वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५
न्यायकन्दली
सरणीयम् । तस्मादन्यथोच्यते, पक्षो नाम साध्यपर्यायः, साध्यं च तद् भवति,
यत् साधनमर्हति, सम्भाव्यमानप्रतिपक्षार्थो न साधनमर्हति, वस्तुनो द्वैरूप्या-
भावादित्ययमपक्षधर्म एव । तथा प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि पक्षो न भवति,
रूपान्तरेण सिद्धस्य रूपान्तरेण साधनानर्हत्वात् । अतः प्रकरणसमकालातया-
पदिष्टोभौ 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यनेनैव निराकृतौ, अनुमेयाभासाश्रयत्वात् ।
अतः (अर्थात् पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों को ही हेतुत्व का प्रयोजक मानें तो
प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में हेतुत्व का वारण किस प्रकार
होगा ? अतः इस प्रश्न का हम लोग (सिद्धान्ती) दूसरा समाधान कहते हैं कि
(हेतु के बल रूप) पक्षवृत्तित्वादि के घटकीभूत 'पक्ष' शब्द और 'साध्य' शब्द
दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं। साध्य वह है जिसका कि साधन हो सके; किन्तु
जिस साध्य के प्रतिपक्ष की सम्भावना रहती है, उसका साधन नहीं किया जा
सकता, क्योंकि वस्तुओं के (परस्पर-विरुद्ध) दो रूप नहीं हो सकते 1। अतः
प्रकरणसमहेतु 'पक्षधर्म' ही नहीं है, अर्थात् साध्य से युक्त पक्षरूप अनुमेय से
अभिन्न साध्य के साथ सम्बद्ध ही नहीं है, इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट हेतु भी
'पक्ष धर्म' न होने के ही कारण 'हेतु' नहीं है, क्योंकि वह्नि की अनुष्णता प्रत्यक्ष
से विरुद्ध है, एक प्रकार से सिद्ध वस्तु का दूसरे (विरुद्ध) रूप से साधन करना
सम्भव नहीं है, अतः प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों हेत्वाभासों में
हेतु का 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य के द्वारा निर्दिष्ट विशेषण ही नहीं है ।
अतः 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसके उपादान से ही प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट
दोनों हेत्वाभासों में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति हट जाती है ।
- अभिप्राय यह है कि 'शब्दो नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः' एवं 'शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुप-
लब्धेः' इत्यादि प्रकरणसम के स्थल में नित्यत्वविशिष्ट शब्द और अनित्यत्वविशिष्ट शब्द ही
'साध्य' है । शब्दरूप पक्ष का नित्यत्व या अनित्यत्व दो में से कोई एक ही स्वरूप सत्य हो
सकता है, अर्थात् शब्द नित्य ही हो सकता है या अनित्य ही, वह नित्य और अनित्य दोनों
नहीं हो सकता । चूँकि अनुमान के समय शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व कोई भी सिद्ध
नहीं है, अतः नित्यधर्मानुपलब्धि या अनित्यधर्मानुपलब्धि इन दोनों में से कोई भी हेतु
'अनुमेय' अर्थात् नित्यत्व या अनित्यत्वविशिष्ट शब्दरूप 'पक्ष' में विद्यमान नहीं है । अतः
प्रकरणसम हेतु में हेतुत्व का प्रयोजक 'पक्षवृत्तित्व' रूप धर्म ही नहीं है । सुतराम्
'अपक्षधर्म' होने के कारण ही प्रकरणसम 'असिद्ध' (स्वरूपासिद्ध) हेत्वाभास है, जिसकी
सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य से ही दे दी गयी है ।
इसी प्रकार बाधित (कालात्ययापदिष्ट) हेतु भी 'असिद्ध' हेत्वाभास में ही अन्तर्भूत हो
जाता है, क्योंकि 'वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वात्' इत्यादि स्थलों में वह्नि में यद्यपि द्रव्यत्व है, किन्तु
उसमें अनुष्णत्व के विरुद्ध उष्णत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है, अतः अनुष्णत्व बाधित है ।
अनुष्णत्वविशिष्ट वह्निरूप पक्ष में द्रव्यत्व की सत्ता नहीं है, क्योंकि अनुष्णत्व विशिष्ट वह्नि
नाम की कोई वस्तु ही नहीं है । इसकी भी सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसी वाक्य से दे
दी गयी है ।
४८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः-अन्वयी, व्यतिरेकी,
अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः, प्रमेयत्वात्, सामान्यवत् । अस्य हि
पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः, प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रापेक्षयाऽनभिधेयस्या-
प्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्यानभिधेयोऽप्रमेयश्च, स वाजिविषाणवदसन्नेव, न वा
सपक्षो विपक्षो वा स स्यात्, निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे
च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम्, व्यतिरेकाभावात् । अगमकमेव तदिति चेन्न, अन्वयाव्यभि-
चारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम्, तस्य तु व्यभिचार-
प्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः, सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य
दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति, यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरी-
(प्र.) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने
पर भी हेतु का यह लक्षण 'तदभावे च नास्त्येव' इस विशेषण के कारण
केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त या अव्यापक ही है । अभिप्राय यह है कि (१) अन्वयी
(केवलान्वयी), (२) (केवल) व्यतिरेकी, एवं (३) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु
तीन प्रकार के हैं । इनमें 'विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत्' १ इस अनुमान
का हेतु अन्वयी (केवलान्वयी) है । इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव
और अभाव पदार्थ हैं, वे सभी सपक्ष हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो
किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है (अर्थात् प्रमेय नहीं है) और किसी
(शब्द) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से
निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है, वह घोड़े
के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है, न विपक्ष
ही, क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता । जितने भी पदार्थ 'सत्'
हैं, वे सभी इस अनुमान के सपक्ष ही हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है,
अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् 'तदभावे च नास्त्येव' हेतु लक्षण का यह
अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति
से दुष्ट है । यदि यह कहें कि (प्र.) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं ।
(उ.) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि
होती है, इसमें 'अन्वय' ही कारण है । चूँकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार
उपलब्ध नहीं है, (अतः 'केवलान्वयि-हेतु से अनुमिति नहीं होती' यह नहीं कहा जा
१. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होने के
कारण अभिधेय हैं, उसी प्रकार 'विशेष' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण
अभिधेय हैं।