वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१
न्यायकन्दली
अकार्यत्वं कारणानपेक्षस्वभावत्वम्, तच्च सामान्ये तावद्
व्यक्तेः पूर्वमूर्ध्वं व्यक्तिकाले चावस्थितिग्राहकेण कारणाभावोपलब्धिसहकारिणा
भूयोदर्शनजसंस्कारानुगृहीतेन प्रत्यक्षेणैव व्याप्तिवद् गृह्यते । समवायस्याप्यकार्यत्वं
पूर्वापरसहभावानवक्लृप्तेः, यदि हि पटस्य समवायः पटात् पूर्वं सम्भवति, असति
अकार्यत्व शब्द का अर्थ है-अपनी (स्वरूप) सत्ता के लिए कारणों की
अपेक्षा न रखना । सामान्यादि के आश्रय द्रव्यादि व्यक्तियों में तीनों कालों
में ही सामान्य की सत्ता के ज्ञापक एवं सामान्यादि के कारणों के अभाव-
ज्ञान का सहायक तथा बार-बार के देखने से उत्पन्न संस्कार के द्वारा विशेष
बलप्राप्त प्रत्यक्ष के द्वारा ही व्याप्ति की तरह इस अकार्यत्व का ज्ञान होता
है । समवाय में भी अकार्यत्व है ही, क्योंकि समवाय को कार्य मानने की
कोई रीति उपपन्न नहीं होती है । समवाय को अगर कार्य मानें तो फिर उसकी
किया है । वैधर्म्यनिरूपण के लिए साधर्म्यनिरूपण के अन्त में लिखा है कि "एवं सर्वत्र
साधर्म्यविपर्ययाच्च वैधर्म्यम्" अर्थात् इस प्रकार ये साधर्म्य हैं और (ये ही साधर्म्य) उनसे
भिन्न वस्तुओं में न रहने के कारण उनके वैधर्म्य हैं । तदनुसार "सामान्यादीनाम्" इत्यादि
प्रकृत पङ्क्ति का एक यह भी अर्थ मानना पड़ेगा कि ये सभी स्वात्मसत्त्वादि तीन पदार्थों
से भिन्न पदार्थों के वैधर्म्य भी हैं । अगर बुद्धिलक्षणत्व शब्द की ऐसी व्याख्या करें जिसके
अनुसार यह द्रव्यादि में भी रह सके तो फिर प्रकृत पङ्क्ति से उक्त वैधर्म्य का आक्षेप
सम्भव न हो सकेगा ।
अभिप्राय यह है कि एक घट व्यक्ति की उत्पत्ति के पहले भी उससे पहले के घट में घटत्व
की प्रतीति होती है । एवं एक घट व्यक्ति के नष्ट हो जाने पर भी दूसरे अविनष्ट घट में
घटत्व की प्रतीति होती है । वर्तमान घट में घटत्व की प्रतीति में तो कोई विवाद ही नहीं
है, अतः यह समझते हैं कि व्यक्ति के तीनों कालों में ही जाति की सत्ता रहती है । ऐसी
स्थिति में सामान्य को अगर किसी कारण का कार्य मानें तो वह कारण उसके आश्रयीभूत
व्यक्तियों के कारणों में से ही होगा या उसके सदृश ही कोई दूसरा होगा, किन्तु किसी भी
प्रकार से सामान्य में कार्यत्व मान लेने से उसकी उक्त त्रैकालिक प्रतीति की उपपत्ति नहीं
होगी, अतः उक्त त्रैकालिक प्रतीति के कारणभूत प्रमाणों से ही यह भी समझते हैं कि
सामान्यादि का कोई कारण नहीं है, अतः जिस प्रकार धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य
के भूयोदर्शनजनित संस्कार से युक्त पुरुष को धूम को देखते ही उसकी व्याप्ति भी दिखती
है, उसी प्रकार व्यक्तियों में सामान्य का प्रत्यक्ष होते ही उसी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसमें रहने
वाले अकार्यत्व का भी ज्ञान हो जाता है ।
५२ न्याय्कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
न्याय्कन्दली
सम्बन्धिनि कस्यासौ सम्बन्धः स्यात् ? अथ पटेन सहोत्पद्यते, तदा पटस्यानाधारत्वं
प्राप्नोति । अथ पश्चाद्भवति, तथापि पटस्यानाधारत्वमेव, न च कार्य्यत्वमनाधारं युक्तम्,
तस्मादकृतकः समवायः । विशेषाणाञ्चाकार्य्यत्वं वस्तुत्वे सति द्रव्यगुणकर्म्मान्यत्वात्
सामान्यसमवायवत् सिद्धम् ।
अकारणत्वं समवाय्यसमवायिकारणत्वाभावः, न तु निमित्तकारण-
त्वप्रतिषेधः, बुद्धिनिमित्तत्वाभ्युपगमात् । असामान्यविशेषवत्त्वम् अपर-
जातिरहितत्वमित्यर्थः । सामान्येषु सामान्यन्नाम नापरं सामान्यमस्ति, अत्रापि
सामान्यप्राप्त्याऽनवस्थानात् । विशेषसमवाययोस्तु सामान्याभावे कथित एव
निम्नलिखित तीन ही गति हो सकती है कि (१) समवाय अपने पटादिरूप
प्रतियोगी से पूर्व ही उत्पन्न हो, या (२) अपने प्रतियोगी से पीछे उत्पन्न हो अथवा
(३) प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं
है; (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है । अगर समवाय की
उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय
किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न
नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न
न हो, (३) अथवा प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी
प्रकार सम्भव नहीं है, (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है ।
अगर समवाय की उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व
उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि
प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि
प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न नहीं हो सकता है; क्योंकि इससे पटादि कार्य
समवाय के आधार ही नहीं हो सकते, क्योंकि आधार को आधेय से पूर्व रहना
आवश्यक है । सुतराम्, एक ही क्षण में उत्पन्न दो वस्तुओं में आधाराधेयभाव
असम्भव है । (३) समवाय की उत्पत्ति अगर पटादि कार्यों की उत्पत्ति के बाद
मानें फिर भी पटादि की अनाधार उत्पत्ति की आपत्ति रहेगी, क्योंकि पट की
उत्पत्ति के समय अगर समवाय ही नहीं है तो तन्तु में किस सम्बन्ध से पट की
उत्पत्ति होगी ? अतः समवाय अकार्य ही है । वह कारणों से उत्पन्न नहीं होता
है । विशेष भी कार्य नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों से भिन्न होने
पर भी वह भाव पदार्थ है, जैसे कि सामान्य और समवाय ।
यहाँ 'अकारणत्व' शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व इन दोनों
का ही निषेध इष्ट है, निमित्तकारणत्व का नहीं, क्योंकि सामान्यादि में भी बुद्धि की
निमित्तकारणता स्वीकृत है । 'असामान्यविशेषवत्त्व' शब्द का अर्थ है अपरजातियों का
न रहना । सामान्यों में सामान्यत्व नाम का कोई अपर सामान्य नहीं है, क्योंकि इससे
अनवस्था¹ होगी । समवायो और विशेषों में सामान्य के न रहने की युक्ति दिखला
१. जातियों में जातित्व नाम का सामान्य मानने में अनवस्था इस प्रकार होती
है कि द्रव्यत्व गुणत्वादि जितने सामान्य पहले से स्वीकृत हैं उन सभी सामान्यों
में जातित्व या सामान्यत्व नाम का एक और सामान्य मानना पड़ेगा, किन्तु यह