वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५
न्यायकन्दली
स्फुटत्वास्फुटत्वातिशयानतिशयदर्शनादनेकद्रव्यत्वं कारणम् । सत्यपि महत्त्वेऽनेकद्रव्यत्वे
च वायोरनुपलम्भाद् रूपप्रकाशो हेतुः । सर्वस्यैव ज्ञानस्य सुखदुःखादिहेतुत्वाद् देशकालादि-
नियमेनोत्पादाच्च धर्माधर्मदिक्कालजन्यत्वम् । अन्तरेणात्ममनःसंयोगं मन इन्द्रियसंयोगमि-
न्द्रियार्थसंयोगं च प्रत्यक्षाभावाच्चतुष्टयसन्निकर्षः कारणम् ।
इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य हेतुत्वे सामान्योपलम्भवद् विशेषोपलम्भस्यावश्यंभाविताया संशय-
विपर्ययानुत्पत्तिरिति चेन्न, अनियमात् । सामान्यं हि बहुविषयत्वात् स्वाश्रयस्य चक्षुः सन्निकर्ष-
मात्रेणोपलभ्यते, विशेषस्तु स्वल्पविषयत्वात् स्वाश्रयस्य च तदवयवानां च भूयसां
महत् परिमाण से युक्त पृथिवी, जल और तेज का ही प्रत्यक्ष क्यों होता है ? इसी
प्रश्न का समाधान 'द्रव्ये तावत्' इत्यादि ग्रन्थ से कहते हैं । (१) 'अनेकद्रव्यवत्त्व'
शब्द का अर्थ है अनेक द्रव्यों में आश्रित होना । (२) 'रूप का प्रकाश' रूप में
रहनेवाला 'उद्भूतरूप' नाम का एक विशेष प्रकार का धर्म है, जिसके न रहने से
ही जल में (तेज के) रहते हुए भी तेज का प्रत्यक्ष नही होता । (३)
'चतुष्टयसंनिकर्ष' से अर्थात् आत्मा का मन के साथ संयोग, मन का इन्द्रिय के
साथ और इन्द्रिय का अर्थ के साथ संयोग इन तीन संयोग रूप कारणों के द्वारा
'धर्मादि सामग्रियों के रहने पर' अर्थात् धर्म, अधर्म और दिशा, काल प्रभृति
(सामान्य) कारणों के रहने पर प्रत्यक्ष होता है । 'महति' शब्द इसलिए रखा गया
है कि परमाणु और द्व्यणुक इन दोनों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्रत्यक्ष के प्रति
'अनेकद्रव्यवत्त्व' को इसलिए कारण मानते हैं कि अवयवों के न्यूनाधिकभाव से
अवयवियों में स्फुटत्व रूप विशेष और अस्फुटत्व रूप अविशेष दोनों ही देखे जाते
हैं । अनेकद्रव्यवत्त्व और महत्त्व के रहते हुए भी वायु का प्रत्यक्ष नहीं होता है,
अतः कथित 'रूपप्रकाश' को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । सभी ज्ञान
सुख या दुःख के कारण हैं, एवं सभी ज्ञान किसी नियमित देश और नियमित
काल में ही उत्पन्न होते हैं, अतः धर्म, अधर्म, दिशा और काल इन सबों को भी
प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । आत्मा और मन के संयोग के न रहने पर मन
और इन्द्रिय के संयोग एवं इन्द्रिय और अर्थ के संयोग के रहने पर भी प्रत्यक्ष की
उत्पत्ति नहीं होती है, अतः इन चारों का संनिकर्ष भी प्रत्यक्ष का कारण है ।
(प्र.) प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय और अर्थ के संनिकर्ष को यदि कारण मानें, तो फिर
(अर्थगत) सामान्य की तरह (अर्थ के असाधारण धर्म या व्यक्तिगत धर्म) रूप विशेषों
का भी सभी प्रत्यक्षों में भान मानना पड़ेगा, जिससे संशय और विपर्यय दोनों ही अनुपपन्न
होंगे । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि सामान्य की तरह
प्रत्यक्ष में विशेष का भी अवश्य ही भान हो, (सामान्य के अवश्य भासित होने में यह
युक्ति है कि) सामान्य बहुत से विषयों के साथ सम्बन्ध रहता है, उनमें से कहीं संनिकर्ष
होते ही उसकी भी उपलब्धि हो जाती है । विशेष (असाधारण) धर्म अल्प
४४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
चक्षुरवयविना भूयोभिश्च तदवयवैः सह सन्निकर्षमपेक्षत इति न सहोपलम्भनियमः,
सामग्रीभेदात् । अत एव दूरादव्यक्तग्रहणम्, गच्छतश्चक्षूरश्मेरन्तराले प्रकीर्णानामवय-
वानामर्थप्राप्त्यभावात् ।
केचित् सविकल्पकमेवैकं प्रत्यक्षमाचक्षते, व्यवसायात्मकत्वेन सर्वस्य व्यवहारयोग्यत्वात्,
शब्दव्युत्पत्तिरहितानामपि तिरश्चामर्थविकल्यत्वात् प्रवृत्तेः, तान् प्रत्याह-स्वरूपालोचनमात्र-
मिति । स्वरूपस्यालोचनमात्रं ग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रत्यक्षमात्रमिति यावत् । यदि हि
वस्तुस्वरूपस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणं नेष्यते, तदा तद्वाचकशब्दस्य स्मृत्यभावात्
सविकल्पकमपि न स्यात् । अतः सविकल्पकमिच्छता निर्विकल्पकमपेषितव्यम्, तच्च न
सामान्यमात्रं गृह्णाति, भेदस्यापि प्रतिभासनात् । नापि स्वलक्षणमात्रम्, सामान्या-
कारस्य संवेदनात्, व्यक्त्यन्तरदर्शने प्रतिसन्धानाच्च । किन्तु सामान्यं विशेषं चोभय-
मपि गृह्णाति, यदि परमिदं सामान्यमयं विशेष इत्येवं विविच्य न प्रत्येति,
वस्त्वन्तरानुसन्धानविरहात् । पिण्डान्तरानुवृत्तिग्रहणाद्धि सामन्यं विविच्यते
स्थान में रहता है, अतः उसके प्रत्यक्ष के लिए उसके आश्रय एवं आश्रय के
अवयवों के साथ चक्षुरिन्द्रिय रूप अवयवी और उसके अवयवों का भी संनिकर्ष
आवश्यक है । इस प्रकार सामान्य और विशेष दोनों के 'सहोपलम्भनियम' अर्थात्
दोनों साथ ही उपलब्ध हों यह नियम नहीं है; क्योंकि दोनों के प्रत्यक्ष के कारण
भिन्न हैं । यही कारण है कि दूर से वस्तुओं का अस्फुट ग्रहण होता है । चूँकि
जाती हुई चक्षु की रश्मियों के बीच में बिखरे हुए कुछ अवयवों के साथ अर्थ का
सम्बन्ध नहीं हो पाता ।
कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष केवल सविकल्पक ही होता है, क्योंकि वही
निश्चयात्मक होने के कारण सभी तरह के व्यवहार की योग्यता रखता है, जिसके
द्वारा शब्दों की व्युत्पत्ति से सर्वथा रहित सर्पादि तिर्यक् योनियों के प्राणियों की भी
विशेष अर्थ के ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ उपपन्न होती हैं । उन्हीं को लक्ष्य कर
'स्वरूपालोचनमात्रम्' यह पद लिखा गया है । 'स्वरूपालोचन' शब्द का ग्रहणमात्र
अर्थात् विकल्प-रहित केवल प्रत्यक्ष अर्थ है । निर्विकल्पक ज्ञान से यदि वस्तु के
स्वरूप का ज्ञान न मानें, तो फिर उस वस्तुस्वरूप के वाचक शब्द की स्मृति न हो
सकेगी । उस स्मृति के न होने से सविकल्पक ज्ञान भी न हो सकेगा । अतः
सविकल्पक ज्ञान को माननेवालों को निर्विकल्पक ज्ञान भी मानना ही पड़ेगा ।
निर्विकल्पक ज्ञान केवल सामान्य को ही नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसमें 'भेद'
(विशेष अर्थात् व्यक्ति) का भी भान होता है । एवं निर्विकल्पक ज्ञान में केवल
भेद (व्यक्ति) भी भासित नहीं होता; क्योंकि अनुभव के द्वारा यह सिद्ध है
कि उसमें सामान्य भी भासित होता है । यदि यह कहें कि (प्र.) 'यह
सामान्य है' 'यह विशेष है' इस प्रकार अलग-अलग दोनों का ज्ञान नहीं होता,
क्योंकि (निर्विकल्पक ज्ञान में) दूसरी वस्तु का (अर्थात् ज्ञात वस्तु के सजातीय