्रकार के) सन्दिग्ध का उदाहरण 'यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वा-
स्पर्शवत्त्वयोः' इस वाक्य के द्वारा प्रदर्शित हुआ है । अभिप्राय यह है कि 'जिस
प्रकार घट शरावादि क्रिया से युक्त होने के कारण मूर्त्त है, उसी प्रकार मन भी मूर्त्त
है; क्योंकि वह भी क्रियाशील है' एवं 'जिस प्रकार आकाश स्पर्श से रहित होने के
कारण मूर्त्त नहीं है, उसी प्रकार मन भी स्पर्श से विहीन होने के कारण अमूर्त्त है'
इस रीति से मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्वरूप दो विरुद्ध साध्य को सिद्ध करनेवाले
क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप दोनों हेतुओं का एक ही मनरूप धर्मी में यदि
सम्मिलन होता है, तो मनरूप धर्मी में यह संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है ? अथवा
अमूर्त्त ?' चूँकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, परस्पर विरोधी दो
प्रकार की नहीं (सुतरां मन मूर्त्त ही होगा या अमूर्त्त ही), अतः वे दोनों हेतु मन-
रूप अपने एक ही पक्ष में अपने-अपने साध्य (अर्थात् मूर्त्तत्व एवं अमूर्त्तत्व के)
निश्चय का उत्पादन नहीं कर सकते । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि (प्र.) चूँकि
मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः मनरूप एक ही धर्मी में उक्त
दोनों साध्यों के साधन करने का सामर्थ्य उन दोनों हेतुओं में से किसी में भी नहीं
है । (उ.) क्योंकि मन को मूर्त्त या अमूर्त्त इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार का
होना सम्भव नहीं है (अतः उन दोनों में से एक हेतु मन में अपने साध्य का साधक
पुस्तक के इस सन्दर्भ में जो 'अयं सपक्षविपक्षयोर्व्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः' यह
पाठ है' उसमें 'विपक्षयोः' यह प्रमाद से लिखा गया जान पड़ता है ।

५८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोरिति । नन्वयमसाधारण एवाचाक्षुषत्वप्रत्यक्ष-
त्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् । ततश्चानध्यवसित इति
जैसे कि मन में मूर्तत्व के साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व के साधक
अस्पर्शवत्त्व ये दोनों ही हेतु विद्यमान हैं, अतः संशय होता है कि मन
क्रियाशील होने के कारण मूर्त है या अस्पर्शयुक्त (द्रव्य) होने के कारण
(आकाशादि की तरह) अमूर्त्त है ? मन में उक्त सन्देह का कारण होने से
उक्त दोनों ही हेतु सन्दिग्ध नाम के हेत्वाभास हैं । (अवान्तर उत्तर- पक्ष)
जिस प्रकार अचाक्षुषत्व (चक्षु से गृहीत न होना) एवं प्रत्यक्षत्व (इन्द्रिय
से गृहीत होना) इन दोनों में से एक-एक गुण से भिन्न दूसरी जगह
पृथक् रूप से रहने पर भी मिलित होकर केवल गुण में ही रहने के
न्यायकन्दली
चान्यतरस्य हेतोर्विशेषोऽवगम्यते येनैकपक्षावधारणं स्यात् । अतः क्रियावत्त्वास्पर्श-
वत्त्वाभ्यां मनसि संशयो भवति, किं मूर्त्तं किं वामूर्त्तमिति । अयमेव च विरुद्धाव्यभि-
चारिणः प्रकरणसमाद् भेदो यदयं संशयं करोति, प्रकरणसमस्तु सन्दिग्धेऽर्थे प्रयुज्यमानः
संशयं न निवर्तयतीति ।
नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षा-
सम्भवादिति । क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वे प्रत्येकं न तावत् संशयं जनयतः, निर्णय-
हेतुत्वात् । सन्निपातश्च तयोरयमसाधारण एव, संहतयोस्तयोर्मनोव्यतिरेकेणान्य-
अवश्य है) । इन दोनों हेतुओं में से किसी एक हेतु में 'विशेष' बल का भी
निश्चय नहीं है कि उन दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का अवधारण हो जाय ।
अतः कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों हेतुओं से मन में यह संशय
उत्पन्न होता है कि 'मन मूर्त है या अमूर्त' ? विरुद्धाव्यभिचारी (प्रस्तुत विलक्षण
सन्दिग्ध) हेत्वाभास में प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष) हेत्वाभास से यही अन्तर है कि
विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभास पक्ष में प्रकृत साध्य के संशय का उत्पादन करता है;
किन्तु प्रकरणसम उस साध्य में प्रवृत्त होता है जो सन्दिग्ध है, जिससे कि वह पक्ष
में साध्य के सन्देह को दूर नहीं कर पाता ।
'नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात्' इस
(पूर्वपक्ष भाष्य) का अभिप्राय है कि यह (विरुद्धाव्यभिचारी या सन्दिग्धविशेष)
असाधारण हेत्वाभास ही है; क्योंकि कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों
में कोई एक हेतु संशय को उत्पन्न नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येकशः वे दोनों
निश्चय के ही उत्पादक हैं । दोनों हेतुओं का सम्मिलन (जिससे संशय हो सकता
है) असाधारण ही है; क्योंकि क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों का सम्मिलन
तो केवल मनरूप पक्ष में ही सम्भव है, मन को छोड़कर उन दोनों का सम्मिलन