वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६३
न्यायकदली
शब्दस्य ककुदादिमदर्थे नियमो गृहीतो न क्रियाकरणादिष्विति तेषां प्रत्येकं
व्यभिचारेऽपि गोशब्दस्य प्रयोगदर्शनात् । तेनायं गोशब्दः श्रूयमाणोऽभ्यासपाटवाद-
व्यभिचरितसाहचर्यं ककुदादिमदर्थमात्रं स्मारयति, न क्रियाकरणादीनीति चेत्?
एवं तर्हि यस्य शब्दस्य यत्रार्थे साहचर्यनियमो गृह्यते तत्रैव तस्याभिधायकत्वं
नान्यत्रेत्यन्विताभिधानेऽपि समानम् । न च स्मरणमनुमानवत् साह-
चर्यनियममपेक्ष्य प्रवर्तत इत्यपि सुप्रतीतम्, तद्धि संस्कारमात्रनिबन्धनं प्रति-
योगिमात्रदर्शनादपि भवति । तथा हि-धूमदर्शनादग्निरिव रसबत्यादिप्रदेशोऽपि
स्मर्यते, तद् यदि गोशब्दः सहभावप्रतीतिमात्रेणैव गोपिण्डं स्मारयति, गोपिण्ड-
प्रतियोगिनोऽपि पदार्थान् कदाचित् स्मारयेत् । नियमेन तु गोपिण्डमेव स्मार-
यंस्तद्विषयं वाचकत्वमेवावलम्बते, तथासत्येव नियमसम्भवात् । किञ्च यथा
वाक्ये पदानामन्विताभिधानं तथा पदेऽपि प्रकृतिप्रत्ययोरन्विताभिधानमिच्छन्ति
के साथ अन्वित होनेवाले) ककुदादि से युक्त अर्थ को समझाने के लिए गो शब्द
का प्रयोग देखा जाता है । इस प्रकार सुना गया यह गो शब्द बार-बार प्रयुक्त होने
से प्राप्त पटुता के कारण ककुदादि से युक्त जिस अर्थ के साथ उसका व्यभिचार
कभी उपलब्ध नहीं होता है, केवल उसी अर्थ का स्मरण करा सकता है, क्रियाओं
का या करणादि अर्थों का नहीं; क्योंकि उनके साथ गो शब्द का कभी प्रयोग होता
है, कभी नहीं । (उ.) तब तो समान रूप से अन्विताभिधानवादी की ही तरह
यह कहिए कि "जिस अर्थ को समझाने के जिस शब्द का प्रयोग नियम से
होता है, केवल उसी अर्थ में उस शब्द की शक्ति है"। दूसरी बात यह है कि जिस
प्रकार अनुमान के द्वारा उसी अर्थ का ग्रहण होता है, जिसका साहचर्य हेतु में
नियमतः गृहीत होता है । उस प्रकार स्मृति को साहचर्य नियम की अपेक्षा
नहीं होती है; क्योंकि वह तो केवल संस्कार से उत्पन्न होनेवाली वस्तु है, अतः
साहचर्य के किसी एक सम्बन्धी को देखने पर भी उत्पन्न हो सकती है । जैसे कि धूम
के देखने से वह्नि का स्मरण होता है, उसी तरह वह्नि के आश्रय महानसादि प्रदेशों
का भी स्मरण होता है । इस प्रकार गो शब्द से ककुदादि से युक्त गो रूप अर्थ
का स्मरण यदि इसलिए मानेंगे कि गो शब्द का सामानाधिकरण्य उक्त गो रूप
अर्थ के साथ है, तो फिर गो शब्द से कदाचित् (वह्नि के आश्रयीभूत महानसादि
की तरह) गो के आश्रयीभूत गोष्ठादि का भी स्मरण हो सकता है । गो पद से
नियमतः गोपिण्ड का ही स्मरण हो, इसके लिए किसी भी दूसरी रीति से गो
पिण्ड में गो शब्द की शक्ति को ही हेतु मानना पड़ेगा; क्योंकि उस नियम की
उपपत्ति किसी दूसरी रीति से सम्भव नहीं है । दूसरी यह भी बात है कि जिस
प्रकार वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद की शक्ति दूसरे अर्थ में अन्वित स्वार्थ में ही मानने
की इच्छा आप लोगों की है, उसी प्रकार यह भी आप लोगों का अभिप्रेत होगा कि
पद के शरीर में प्रयुक्त होनेवाले प्रकृति और प्रत्यय रूप दोनों अंशों में से प्रत्येक
५६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
भवन्तः, ताभ्यां चेत् परस्परान्वितः स्वार्थोऽभिहितः कस्तदन्यः पदार्थो यः पदेन पश्चात्
स्मर्यते ? तदेतदास्तां नन्नाटकपक्षपतितं वचः ।
प्रकृतमनुसरामः-अस्त्वेवं पदानामर्थप्रतिपादनम्, इदं तु न सङ्गच्छते परार्थानुमान-
मिति । लिङ्गं तज्जनितं वा ज्ञानमनुमानम् । न च लिङ्गस्य ज्ञानस्य च परार्थत्वम् ।
अनुमानवाचकस्य शब्दस्य परार्थत्वादुमानं परार्थमुच्यते चेत् प्रत्यक्षवाचकस्यापि शब्दस्य
परार्थत्वात् प्रत्यक्षमपि परार्थमुच्येत ? तदुक्तम्-
ज्ञानाद् वा ज्ञानहेतोर्वा नान्यस्यास्त्यनुमानता ।
तयोश्च न परार्थत्वं प्रसिद्धं लोकवेदयोः ॥
वचनस्य परार्थत्वादुमानपरार्थता ।
प्रत्यक्षस्यापि परार्थ्यं तद्द्वारं किं न कल्प्यते ॥ इति !
दूसरे अर्थ के साथ अन्वित ही अपने स्वार्थ का अभिधायक होगा । यदि प्रकृति
और प्रत्यय ये दोनों ही एक-दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन कर
ही देते हैं, तो फिर कौन-सा विलक्षण अर्थ समझने को अवशिष्ट रहता है,
जिसका स्मरण पीछे पद के द्वारा होता है ? व्यर्थ बातों की यह प्रक्रिया अब यहीं
तक रहे ।
अब फिर प्रकृत विषय का अनुसरण करते हैं । (प्र.) मान लिया कि पदों से
अर्थों का प्रतिपादन उसी (अभिहितान्वयवादियों की) रीति से होता है; किन्तु यह
समझ में नहीं आता कि अनुमान 'परार्थ' किस प्रकार है ? क्योंकि हेतु या
पञ्चावयववाक्य जनित हेतु का ज्ञान इन दोनो में से ही कोई 'अनुमान' है । इनमें
से न लिङ्ग ही परार्थ है, न लिङ्ग का ज्ञान ही । यदि यह कहें कि (उ.) उक्त लिङ्ग
या लिङ्ग ज्ञान के वाचक (पञ्चावयव के) शब्द चूँकि परार्थ हैं (अर्थात् दूसरे को
समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं), अतः हेतु या हेतुज्ञान रूप अनुमान को भी
परार्थ कहा जाता है । (प्र.) तो फिर प्रत्यक्ष के अभिधायक शब्द का भी प्रयोग
तो दूसरे को समझाने के लिए ही किया जाता है । अतः प्रत्यक्ष भी 'परार्थ'
होगा । जैसा कहा गया है कि-
(१) हेतु का ज्ञान या हेतु इन दोनों से भिन्न कोई अनुमान नहीं हो सकता ।
इन दोनों की परार्थता न लोक में प्रसिद्ध है, न वेद में ही ।
(२) यदि हेतु के ज्ञापक या हेतु ज्ञान के अभिलापक वाक्य दूसरों को
समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, इस हेतु से लिङ्ग या लिङ्गज्ञान रूप अनुमान परार्थ
हैं, तो फिर प्रत्यक्ष प्रमाण के बोधक वाक्य भी तो दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त
होते हैं, इस हेतु से (अनुमान की तरह) प्रत्यक्ष को भी परार्थ क्यों नहीं मानते ?