वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५२९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५२९
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रसिद्धाभिनयस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात् तदप्यनुमानमेव ।
चेष्टा के साथ सङ्केतित अर्थ के ज्ञान से युक्त पुरुष को ही उस
चेष्टा से अर्थ का बोध होता है, अतः चेष्टा भी अनुमान प्रमाण के ही
अन्तर्गत है (अतिरिक्त प्रमाण नहीं) ।
न्यायकन्दली
दोषाभावाद् विपर्ययाभावः, प्रामाण्यं त्विन्द्रियादिस्वरूपमात्राधीनमिति चेत् ? दोषः
प्रामाण्योत्पत्तिः प्रतिबध्यते, विपर्ययः पुनरिन्द्रियादिस्वरूपाधीन इति कस्मान्न कल्प्यते ?
दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाद् विपर्ययस्य नैवं कल्पनेति चेत् ? प्रामाण्यस्यापि
दोषाभावान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वदर्शनात्र तत्कल्पनेति समानम् । न हि तदस्ति प्रमाणं
यद् दोषाणां प्रागभावं प्रध्वंसाभावं नापेक्षते ।
एवं प्रवृत्त्यादिकार्यजननव्यापारोऽपि प्रमाणस्य परत एव न स्वरूपमात्राधीनः, उपकारा-
पका रादिसापेक्षस्य प्रवृत्त्यादिकार्यजनकत्वादित्येषा दिक् ।
हस्तस्यावाङ्मुखाकुञ्चनादाह्वानं प्रतीयते, पराङ्मुखोत्क्षेपणाच्च विसर्जनप्रतीतिर्भवति,
एतत्प्रमाणान्तरमिच्छन्ति केचित् । तान् प्रत्याह-प्रसिद्धाभिनय-
दोषाभाव में भी कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है । (प्र.) दीप के
अभाव से तो विपर्यय (अप्रमा) का अभाव ही उत्पन्न होता है, प्रामाण्य तो ज्ञान
सामान्य के लिए अपेक्षित इन्द्रियादि कारण समुदाय से ही उत्पन्न होता है । (उ.)
इसी प्रकार यह कल्पना भी तो की जा सकती है कि दोषों से प्रामाण्य की उत्पत्ति
ही केवल प्रतिरुद्ध होती है, इन्द्रियादि साधारण कारणों से ही विपर्यय की उत्पत्ति
होती है । यदि यह कहें कि (प्र.) विपर्यय के साथ ही दोष के अन्वय और
व्यतिरेक दोनों हैं, अतः यह (दोष से प्रामाण्य की उत्पत्ति के प्रतिरोध की)
कल्पना नहीं की जा सकती ? (उ.) इसी प्रकार 'प्रामाण्य के साथ ही दोषाभाव
का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं, अतः दोषाभाव से प्रामाण्य की
उत्पत्ति होती है' यह कल्पना भी तुल्य युक्ति से की जा सकती है; क्योंकि ऐसा
कोई भी प्रमाण नहीं है, जो अपने प्रमाज्ञान रूप कार्य के लिए दोषों के प्रागभाव
या ध्वंस रूप अभाव की अपेक्षा नहीं करता ।
इसी प्रकार चूँकि प्रमाण विषय में उपकारकत्व बुद्धि की सहायता से ही
प्रवृत्तियों को उत्पन्न करते हैं, विषय में अपकारकत्व बुद्धि के सहयोग से ही प्रमाण
के द्वारा निवृत्ति की उत्पत्ति होती है, अतः प्रमाण प्रवृत्त्यादि कार्यों के उत्पादन में
भी परापेक्षी ही है (केवल प्रवृत्त्यादि कार्यों की उत्पत्ति भी स्वतः नहीं होती है ),
यही परतः प्रामाण्यवादियों की दृष्टि है ।
हाथ को अपनी तरफ मोड़ने की 'आकुञ्चन' नाम की क्रिया से अपने तरफ
बुलाने का बोध होता है, एवं हाथ को बाहर की तरफ फैलाने की प्रसारण नाम की
क्रिया से बाहर जाने की आज्ञा का बोध होता है । इस बोध के लिए कोई उक्त क्रिया
५३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव ।
(अज्ञ पुरुष को) सर्वथा अज्ञात गवय का ज्ञान आप्त पुरुष से
उच्चारित 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य से ही होता है । अतः उपमान
भी आप्तवचन (शब्द) के ही (अन्तर्गत) है । (फलतः उपमान भी
अनुमान ही है।)
न्यायकन्दली
स्येति । कराकुञ्चनादि-लक्षणोऽभिनयोऽनेनाभिप्रायेण क्रियत इत्येवं यत्पुरुषस्य प्रसि-
द्धोऽभिनयः, तस्य चेष्टया करविन्यासेनाह्वानादिविसर्जनादिप्रतीतिर्दृश्यते नान्यस्य, अतस्तदपि
चेष्टया ज्ञानमनुमानमेव ।
उपमानस्यानुमानेऽन्तर्भावं कुर्वन्नाह - आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा
गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । आप्तिः साक्षादर्थस्य प्राप्तिः,
यथार्थोपलम्भः, तया वर्त्तत इत्याप्तः साक्षात्कृतधर्मा यथार्थदृष्टस्यार्थस्य चिख्या-
पयिषया प्रयोक्तोपदेष्टा, तेनाप्तेन वनेचरेण विदितगवयेनाप्रसिद्धगवयस्याज्ञात-
गवयस्य नागरिकस्य कीदृग्गवय इति पृच्छतो गवा गोसारूप्येण गवयस्य
स्वरूप 'चेष्टा' नाम का एक स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं । उसी के खण्डन के लिए
'प्रसिद्धाभिनयस्य' यह वाक्य कहा गया है । 'प्रसिद्धोऽभिनयो यस्य' इस व्युत्पत्ति
के अनुसार जिस पुरुष को यह सङ्केत ज्ञात है कि 'हाथ की ये आकुञ्चनादि
क्रियायें इन अभिप्रायों से की जाती हैं' वही पुरुष प्रकृत में 'प्रसिद्धाभिनय' शब्द
से अभीष्ट है । उसी पुरुष को 'चेष्टा' से अर्थात् हाथ के विशेष प्रकार के
अभिनय या क्रिया से बुलाने या बाहर लौटने की क्रिया का बोध होता है, दूसरे
को नहीं । अतः चेष्टा से उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान भी अनुमान ही है ।
'उपमान भी अनुमान ही है, वह कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है' यह उपपादन
करते हुए भाष्यकार ने 'आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनमुपमान-
माप्तवचनमेव' यह वाक्य लिखा है । 'आप्त्या वर्त्तते यः स आप्तः' इस व्युत्पत्ति से
ही 'आप्त' शब्द बना है । साक्षात् 'अर्थ' की प्राप्ति को ही 'आप्ति' कहते हैं, जो
वस्तुतः यथार्थज्ञान रूप ही है । तदनुसार 'आप्त' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को
समझना चाहिए, जिसने विषयों को उनमें विद्यमान सभी धर्मों के साथ प्रत्यक्ष के
द्वारा देखा है (उनको पूर्ण रूप में यथार्थ रूप में समझा है) और उस यथार्थज्ञान
से ज्ञात वस्तु के ख्यापन (लोगों को विदित) करने की इच्छा के द्वारा ही जो
उपदेश करते हैं । वनों में रहनेवाले इस प्रकार के किसी 'आप्त' पुरुष से-जिन्हें
गवय का ज्ञान है-जब 'अप्रसिद्ध गवय' अर्थात् गवय को न जाननेवाले नागरिक
के द्वारा 'गवय किस तरह का होता है' यह प्रश्न किया जाता है, तब उस
पुरुष के द्वारा 'गवा' अर्थात् गोसादृश्य के द्वारा गवय को समझाने के